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NPA पर वित्त मंत्रालय का आदेश देखकर बैंकों की नींद उड़ गई

पिछले 5 सालों के दौरान देश के सरकारी बैंकों ने 7.34 लाख करोड़ रुपये के कर्ज राइट ऑफ किए हैं.

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NPA को लेकर वित्त मंत्रालय का बैंकों को निर्देश. (तस्वीरें- पीटीआई और Unsplash.com)

सरकारी बैंकों पर लोन रिकवरी का जबरदस्त दबाव है. इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को चालू वित्त वर्ष में कम से कम 2 लाख करोड़ रुपये के बट्टे-खाते में पड़े लोन की रिकवरी करने का टारगेट दिया है. ईटी ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने हाल ही में एक बैठक में सरकारी बैंकों के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बट्टे खाते में डाले गए कर्ज को वसूलने के लिए हर संभव प्रयास करें.

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लोन को बट्टे खाते में डालने या राइट ऑफ की गुत्थी

दरअसल जब कोई व्‍यक्ति लोन लेता है तो बैंक उसकी कर्ज चुकाने की क्षमता का आकलन करने के बाद ही लोन देते हैं. लेकिन कर्ज चुकाने की हैसियत रखने के बावजूद अगर कोई व्‍यक्ति जानबूझकर लोन न चुकाए, तो उसे विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है. जब इस तरह के व्यक्ति या कंपनी से कर्ज वापसी की उम्मीद नहीं रहती तो बैंक इस तरह के कर्जों को राइट ऑफ कर देते हैं यानी बट्टे खाते में डाल देते हैं. यह कर्जमाफी नहीं है, बल्कि ऐसे कर्ज को करीब-करीब डूबा यानी NPA मान​ लिया जाता है.

बैंक ने जो पैसा उधार दिया है, अगर उस पैसे के मूलधन या ब्याज की किस्त 90 दिनों तक वापस नहीं मिलती है तो उस लोन अकाउंट को नॉन परफॉर्मिंग एसेट यानी NPA मान लिया जाता है. इसके बाद भी जब उनकी वसूली नहीं हो पाती और संभावना बहुत कम रहती है तो इस NPA को राइट ऑफ कर दिया जाता है. रिज़र्व बैंक के अनुसार, बैंकों को अगर किसी बांटे गए क़र्ज़ से ब्याज आय मिलनी बंद हो जाती है तो उसे NPA माना जाता है.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 5 सालों के दौरान देश के सरकारी बैंकों ने 7.34 लाख करोड़ रुपये के कर्ज राइट ऑफ किए हैं, जबकि इस अवधि के दौरान केवल एक लाख करोड़ रुपये फंसे लोन (NPA) की वसूली की गई है. वहीं, 31 मार्च 2023 तक सरकारी, प्राइवेट और विदेशी बैंकों सहित राइट-ऑफ की कुल रकम का आंकड़ा 10 लाख करोड़ रुपय़े से ज्यादा पहुंच चुका है. 

इस तरह से आंकड़ों को देखें तो सरकारी बैंकों ने हर साल करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये के NPA को बट्टे खाते में डाला है. RBI के आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों (वित्त वर्ष 2021-22) में बैंकों ने 11.17 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाला है. इसमें सरकारी बैंकों का हिस्सा 8.16 लाख करोड़ और निजी बैंकों का हिस्सा 3.01 लाख करोड़ है.

बैंक अपने कर्ज को राइट ऑफ क्यों करते हैं?

बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखने के लिए ऐसा करते हैं. इसका कतई मतलब नहीं है कि कर्जदारों को लोन चुकाने से मोहलत मिल गई. लोन अकाउंट एक्टिव रहता है. राइट ऑफ की ये प्रक्रिया RBI के दिशानिर्देशों और बैंकों के बोर्ड्स द्वारा मंजूर पॉलिसी के आधार पर पूरी की जाती है. फंसे हुए लोन यानी NPAs राइट-ऑफ किए जाने पर बैंकों की बैलेंस शीट से हटा दिए जाते हैं. 

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आमतौर बैंक खुद अपने फंसे कर्ज की वसूली करते हैं. वहीं मोटे डूबे कर्जों को वसूलने में नेशनल एसेट रीकंस्ट्रक्शन लिमिटेड (NARCL) की मदद ली जाती है. NARCL को बैड बैंक भी कहा जाता है. बैड बैंक का काम फंसे या डूबते कर्ज या संपत्ति को बचाना है. बैकों के NPA को घटाने के लिए सरकार ने 2021 में बैड बैंक बनाने की घोषणा की थी.

ईटी ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि सरकार के इस निर्देश के बाद, अब सरकारी बैंक बट्टे खाते में डाले गए कर्ज को वसूलने के लिए एक विशेष अभियान चलाने जा रहे हैं. एक बैंक अधिकारी ने कहा कि बैंक ने बट्टे खाते पर डाले गए लोन की रिकवरी के प्रयास किए हैं, लेकिन कुछ केस अभी भी रिकवरी ट्रिब्यूनल और कोर्ट में लंबे समय से फंसे पड़े हैं. आपको बता दें कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक मार्च, 2022 को समाप्त पिछले 5 वर्षों में बट्टे खातों से सिर्फ 14 फीसदी रकम ही वसूल पाए हैं. 

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