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यूपी का वो मुख्यमंत्री, जिसका करियर अमिताभ बच्चन ने खत्म कर दिया

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कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने आखिरी दिनों में कांग्रेस को मिटाने की कसम खाई थी. अपने बेटे विजय बहुगुणा को मैदान में उतारा था. विजय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने. भाजपा में शामिल हुए. हेमवती की बेटी रीता बहुगुणा भी 2016 में भाजपा में शामिल हो गईं. आखिर ऐसा क्या था कि यूपी की पहली विधानसभा में शामिल हुए चाणक्य कांग्रेस को बर्बाद करने पर तुले थे? कांग्रेस से वो यूपी के मुख्यमंत्री भी रहे थे और केंद्र में भी मंत्री रहे थे. इतनी नाराजगी क्यों?


1942 के आंदोलन में इनामी क्रांतिकारी थे, यूपी की राजनीति में नामी नेता बने

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हेमवती नंदन बहुगुणा

13 अप्रैल, 1919 को जालियांवाला बाग हुआ था. और 25 अप्रैल, 1919 को तत्कालीन पौड़ी जिले के बुधाणी गांव में हेमवती नंदन का जन्म हुआ था. वो दौर था आर्यसमाज का, जो भारतीय परंपरा को फिर से जीवित करना चाह रही थी. वो दौर था गांधी का, जो भारत की राजनीति को राजे-रजवाड़ों की लड़ाई से अलग गांववालों के हाथ में देने जा रहे थे. तो उसी गर्व से बने डीएवी कॉलेज से हेमवती की भी पढ़ाई हुई थी. पढ़ाई के दौरान ही हेमवती का संपर्क लाल बहादुर शास्त्री से हो गया था. तो जाहिर सी बात है कि देश की राजनीति में इंटरेस्ट आ गया.

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हेमवती नंदन बहुगुणा

1936 से 1942 तक हेमवती नंदन छात्र आंदोलनों में शामिल रहे थे. वो वक्त ही ऐसा था कि जिससे जितना हो सकता था, वो करता था. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हेमवती के काम ने उन्हें लोकप्रियता दिला दी. अंग्रेजों ने हेमवती को जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर 5 हजार का इनाम रखा था. आखिरकार 1 फरवरी 1943 को दिल्ली के जामा मस्जिद के पास हेमवती गिरफ्तार हुए थे. पर 1945 में छूटते ही फिर बैंड बजा दी थी अंग्रेजों की. तुरंत ही देश भी आजाद हो गया.

उसके बाद हेमवती यूपी की राजनीति में सक्रिय हो गए. 1952 से वो लगातार यूपी कांग्रेस कमिटी के सदस्य रहे. 1957 में पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी रहे. ऐसा माना जाता है कि सरकार जिसको मंत्री नहीं बना पाती, उसे ये पद दे देती है. पर इससे ये पता चलता है कि हेमवती को इग्नोर करना सरकार के लिए आसान नहीं था. 1958 में प्रमोशन हुआ. सरकार में श्रम और उद्योग विभाग के उपमंत्री रहे. फिर 1963 से 1969 तक यूपी कांग्रेस महासचिव के पद पर रहे. 1967 में आम चुनाव के बाद बहुगुणा को अखिल भारतीय कांग्रेस का महामंत्री चुना गया. इसी साल कांग्रेस में समस्या पैदा हो गई. चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी. फिर 1969 में इंदिरा गांधी को लेकर ही बवाल हो गया. कांग्रेस दो भाग में टूट गई. त्रिभुवन नारायण सिंह जैसे नेता कामराज के सिंडिकेट ग्रुप में चले गए. पर कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा इंदिरा गांधी के साथ चले गये. त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री रहते हुए उपचुनाव में एक पत्रकार रामकृष्ण द्विवेदी से हार गए. इसके बाद कमलापति त्रिपाठी को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया. पर पीएसी विद्रोह के चलते उनको भी पद छोड़ना पड़ा. विद्रोह के अलावा कमला सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप थे.

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हेमवती नंदन बहुगुणा

जब यूपी की हालत बिगड़ रही थी तो कमान बहुगुणा को ही मिली

कमलापति धोती पहनते थे. महंत लगते थे. प्रशासन गड़बड़ हो गया था. तो ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो शासन भी संभाले और इंदिरा के सामने चूं भी ना करे. हेमवती नंदन 1971 में पहली बार सांसद बने थे. पर उनको उम्मीद थी कि इंदिरा का लगातार सपोर्ट करने की वजह से उनको कोई ताकतवर पद मिलेगा. पर संचार विभाग में जूनियर मिनिस्टर ही बन पाए थे. उस वक्त ये इतने नाराज हुए थे कि 15 दिन तक मंत्री का चार्ज ही नहीं लिया था. तो कुढ़कर इंदिरा ने इनको स्वतंत्र प्रभार दे दिया था. इसके अलावा हेमवती को जगजीवन राम कैंप का माना जाता था. तो इंदिरा गांधी को सलाह दी गई कि इनको यूपी का मुख्यमंत्री बना दीजिए, ये आपके विश्वासपात्र हो जाएंगे. हेमवती बारा से विधायक बने.

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कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा और राजस्थान के सुखाड़िया

दिलचस्प बात ये है कि कमलापति और हेमवती के रिश्ते बहुत अच्छे थे. हेमवती अपने पिता के अलावा सिर्फ कमलापति के ही पांव छूते थे. एक बार त्रिपाठी के कहने पर बहुगुणा भांग खा कर लोटे भी थे. कमला ने भी बहुगुणा के नाम पर हां कर दी. बहुगुणा ने आते ही यूपी के हालात सम्भाले और छह महीने बाद राज्य में अधमरी हो चुकी कांग्रेस को चुनाव भी जिता दिया. कहा तो ये भी जाता है कि विपक्ष के दिग्गज पूर्व मुख्यमंत्री चन्द्रभानु गुप्ता की छल-बल लगाकर ज़मानत भी ज़ब्त करवा दी थी. किंवदंतियां हैं कि चन्द्रभानु गुप्ता उनसे पूछते थे- रे नटवर लाल, हराया तो ठीक, लेकिन ज़मानत कैसे ज़ब्त करायी मेरी, ये तो बता. बहुगुणा का जवाब था- आपकी ही सिखाई घातें हैं गुरु देव. (वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी राजीव नयन बहुगुणा की फेसबुक वॉल से)

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हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय मंत्री के रूप में शपथ लेते हुए

पर 1975 में इंदिरा गांधी ने सबको सरप्राइज करते हुए देश में इमरजेंसी लगा दी. कांग्रेस के भी कई नेता इस बात पर चिढ़ गए थे. पर इंदिरा के सामने बोलने का साहस किसी में नहीं था. लगभग सब इंदिरा के साथ ही थे. सबको लगता था कि बाद में सबको बड़ा पद दिया जाएगा. इसी दौरान 1975 में बहुगुणा का इंदिरा से तीन-पांच हो गया. इस्तीफा देना पड़ा. कहा ये भी जाता है कि संजय गांधी की लंठई ने इनको बहुत दुखी कर दिया था. संजय किसी को कुछ समझते नहीं थे. इसके पहले वो 4 मार्च 1974 को भी रिजाइन कर चुके थे. पर 5 मार्च 1974 को फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी. फिर जब 1977 में लोकसभा चुनावों की घोषणा हुई तो बहुगुणा ने पहली बार कांग्रेस से बगावत की. बहुगुणा ने पूर्व रक्षा मंत्री जगजीवन राम के साथ मिलकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी पार्टी बनाई. उस चुनाव में इस दल को 28 सीटें मिली, जिसका बाद में जनता दल में विलय हो गया. इसी पार्टी के बैनर तले बहुगुणा ने आज के उत्तराखंड की चार लोकसभा सीटें जीती. चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री रहते बहुगुणा देश के वित्त मंत्री भी रहे.

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हेमवती नंदन बहुगुणा दौरे पर

अंग्रेजी वीकली ब्लिट्ज (BLITZ) के संपादक वयोवृद्ध पत्रकार करंजिया ने रूसी नेताओं और एम्बेसडर की मौजूदगी में एक सेमिनार को सम्बोधित करते हुए बहुगुणा को देश के प्रधानमंत्री पद का काबिल मैटेरियल घोषित कर दिया. मीडिया में हंगामा मच गया. कहते हैं कि इस बात से नाराज होकर इंदिरा गांधी ने अपने चहेते यशपाल कपूर को बहुगुणा पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंप दी. कपूर लखनऊ में रहने लगे. कहते हैं कि एक दिन भड़ककर बहुगुणा ने यशपाल कपूर का बोरिया-बिस्तरा लखनऊ के अपने मुख्यमंत्री आवास से बाहर फिंकवा दिया.

इमरजेंसी के विरोध में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के खिलाफ जंग छेड़ दी थी. इसी सिलसिले में वो लखनऊ भी गये. बहुगुणा ने उनको रोका नहीं. बल्कि रेड कारपेट वेलकम दिया. जयप्रकाश नारायण इतने प्रभावित हुए कि यूपी सरकार के खिलाफ एक भी प्रदर्शन नहीं किया. वापस हो गये. पर इंदिरा बहुगुणा से नाराज हो गईं.

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हेमवती नंदन बहुगुणा मशीन देखते हुए

कांग्रेस में फिर शामिल हुए, पर बच्चन ने करियर खत्म कर दिया

हालांकि जनता पार्टी के बिखराव के बाद बहुगुणा 1980 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में दोबारा शामिल हो गए. 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी ने हेमवती नंदन बहुगुणा को कांग्रेस में आने का निमंत्रण दिया और उनको प्रमुख महासचिव बनाया. 1980 में मध्यावधि चुनाव में बहुगुणा ने पूरी शक्ति के साथ चुनाव अभियान को संचालित किया. बहुगुणा गढ़वाल से जीते.

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हेमवती नंदन बहुगुणा और सूर्य प्रकाश जायसवाल

1980 के चुनाव के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा ने चौधरी चरण सिंह के बारे में कहा था, ‘इस चौधरी ने हमारा जीना हराम कर दिया. हम ही जानते हैं हम कैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान में जीते हैं. यादवों का छह साल का लड़का भी हमारी पार्टी की जीप देख कर खड़ा हो जाता था और चौधरी की आलोचना तो दूर, उसका नाम आते ही ईंट चलाने लगता था.’

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हेमवती नंदन बहुगुणा जमीन का पट्टा बांटते हुए

हेमवती नंदन बहुगुणा ने एक बार कहा था- विपक्ष की तो और बुरी हालत है. प्रधानमंत्री ने बुलाया नहीं कि विरोधी नेता कुत्ते की तरह से पूंछ हिलाते पहुंच जाते हैं.

चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई. पर इनको कैबिनेट में जगह नहीं मिली. इंदिरा का बदला लेने का अनूठा तरीका था. एकदम अपमानित कर देना. छह महीने के अंदर ही बहुगुणा ने कांग्रेस पार्टी के साथ ही लोकसभा की सदस्यता भी छोड़ दी. 1982 में इलाहाबाद की इसी सीट पर हुए उपचुनाव में भी जीत हासिल की थी. लेकिन 1984 का चुनाव उनके लिए काल बनकर आया. राजीव गांधी ने अमिताभ बच्चन को खड़ा कर दिया. पर बहुगुणा का राजनीतिक कद बहुत बड़ा था. बहुगुणा ने अमिताभ के खिलाफ दबा के प्रचार भी किया था-

हेमवती नंदन इलाहाबाद का चंदन.
दम नहीं है पंजे में, लंबू फंसा शिकंजे में.
सरल नहीं संसद में आना, मारो ठुमका गाओ गाना.

बच्चन ने बहुगुणा को 1 लाख 87 हजार वोट से हराया. बहुगुणा कांग्रेस छोड़कर लोकदल में आये थे. यहां देवीलाल और शरद यादव ने उन पर गंभीर आरोप लगाने शुरू कर दिये, जिससे वो अंदर से टूट गये थे. इस हार के बाद बहुगुणा ने राजनीति से संन्यास ले लिया. पर्यावरण संरक्षण के कामों में लग गये. 3 साल बाद अमिताभ ने सीट छोड़ दी, राजनीति से संन्यास ले लिया. और उसी दौरान हेमवती नंदन बहुगुणा की मौत हो गई. क्या कहें राजनीति का.

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हेमवती नंदन बहुगुणा

बहुगुणा की एक बाईपास सर्जरी हो चुकी थी. डॉक्टरों ने कहा कि दूसरी कराने की जरूरत नहीं है. राजनीति से दूर रहेंगे तो आराम से रहेंगे. लेकिन बहुगुणा को आराम से बैठना गवारा नहीं था. उन्होंने डॉक्टरों से कह दिया कि बहुगुणा समोसे खाने और मजे करने के लिए पैदा नहीं हुआ है. ऑपरेशन तो करवाऊंगा.

बहुगुणा का परिवार भी राजनीति में सक्रिय है

रीता बहुगुणा जोशी हेमवती नंदन की बेटी हैं. 67 साल की रीता यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी हैं. पर 2016 में उन्होंने अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा जॉइन कर ली. रीता बहुगुणा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर रह चुकी हैं. हेमवती नंदन यहीं से पढ़े थे. रीता समाजवादी पार्टी की ओर से 1995 से 2000 तक इलाहबाद की मेयर भी रहीं. राष्ट्रीय महिला आयोग की उपाध्यक्ष रह चुकीं रीता ने बाद में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी की कमान भी संभाली. फिर 2007 से 2012 के बीच यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और इसी दौरान बसपा प्रमुख मायावती के खिलाफ टिप्पणी करने के चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा. 2012 में उन्होंने लखनऊ कैंट से विधानसभा चुनाव जीता. 2014 में उन्होंने लखनऊ सीट से लोकसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमाया लेकिन हार का सामना करना पड़ा. 2017 में वो भाजपा से लखनऊ कैंट से उम्मीदवार हैं.

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रीता बहुगुणा और अमित शाह

मार्च 2016 में हेमवती के बेटे विजय ने भी भाजपा जॉइन कर ली थी. इलाहाबाद में जन्मे विजय बहुगुणा राजनीति में आने से पहले महाराष्ट्र हाईकोर्ट में जज रह चुके हैं. इस्तीफा देने के बाद उन्होंने इलाहाबाद से राजनीति में कदम रखा. पर बहुत सफलता नहीं मिली. तो वो उत्तराखंड लौट गए. 1997 में उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का सदस्य बनाया गया. विजय बहुगुणा को 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के कार्यकाल में उत्तराखंड योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया. 2004 में वो 14वीं लोकसभा के लिए चुने गए. इसके बाद 2009 में वह 15वीं लोकसभा के लिए टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट से चुन लिए गए. 2012 के विधानसभा चुनाव में राज्य में कांग्रेस की वापसी हुई तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. हालांकि लोकसभा चुनाव 2014 से पहले उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा और उनकी जगह हरीश रावत ने ली. मार्च में उत्तराखंड में कांग्रेस विधायकों के बगावती तेवरों से संवैधानिक संकट खड़ा हुआ तो विजय बहुगुणा ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए.

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हेमवती नंदन बहुगुणा बेटे विजय बहुगुणा के साथ

बहुगुणा उन लोगों में से थे जो रोज अखबारों के अलावा मेनस्ट्रीम, इकॉनमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, टाइम और इकॉनमिक टाइम्स सब पढ़ते थे. वो एक बढ़िया वक्ता थे. हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी अच्छे से जानते थे. देश की खाद्यान समस्या, तेल समस्या, विदेश नीति,कानून व्यवस्था, माइनॉरिटीज प्रॉब्लम्स, कम्युनलिज्म, हिस्ट्री पर घंटों बोल सकते थे. हिंदुस्तान टाइम्स ने उस वक़्त बहुगुणा की एक स्पीच को पूरे एक पेज का कवरेज दिया था. उनके भाषण हमेशा फैक्ट से लैस होते थे. बहुगुणा अपने कपड़ों का विशेष ख्याल रखते थे. लखनऊ के पुराने लोग बताते हैं कि बहुगुणा मुख्यमंत्री थे तो समय-समय पर शास्त्रीय संगीत के आयोजनों में भी जाते थे. मुशायरे तो उन्हें बहुत पसंद थे. नारायण दत्त तिवारी को वो ‘लक्ष्मण’ कहते थे.

(इस स्टोरी में रिसर्च का काम हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे आदित्य झा ने किया है.)

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