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इस तरकीब से मुलायम ने बीजेपी को दी थी ऐसी पटखनी कि वो 14 साल उबर नहीं पाई

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16 जनवरी, 2017 को हुए एक फैसले ने उत्तर प्रदेश की सियासत में बहुत कुछ बदल दिया. ‘धरतीपुत्र’ के हाथ से उसकी मिट्टी सरक गई. मुलायम सिंह यादव ने अपनी शख्सियत के इर्द-गिर्द जो राजनीति बुनी थी, वो खत्म दिख रही है. समाजवादी पार्टी अब बेटे अखिलेश के हाथ में है, जो अपनी साख की लड़ाई लड़ रहे हैं. वही बीजेपी, जिसे सत्ता से बाहर रखने के लिए 1993 में मुलायम सिंह यादव ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था. कांशीराम से हाथ मिलाने से मुस्लिमों को गले लगाने तक, वो मुलायम का स्वर्णकाल था.

तब मुलायम कहते थेः


“मेरा मुख्य लक्ष्य भाजपा को इस राज्य से भगाना है.

‘दानव’ के नाश के लिए मैं ‘शैतानों’ से भी हाथ मिला लूंगा.”


आज मुलायम हाशिए पर हैं. मुलायम की वो आक्रामकता सहज ही याद आती है, जो उन्होंने बीजेपी को हराने के लिए दिखाई थी. अखिलेश का काम करने और चुनाव लड़ने का तरीका अलग है, लेकिन मुलायम की राजनीति खालिस पहलवानी अंदाज की रही. राजनीतिक दांव और गुंडई के कॉकटेल ने उन्हें देश के सबसे बड़े सूबे की चाबी दी.

ये 1993 का चुनाव था, जब मुलायम एक नई राजनीति गढ़ रहे थे.

तपती गरमी में मोड़ रहे थे बीजेपी की आंधी

बाबरी विध्वंस ने उत्तर प्रदेश से सभी दलों के पैर उखाड़ दिए थे. बीजेपी को छोड़कर. लेकिन दो साल बीतते-बीतते वो भी कलह का शिकार हो गई. मंदिर मुद्दे की जमीन भी दरकने लगी थी. ऐसे में मुलायम भरपूर ऊर्जा के साथ जून की तपती गर्मी को मात दे रहे थे. वो उस आंधी का रुख मोड़ रहे थे जिसने एक बार उनके राजनीतिक अस्तित्व को संकट में ला दिया था. कांग्रेस को एक दमदार चेहरे की दरकार थी लेकिन मुलायम ने उसे ये जगह भरने का वक्त ही नहीं दिया. प्रचार करते रहे. हवा बनाते रहे. उन्हें अपनी मेहनत पर इतना भरोसा था कि जब यूपी में राज्यपाल शासन छह महीने बढ़ाने की बात आई, तो उनके अलावा किसी ने इसका विरोध नहीं किया. मुलायम तुरंत चुनाव कराने के हक में थे.

जब मुलायम ने नाम मुताबिक कर लिया लहजा

मुलायम अक्खड़ राजनीति के सूरमा रहे हैं. आखिरी वक्त तक वो वैसी राजनीति करते रहे कि उनकी एक आवाज पर सभी खड़े हो जाएं और एक आवाज पर उनके सामने दंडवत हो जाएं. लेकिन 93 के चुनाव में मुलायम सॉफ्ट हो गए थे. वजह थी बीजेपी. मुलायम की अगुवाई में किसी भी राजनीतिक गठजोड़ पर ‘हिंदू-विरोधी’ का ठप्पा लगने का डर था, जिसका फायदा बीजेपी को होता. उनकी छवि अपराधियों को राजनीति में लाने की थी, जो उनके विरोध में जा सकती थी.

मौके की नजाकत के मुताबिक मुलायम अपने लहजे में नाटकीय नरमी ले आए. मंच से हिंदू-विरोधी नारे लगाना तो लगभग खत्म ही कर दिया था और हिंदूवादी मुहावरों का इस्तेमाल भी बड़ी चालाकी से करते थे. मसलन, वो रैलियों में कहते थे, “देखिए, भाजपा ने अयोध्या में एक मस्जिद ढहाकर दूसरे देशों में हजारों मंदिर तोड़े जाने का रास्ता बनाया है.”

वो ब्राह्मणवाद का डर दिखाते थे और बड़ी चालाकी से संदिग्ध छवि वाले अपने दोस्तों का जिक्र नहीं करते थे.

कहते थे बीजेपी को तो आने ही नहीं देना है

मुलायम के सामने उस समय वही स्थिति थी, जो आज अखिलेश के सामने है. मुलायम सफल रहे और अखिलेश का परिणाम आना बाकी है. अखिलेश गठबंधन का दांव खेल रहे हैं, जबकि मुलायम ने गठबंधन के साथ-साथ मजबूत विरोध का रास्ता चुना था. वो कहते थे:


“भाजपा कहती है कि मैं मुसलमानों को भड़का रहा हूं. मैं मानता हूं.

मैं हर उस शख्स को भड़का रहा हूं, जो देश को एक रखना चाहता है.”


आज रैलियों में मोदी की मेहनत की तारीफ होती है. तब मुलायम भी हर पखवाड़े दो बड़ी रैलियां और कई छोटी जनसभाएं संबोधित करते थे. हफ्ते में करीब दो-तीन पत्रकार सम्मेलनों में जाना उनकी आदत सी हो गई थी. उनमें तमाम खामियां थीं और बतौर मुख्यमंत्री भी वो असफल रहे थे, लेकिन कॉन्फिडेंस इतना था कि बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खड़ा कर दिया.

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बड़ी भीड़ इकट्ठी करते थे मुलायम

अखिलेश यादव के साथ महीनों चले दंगल के दौरान मुलायम ने कई बार दोहराया कि उन्होंने पार्टी के लिए बहुत-खून पसीना बहाया है, जो अखिलेश या उनके समर्थकों के बस का नहीं. मुलायम सच कहते थे.

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ये वो दौर था, जब बीजेपी की रैलियां और कल्याण सिंह की आम सभाएं फीकी पड़ने लगी थीं और मुलायम मुस्लिमों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए थे. जून की 45 डिग्री के तापमान वाली दोपहरी में जब मुलायम उन्नाव के गांव असीवां में रैली करने पहुंचे तो छह हजार से ज्यादा लोग उन्हें सुनने के लिए मौजूद थे. अगले दिन वो कानपुर से 70 किमी दूर हरिजनों के 500 घरों वाले छोटे से गांव चंदापुर में जाते, तो रात में कानपुर के हलीम मुस्लिम कॉलेज में दस हजार मुस्लिम उन्हें सुनने के लिए इकट्ठा होते थे. मुलायम कभी भाषण देने के एक्सपर्ट नहीं रहे, लेकिन उनकी गंवई मुहावरेबाजी असर छोड़ती थी.

ये सब एक पूर्व-मुख्यमंत्री कर रहा था

मुलायम वही कर रहे थे जिसकी गठबंधन को जरूरत थी. मई, 93 में लखनऊ महापौर के चुनाव में अगर मुलायम न होते, तो कांग्रेस के अखिलेश चंद्र दास बीजेपी के विद्यासागर गुप्ता से हार गए होते. दास को 100 में से 50 ही वोट मिले थे, लेकिन मुलायम ने 23 वोटों के समर्थन वाले अपने कैंडिडेट को न सिर्फ हटाया, बल्कि 20 वोटों का दावा करने वाले बाग़ी कांग्रेसी लव भार्गव को भी नाम वापस लेने के लिए मना लिया. नतीजा ये रहा कि दास चार वोटों से जीत गए.

मुलायम साफ कहते थे, “भाजपा को हराने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.” अब देखना ये है कि पहलवान को ठिकाने लगाने के बाद उनका बेटा क्या वही करिश्मा दिखा पाएगा, जो पहलवान ने दिखाया था, भले ही वो 2017 में मात खा चुका हो.


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