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गुजरात का वो आदिवासी मुख्यमंत्री जिसने आरक्षण को वापस ले लिया था

4 जुलाई 1985. गुजरात के मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी विधानसभा सत्र के दौरान पिछले दो दिन से दिल्ली में थे. इससे पंद्रह दिन पहले ही कांग्रेस महासचिव जी.के. मूपनार के नेतृत्व में आई पांच ऑब्जर्वर वाली कमिटी तीन बनाम दो के बहुमत से माधव सिंह सोलंकी को हटाने की सिफारिश कर चुकी थी. इसके बाद सोलंकी की विदाई लगभग तय मानी जा रही थी. विधानसभा में बजट सत्र में सोलंकी बतौर मुख्यमंत्री मौजूद थे. इसने सोलंकी की विदाई पर कयासबाजी को तेज कर दिया था.

चार जुलाई की शाम कांग्रेस आलाकमान के आदेश पर दो ऑब्जर्वर दिल्ली से अहमदाबाद के लिए उड़ान भर रहे थे. आठ बजे के करीब दोनों ने खुद को अहमदाबाद के एक होटल में पाया. हालांकि मीडिया और कांग्रेस के विधायकों को उनकी मौजूदगी का अहसास हुआ अगली सुबह. ये दो ऑब्जर्वर थे संतोष मोहन देब और अमरजीत कौर. दोनों नेता राजीव के ख़ास सिपहसालारों में से थे. सुबह 10 बजे से उन्होंने चलते विधानसभा सत्र से एक-एक करके विधायकों को बुलाना शुरू किया. इसके बाद साफ़ हो गया था कि माधव सिंह सोलंकी अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कुछ ही घंटों के मेहमान हैं.

संतोष मोहन देब (बाएं), जीके मूपनार (दाएं)
संतोष मोहन देब (बाएं), जीके मूपनार (दाएं)

शाम ढलने तक दो ऑब्जर्वर वाली टीम 92 विधायकों से मुलाकात कर चुकी थी. इसमें सबसे लंबी मुलाक़ात रही कांग्रेस के असंतुष्ट धड़े के नेता जीनाभाई दरजी, सनत मेहता और मनोहर जड़ेजा के साथ. गुजरात कांग्रेस की यह तिकड़ी 1983 से ही माधव सिंह सोलंकी से नाराज चल रही थी. 1984 में विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले ये लोग सार्वजनिक मंच से अपनी ही सरकार पर हमले करते पाए गए थे. दो साल बाद इन्हें लग रहा था कि आखिरकार वो सोलंकी को पटखनी देने में कामयाब रहे थे.

ठीक इसी दिन माने पांच जुलाई के रोज माधव सिंह सोलंकी की राजीव गांधी से दो चरणों में मुलाकात हुई. इसके बाद वो वित्तमंत्री वी.पी. सिंह से मिले. इसके कुछ घंटों के बाद ही सफदरजंग हवाई अड्डे से एक ख़ास विमान उड़ान भर रहा था. इसमें सवार थे माधव सिंह सोलंकी, जी.बी. मूपनार, वी.पी. सिंह और चंदुलाल चंद्राकर.

छह जुलाई के दिन शाम चार बजे कांग्रेस विधायक मंडल की बैठक बुलाई गई. सारे विधायक तय समय पर जमा हो गए. ऐन मौके पर दिल्ली से एक कॉल आई. विधायक करीब 35 मिनट इंतजार करते रहे. मीटिंग शुरू हुई. मीटिंग की शुरुआत में ही माधव सिंह सोलंकी ने अपने इस्तीफे की घोषणा की और नए मुख्यमंत्री के तौर पर अमर सिंह चौधरी का नाम सामने रखा. इसके बाद प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष महंत विजयदास खड़े हुए. उन्होंने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. विधायक मंडल में सोलंकी समर्थकों का बहुमत था. ऐसे में जीनाभाई दरजी, सनत मेहता और मनोहर जड़ेजा के पास वोटिंग करवाने का विकल्प नहीं था. अमर सिंह चौधरी को नया मुख्यमंत्री चुन लिया गया.

मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद अमर सिंह चौधरी को माला पहनाते माधव सिंह सोलंकी. पीछे खड़े हैं वीपी सिंह
मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद अमर सिंह चौधरी को माला पहनाते माधव सिंह सोलंकी. पीछे खड़े हैं वीपी सिंह

इस मीटिंग के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जी.के. मूपनार मीडिया से मुखातिब हुए. उन्होंने कहा कि सभी विधायकों ने एक स्वर में अमर सिंह चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने जाने का समर्थन किया है. लेकिन क्या ऐसा सच में था. अमर सिंह चौधरी सोलंकी के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री थे. राज्य जारी दंगों पर काबू पाने में बतौर गृहमंत्री नाकाम रहे थे. ऐसे में इस प्रमोशन का कोई तुक खोजना मुश्किल था.

जीनाभाई दरजी, सनत मेहता और मनोहर जड़ेजा की तिकड़ी अमर सिंह को मुख्यमंत्री बनाए जाने के सख्त खिलाफ थी. जिस ‘खाम’ समीकरण की वजह से कांग्रेस को 1985 के विधानसभा में ऐतिहासिक जीत हासिल हुई थी, उसके असली जनक सनत मेहता और जीनाभाई दरजी ही थे. जीनाभाई दरजी अमर सिंह चौधरी की तरह आदिवासी समुदाय से आते थे. वो अमर सिंह चौधरी को राजनीति में लेकर आए थे. जब चौधरी के मुख्यमंत्री बनने का अवसर आया तो जीनाभाई ने इसका कड़ा विरोध किया. इसके दो मुख्य कारण थे. पहला अमर सिंह चौधरी सोलंकी के आदमी माने जाते थे. दूसरा आरक्षण विरोधी आंदोलन के चलते वो चाहते थे कि कोई सवर्ण बिरादरी का आदमी मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठे ताकि आंदोलन को शांत किया जा सके. ऐसे में असंतुष्ट तिकड़ी ने मुख्यमंत्री सीट के लिए नाम आगे बढ़ाया नटवर लाल शाह का. शाह उस समय विधानसभा अध्यक्ष थे और उनकी छवि साफ़ थी. सोलंकी को पूरी तरह से पटखनी देने की इस तिकड़ी की ख्वाहिश अधूरी रह ही गई. इस तरह महज़ 44 साल की उम्र में अमर सिंह चौधरी राज्य के आठवें मुख्यमंत्री बने.

एक इंजीनियर से मुख्यमंत्री तक का सफ़र

1969 में राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस की अंदरूनी खींच-तान सतह पर आ गई. आजादी के बाद कांग्रेस में पहला विभाजन हुआ. मोरारजी देसाई और के. कामराज के नेतृत्व वाला पहला धड़ा कांग्रेस (ओ) के नाम से जाना गया. इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला धड़ा कांग्रेस (आर) के नाम से. गुजरात में भी केंद्र की तर्ज पर विभाजन हुआ. फर्क यह था कि केंद्र में ज्यादातर कांग्रेस नेता इंदिरा को अपना नेता मानते हुए कांग्रेस (आर) का हिस्सा बने, वहीं गुजरात में मोरारजी देसाई के प्रभाव के चलते ज्यादातर कांग्रेस के नेता कांग्रेस (ओ) में बने रहे. उस समय गुजरात में जीनाभाई दरजी और कांतिलाल घिया ऐसे नेता थे जिन्होंने इंदिरा गांधी की तरफ अपनी वफादारी जाहिर की थी.

नरेंद्र मोदी के साथ अमर सिंह चौधरी
नरेंद्र मोदी के साथ अमर सिंह चौधरी

इस विभाजन ने गुजरात कांग्रेस के चरित्र को बदल दिया. इससे पहले कांग्रेस संगठन में ज्यादतर सवर्ण बिरादरी के नेता कांग्रेस (ओ) के धड़े में चले गए थे. यहां से पिछड़े और दलित बिरादरी के नेता कांग्रेस (आर) के नेतृत्व में जगह बनाने लगे. जीनाभाई दरजी कांग्रेस के संगठन को सूबे में नए सिरे से गढ़ रहे थे. वो खुद आदिवासी समाज से आते थे और कमाल के संगठनकर्ता थे. अपने एक राजनीतिक दौरे के दौरान उनकी मुलाकात एक अमर सिंह चौधरी से हुई. चौधरी सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके थे और PWD विभाग में उनकी नई-नई नौकरी लगी थी. यह 60 के दशक के कुछ आखिरी साल की बात है. आदिवासी समाज से इतने पढ़े-लिखे युवा का मिलना एक दुर्लभ खोज थी. जीनाभाई, अमर सिंह को कांग्रेस में ले आए.

1972 के लोकसभा चुनाव में अमर सिंह चौधरी को सूरत जिले की व्यारा सुरक्षित सीट से कांग्रेस का टिकट मिला. सामने थे कांग्रेस (ओ) के पीके नगजीभाई चौधरी. 15351 वोट से अमर सिंह चौधरी यह चुनाव जीत गए. सूबे में कांग्रेस को 168 में से 140 सीट मिलीं. घनश्याम ओझा नए मुख्यमंत्री बनाए गए. अमर सिंह चौधरी को पहली दफा विधायक बनने के साथ ही मंत्री की कुर्सी मिल गई. उन्हें इंजीनियर होने के कारण बांध कार्य मंत्रालय का राज्य मंत्री बनाया गया. मुख्यमंत्री रहने से पहले वो पांच अलग-अलग मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे.

उस दौर में इस्तीफे ‘नैतिकता’ के आधार पर हुआ करते थे

दिसंबर 1989 में लोकसभा के चुनाव होने जा रहे थे. नवंबर के महीने में राजीव गांधी गुजरात में थे. गुजरात ने कांग्रेस को पिछले दो लोकसभा चुनाव में निराश नहीं किया था. 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 26 में से 25 सीटें हासिल हुई थीं, वहीं 1984 के चुनाव में 24. इस बार भी राजीव ऐसे ही किसी करिश्मे की उम्मीद कर रहे थे. 30 नवंबर 1989 को निकली इंडिया टुडे में राजीव के दौरे के साथ-साथ गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमिटी के महासचिव निरुपम नानावटी का एक बयान छपा-

“1980 और 84 में कांग्रेस की लहर नहीं, तूफ़ान था. इसने विरोधियों को साफ़ करके रख दिया था. यह तूफान आज दिखाई नहीं दे रहा.”

1989 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राजीव साथ अमर सिंह चौधरी
1989 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राजीव साथ अमर सिंह चौधरी

दरअसल नानावटी जिसे नहीं देख पा रहे थे वो तूफ़ान के पहले का सन्नाटा था. लोकसभा चुनाव के नतीजे आए. कांग्रेस सूबे में 24 से गिरकर सीधा तीन सीट पर आ गई. अमर सिंह चौधरी ने पिछले चार साल से खरामा-खरामा करते अपना कार्यकाल पूरा किया था. उनकी कुर्सी फिर से खतरे में पड़ गई थी. अहमद पटेल, नरसी मकवाणा, बीके गढ़वी और योगेंद्र मकवाणा जैसे दिग्गज चुनाव हार गए. दो दिसम्बर 1989 के रोज वीपी सिंह ने देश के आठवें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली. इसके सात दिन बाद नौ दिसम्बर के रोज अमर सिंह चौधरी ने हार की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

देखने और सुनने में यह कितना अच्छा लगता है, लेकिन क्या सच में ऐसा था. दरअसल अमर सिंह चौधरी के खिलाफ खेमेबाजी की शुरुआत मार्च 1989 में ही हो गई थी. मार्च के तीसरे सप्ताह में गुजरात कांग्रेस के तीन नेता जितेंद्र शाह, नरेंद्र रावल और दिगंत ओझा दिल्ली के लिए रवाना हुए. यहां उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुई. यह तिकड़ी ‘चौधरी हटाओ अभियान’ के तहत दिल्ली में अपनी चप्पल घिस रहे थे. इन्हें अंदरूनी तौर पर माधव सिंह सोलंकी और जीनाभाई दरजी का समर्थन हासिल था. इन नेताओं ने राजीव गांधी के हाथ में एक पर्चा थमाया जिस पर 149 में से 82 कांग्रेसी विधायकों दस्तखत अमर सिंह चौधरी को हटाने की मांग के समर्थन में दर्ज थे. इसके बाद विरोध के सुर लगातार तेज होते चले गए.

गुजरात के 'आया राम-गया राम' के दौर में माधव सिंह सोलंकी पहली मुख्यमंत्री बने
माधव सिंह सोलंकी बतौर योजना मंत्री केंद्र की सियासत में जा चुके थे और अमर सिंह पीछे उनकी जड़ काटने में लगे हुए थे.

अमर सिंह चौधरी ने मुख्यमंत्री बनने के साथ ही संगठन पर अपने पंजे कसना शुरू कर दिया था. उन्होंने एक-एक करके जिला कांग्रेस कमिटियों में जीनाभाई दरजी और माधव सिंह सोलंकी के आदमियों को हाशिए पर धकेलना शुरू कर दिया. इस बीच सूबे की कांग्रेस में एक और नेता तेजी से उभर रहा था, अहमद पटेल. पटेल राजीव गांधी के करीबी लोगों में से थे. उन्होंने शुरूआती दौर में चौधरी का समर्थन भी किया. इस बीच चौधरी एक गलती कर बैठे. भरूच के स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने अहमद पटेल का चरित्र हनन शुरू किया. इन बागी नेताओं को अंदरूनी तौर पर चौधरी का समर्थन हासिल था. अहमद पटेल की राजीव गांधी से करीबी चौधरी के लिए चिंता का सबब थी. ऐसे में उन्होंने मौक़ा मिलते ही अहमद पटेल का पत्ता साफ़ करने की योजना बनाई. अपने खिलाफ चल रही साजिश का पता जल्द ही पटेल को लग गया और उन्होंने पाला बदलने में देरी नहीं लगाई. अमर सिंह चौधरी की विदाई लोकसभा चुनाव से काफी पहले तय हो गई थी. चुनाव के चलते वो कुछ दिन के लिए टल गई. लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस आलाकमान को वो जरूरी बहाना दे दिया था. नैतिकता जैसा शब्द और कुछ नहीं तो कम से कम एक सम्मानजनक विदाई मुहैया करवा ही सकता था.

कैसा रहा कार्यकाल

-सत्ता में आते ही अमर सिंह चौधरी ने आरक्षण में हुई 18 फीसदी बढ़ोतरी को स्थगित कर दिया.
-नर्मदा बांध परियोजना के काम को ठीक से चलाने के लिए नर्मदा कॉर्पोरेशन की स्थापना की. उनके कार्यकाल के अंत तक आधे गुजरात को सिंचाई के लिए नहर का पानी मिलने लग गया था.
-चार साल के कार्यकाल के दरम्यान तीन साल तक गुजरात सूखे की चपेट में था. राजकोट में बिगड़ती स्थिति पर काबू पाने के लिए उन्होंने गांधी नगर से राजकोट तक ट्रेन के मार्फत पानी पहुंचाया. काम के बदले अनाज योजना शुरू की.
-1985 और 1986 में अहमदाबाद में जगन्नाथ यात्रा के दौरान भयंकर दंगे हुए. ऐसे में उन्होंने 1987 में यात्रा पर रोक लगाने की बजाय उसकी इजाज़त दी. भारी पुलिस बंदोबस्त में बिना किसी हिंसा के यात्रा हुई.
-वृद्धावस्था पेंशन योजना की शुरुआत की.

अमर सिंह चौधरी कुल सात बार विधानसभा के सदस्य बने. चार बार वो अपने गृह ताल्लुके व्यारा से विधायक बने. व्यारा विधानसभा क्षेत्र दक्षिण गुजरात के तापी जिले का हिस्सा है. यह गुजरात और महाराष्ट्र का सीमावर्ती जिला है. तीन बार वो ब्रम्हखेड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे. यह विधानसभा उत्तर गुजरात राजस्थान से सटे साबरकांठा जिले का हिस्सा है. अमर सिंह गुजरात के पहले और फिलहाल तक आखिरी आदिवासी मुख्यमंत्री थे. सूबे की 18 फीसदी आदिवासी आबादी उन्हें आज भी इज्ज़त के साथ याद करती है. 15 अगस्त 2004 के रोज वो इस दुनिया से रुखसत हो गए.


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