अफ़ग़ानिस्तान की जीत का असल क़िस्सा!
अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और इंग्लैंड से कैसे जीत गया?

साल 1992. कैलेंडर पर मार्च का महीना टंगा था. पेशावर के कच्चा घरी रेफ़्यूजी कैंप में चहल-पहल लौट आई थी. बर्फीली हवाओं वाला मौसम पीछे छूटने लगा था. बच्चों को बाहर खेलने की छूट मिल चुकी थी. उस रोज़ जैसे ही शाम ढली, पेशावर का आसमान गोलियों और धमाकों की आवाज़ से दहलने लगा.
पेशावर, अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के पास में है. उन दिनों अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीन आपस में लड़ रहे थे. उनके बीच गोलीबारी आम थी. कभी-कभार झड़प पाकिस्तान की सीमा तक भी पहुंच जाती थी. मगर उस शाम का मंज़र कुछ अलग था. थोड़ी देर बाद पता चला, पाकिस्तान की क्रिकेट टीम ने वर्ल्ड कप जीता है. गोलियों और पटाखों से जश्न मनाया जा रहा है.
इस घटना ने कच्चा घरी कैंप में एक जुनून को जन्म दिया. जिसकी बुनियाद पर अफ़ग़ानिस्तान की क्रिकेट टीम की इबारत रची गई. वो टीम, जिसने 23 अक्टूबर 2023 के रोज़ पाकिस्तान को 08 विकेट से हरा दिया. अफ़ग़ानिस्तान ने पूरे मैच में अपना दबदबा बनाकर रखा. एक पल को भी ऐसा नहीं लगा कि वे कोई नौसिखिया टीम हैं. इससे पहले वे गत-विजेता इंग्लैंड को मात दे चुके हैं.
ये वही टीम है, जिसकी शुरुआत जंग, आतंकवाद और विस्थापन के बीच हुई. जिसके खिलाड़ियों ने शरणार्थी कैंप्स की गलियों में क्रिकेट सीखा. और, जिनके पास अपना कहने के लिए एक क्रिकेट का मैदान तक नहीं था. आज वे उन सबसे आगे निकल आए हैं. जैसा कि लोग कहते हैं, ये किसी उलटफेर की नहीं बल्कि अफ़ग़ान क्रिकेट के अभूतपूर्व उदय की कहानी है.
तो, आइए जानते हैं,
- अफ़ग़ान क्रिकेट की बुनियाद कैसे रखी गई?
- राख से उपजी टीम शिखर तक कैसे पहुंची?
- और, इस सफर में भारत की क्या भूमिका रही है?
अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट का पहला रिकॉर्ड 19वीं सदी का मिलता है. ब्रिटिश सैनिक ये खेल अपने साथ लेकर गए थे. दरअसल, ब्रिटेन ने कई दफ़ा अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़े की कोशिश की. लेकिन कभी शांति से शासन नहीं कर सके. हर बार उन्हें सिर झुकाकर वापस लौटना पड़ा. इसलिए, उनके टाइम में क्रिकेट पनप नहीं सका.
20वीं सदी में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ का प्रभाव पड़ा. विचारधारा से लेकर रहन-सहन और संस्कृति तक में उनकी छाप दिखी. वहां क्रिकेट का कोई नामलेवा नहीं था. जब एक तरफ़ ब्रिटेन के उपनिवेशों में ये खेल लोकप्रिय हो रहा था, अफ़ग़ानिस्तान में इसकी पूछ नहीं थी.
फिर आया 1979 का साल. सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया. मुजाहिदीन विरोध में उतरे. उन्हें अमेरिका, पाकिस्तान, सऊदी अरब और दूसरे इस्लामी देशों का सपोर्ट मिला. जंग शुरू हुई और 1989 तक चली. इस बीच में लाखों अफ़ग़ान लोगों को घर-बार छोड़कर भागना पड़ा. सबसे ज़्यादा शरणार्थी पाकिस्तान पहुंचे. जिनके पास पैसा था, वे राजधानी इस्लामाबाद और दूसरे बड़े शहरों में रहने लगे. लेकिन अधिकतर जनता ग़रीब थी. उन्हें पेशावर और आसपास के शरणार्थी कैंप्स में शरण लेनी पड़ी. यहीं पर उनका साबका क्रिकेट से पड़ा. 1992 वर्ल्ड कप के बाद वे इस तरफ़ आकर्षित हुए. कुछ जुनूनी लोगों ने नेशनल टीम बनाने का ख़्वाब देखा. ऐसे ही एक शख़्स थे, ताज मलिक. उन्हें अफ़ग़ान क्रिकेट का जनक कहा जाता है.
मलिक अफ़ग़ानिस्तान के नांगरहार में पैदा हुए थे. 04 बरस के थे, जब सोवियत-अफ़ग़ान वॉर शुरू हो गया. मलिक के परिवार को भागना पड़ा. वे कच्चा घरी कैंप में रहने लगे. उसी टाइम पर पाकिस्तान क्रिकेट का उभार हो रहा था. मलिक को भी चस्का लगा. उन्होंने क्रिकेट सीखा. खेले भी. पाकिस्तान की वर्ल्ड कप जीत के बाद अपनी टीम बनाने निकले. खिलाड़ियों की तलाश शुरू हुई. मलिक ने रेफ़्यूज़ी कैंप्स का दौरा किया. लेकिन अधिकतर दरवाज़ों से उन्हें निराश लौटना पड़ा. लड़कों के पास एक ही विकल्प था - या तो मज़दूरी कर घर चलाएं या क्रिकेट खेलें. हालांकि, मलिक को काम भर के खिलाड़ी मिल गए. फिर कैंप में ही अफ़ग़ान क्रिकेट क्लब (ACC) की नींव रखी गई. उन्हें पाकिस्तान के लोकल टूर्नामेंट्स में खेलने का मौका मिलने लगा. जल्दी ही वे ख़ुद को साबित करने लगे थे.
इसी बीच अल्लाह दाद नूरी नाम के एक क्रिकेटर ने अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट फ़ेडरेशन (ACF) बना लिया. इसे अब अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (ACB) के नाम से जाना जाता है.
फिर मलिक के क्लब और नूरी के फ़ेडरेशन में तकरार चली. कुछ समय बाद मामला सुलझ गया. दोनों ने साथ आने का फ़ैसला किया. नूरी को बोर्ड की चेयरमैनशिप मिली. मलिक बोर्ड के जनरल-सेक्रेटरी और टीम के कोच बन गए.
फिर आया 1996 का साल. तालिबान ने सत्ता हथिया ली. सभी स्पोर्ट्स पर बैन लगा दिया. क्रिकेट भी इसकी चपेट में आया. क्रिकेट से बैन 2000 के साल में हटा. इसके अगले ही बरस अमेरिका पर 9/11 का हमला हुआ. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में वॉर ऑन टेरर शुरू कर दिया. एक बार फिर मुल्क जंग की चपेट में आया. पलायन और विस्थापन का सिलसिला शुरू हुआ.
दश्त और दहशत के बीच एक खुशखबरी भी आई. 2001 में ही इंटरनैशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) ने अफ़ग़ानिस्तान को एफ़िलिएट मेंबरशिप दी. अब वे ICC के प्लान का हिस्सा बन चुके थे. हालांकि, मंज़िल अभी दूर थी. वर्ल्ड कप के लेवल तक पहुंचने में उन्हें पांच पड़ाव पार करने थे. मगर उनका हौसला बुलंद था.
इसकी झलक शुरुआती दिनों में ही दिखने लगी थी.
2006 में वे एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) ट्रॉफ़ी के सेमीफ़ाइनल में पहुंचे.
2007 में ACC टी-20 कप में संयुक्त विजेता रहे.
2009 में वर्ल्ड कप क़्वालीफ़ायर्स का हिस्सा बने. लेकिन ऐन मौके पर चूक हुई. और, उन्हें रेस से बाहर होना पड़ा. टीम 2011 के वनडे वर्ल्ड कप में दाखिल होने की दावेदार थी. लेकिन उस हार ने उन्हें बड़ा झटका दिया था. हालांकि, वे वनडे इंटरनैशनल खेलने के भागीदार बन चुके थे.
उसके बाद से टीम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
2010 में टी20 वर्ल्ड कप के लिए क़्वालीफ़ाई किया. उसके बाद से सारे टी20 वर्ल्ड कप खेले हैं.
2015 में पहली बार वनडे वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया. सिर्फ एक मैच जीत सके. स्कॉटलैंड के ख़िलाफ़.
2019 में दूसरी बार वनडे वर्ल्ड कप खेले. इस दफ़ा एक भी मैच में जीत नहीं मिली.
अब 2023 चल रहा है. ये अफ़ग़ानिस्तान का तीसरा वनडे वर्ल्ड कप है. टीम ने अभी तक 05 मैच खेले हैं. उनमें से दो जीत चुके हैं. और, ये जीत उन्हें इंग्लैंड और पाकिस्तान जैसी टीमों के ख़िलाफ़ मिली है.
अफ़ग़ान टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जो रेफ़्यूज़ी कैंप में ही पैदा हुए या वहीं उनकी परवरिश हुई. वैसे भी अफ़ग़ानिस्तान में शायद ही कोई ऐसा शख़्स होगा, जो 04 दशकों के हिंसक संघर्ष की चपेट में ना आया हो. उनकी क्रिकेट टीम इस तथ्य का सटीक उदाहरण है. टीम की जान मोहम्मद नबी पेशावर के कैंप में पैदा हुए थे. राशिद ख़ान का बचपन रेफ़्यूज़ी कैंप में बीता. ओपनर बल्लेबाज़ रहमनुल्लाह गुरबाज़ ने क्रिकेट किट खरीदने के लिए मज़दूरी की. ऐसे ही कई और क़िस्से आपको मिल जाएंगे

