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बालासाहब का वो बोलर दोस्त, जिसने पाकिस्तानी लेजेंड को अपना बकरा बना लिया था!

रमाकांत देसाई, जिनकी बाउंसर्स पाकिस्तान के लेजेंड नहीं झेल पाते थे.

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20 जून 2022 (अपडेटेड: 20 जून 2022, 08:23 PM IST)
balasaheb thackeray - Ramakant Desai
बालासाहब ठाकरे - रमाकांत देसाई
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क्रिकेट. अपन को इस गेम में दो चीज़ें बड़ी मस्त लगती हैं. झमाझम बल्लेबाजी या फिर बढ़िया, फर्राटे मारती तेज गेंदबाजी. ऐसी गेंदबाजी जो बल्लेबाजों के तोते उड़ा दे. जिसपर स्टंप बिखरने के बाद बल्लेबाज कह पड़े- भाई! ये क्या हो गया! ब्रेट ली, कर्टनी वॉल्श, शोएब अख्तर, मैल्कम मार्शल, मिचेल जॉनसन… क्रिकेट इतिहास में ऐसे कई नाम हुए हैं जिन्होंने पूरी दुनिया के बल्लेबाजों को डराया है. हालात ऐसे होते थे कि बल्लेबाज इनके सामने रन बनाने की जगह विकेट और शरीर बचाने पर फोकस रखते थे.

और ऐसा हो भी क्यों ना… इन बोलर्स की तो पहचान ही यही थी. या तो विकेट लेंगे या फिर घायल कर छोड़ेंगे. गैरी कर्स्टन, मनोज प्रभाकर और एंडी लॉयड जैसे कई दिग्गज हैं जो इस बात की गवाही दे देंगे. अब उमरान मलिक के रूप में हमारे पास भी ऐसा एक बोलर है. जिसकी स्पीड से दुनिया डरती है. लेकिन आज हम आपको एक ऐसे दिग्गज की कहानी सुनाएंगे जो आज से कई दशक पहले अपनी गेंदों से सबको डराता था. वो दिग्गज, जिसके साथ ट्रेन में ट्रेवल करते-करते बालासाहब ठाकरे भी क्रिकेट एक्सपर्ट हो गए थे.

सिर्फ 19 साल की उम्र में डेब्यू करने वाले रमाकांत देसाई नाम के इस इंडियन पेसर के आगे पाकिस्तानी लेजेंड हनीफ मोहम्मद का कॉन्फिडेंस भी डगमगा जाता था. हालांकि रमाकांत का करियर बहुत लंबा नहीं चला. सिर्फ 29 साल की उम्र में इन्होंने क्रिकेट को अलविदा कह दिया. लेकिन इस छोटी उम्र में रिटायर होने से पहले वह अपना नाम बना चुके थे.

रमाकांत की शुुरआत एकदम फिल्मी हुई थी. TOI के अनुसार साल 1957 की बात थी. रूपारेल कॉलेज के स्पोर्ट्स इंचार्ज जी. के मेनन ने एक दिन बढ़िया रन-अप के साथ एक दम तेज गति से गेंदबाजी कर रहे रमाकांत को नोटिस किया. और तुरंत उनका एडमिशन अपने कॉलेज में करवा दिया. कॉलेज के सेलेक्शन ट्रॉयल का किस्सा शेयर करते हुए मेनन बताते हैं,

‘कॉलेज सेलेक्शन ट्रॉयल के दौरान, उन्होंने बहुत शानदार तेज गेंद फेंकी. जिसके बाद मुबंई के हर एक मैदान में उनकी गेंदबाजी की बातें होने लगी. उनको शायद बाउंसर्स बहुत पसंद थी. लेकिन उनके कंधे बहुत मजबूत थे जो स्पीड निकालने में उनकी मदद करते थे. वह बहुत तेज थे.’

#फर्स्ट क्लास डेब्यू!

रमाकांत की गेंदबाजी देख सब ये मान बैठे थे कि ये जल्द ही इंडिया खेलेंगे. और फिर इसी सिलसिले में साल 1958 में रमाकांत का फर्स्ट क्लास डेब्यू हो गया. CCI यानी क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया की प्रेसिडेंट XI के साथ रमाकांत ने वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ़ फर्स्ट क्लास डेब्यू किया. और इस डेब्यू में ही रमाकांत ने गदर काट दिया. उन्होंने अपने पहले पांच में से तीन विकेट बोल्ड करके निकाले. फिर दूसरी पारी में भी उनके नाम तीन विकेट रहे.

#टीम इंडिया में शामिल

इस डेब्यू के कुछ ही दिन बाद रमाकांत को इंडिया की जर्सी भी मिल गई. वेस्ट इंडीज़ के इसी टूर के दौरान दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला मैदान पर खेले गए पांचवें टेस्ट में रमाकांत का इंडिया डेब्यू हुआ. और इस डेब्यू में जहां बाकी बोलर्स का हाल खराब था, वहां रमाकांत ने अकेले चार विकेट ले डाले.

#बल्लेबाजों के सर फोड़ने वाले रमाकांत

अब आप सोच रहे होंगे कि रमाकांत का खौफ़ इस डेब्यू के बाद बढ़ा होगा. लेकिन ऐसा नहीं है. डेब्यू से पहले ही वह मुंबई क्रिकेट सर्किट में खौफ़ का दूसरा नाम बन चुके थे. 1950 के दशक के आखिरी सालों में उनके खौफ़ का एक क़िस्सा चंदू पटनकर ने सुनाया था. भारत के लिए खेल चुके चंदू ने रमाकांत की बोलिंग पर खूब कीपिंग की थी. उन्होंने रमाकांत के बारे में स्पोर्टस्टार को बताया था,

‘जब वह (रमाकांत देसाई) बाउंसर डालते थे, तो खून खराबा होता था. और असल में वो भी डरते थे कि उनकी बाउंसर बल्लेबाज को चोट पहुंचाएगी. इसलिए वो ऐसी गेंद नहीं डालना चाहते थे. लेकिन विजय मांजरेकर (शिवाजी पार्क ज़िमखाना (SPG) के कप्तान) ने उनसे लगातार शॉर्ट गेंद डालने को कहा.

और इसी में एक हादसा भी हुआ. अपने बल्ले और माथे पर तिलक लगाकर खेलने वाला एक बल्लेबाज एक रोज अच्छी बैटिंग कर रहा था. और मैदान पर अपना टाइम एन्जॉय कर रहा था. और तभी रमाकांत की बाउंसर उसके माथे पर लगी और उनको हॉस्पिटल लेकर जाना पड़ा. उस समय में सिर्फ कैप्स पहनी जाती थी इसलिए वो बच भी नहीं पाया.’

#पाकिस्तानी लेजेंड को डरा कर रखा था!

लिटिल मास्टर. सुनील गावस्कर से पहले पाकिस्तान के लेजेंडरी ओपनर को हनीफ मोहम्मद को लिटिल मास्टर कहा जाता था. हनीफ मोहम्मद के कई सारे किस्से फेमस हैं. और इन तमाम क़िस्सों में एक बात कॉमन है- हनीफ बहुत कमाल के बल्लेबाज हुआ करते थे. लेकिन सुपरमैन के क्रिप्टोनाइट की तरह हनीफ का भी एक क्रिप्टोनाइट था. और इस क्रिप्टोनाइट को हम रमाकांत देसाई के नाम से जानते हैं. 

साल 196-61 में पाकिस्तान की टीम पांच टेस्ट खेलने इंडिया टूर पर आई. हनीफ ने इस सीरीज में दूसरे सबसे ज्यादा 410 रन बनाए थे. लेकिन इस फॉर्म के बावजूद रमाकांत की बाउंसर्स ने उन्हें बहुत परेशान किया.

रमाकांत ने इस सीरीज़ की नौ पारियों में हनीफ को चार बार आउट किया. और सीरीज खत्म होते-होते हनीफ को एक नया नाम मिल गया- रमाकांत का बकरा. PTI के लिए एक कॉलम लिखते हुए हनीफ मोहम्मद ने इस सीरीज़ का ज़िक्र भी किया था. हनीफ ने लिखा था,

‘इंडिया टूर की एक खराब याद रमाकांत देसाई के साथ मेरी मुठभेड़ थी. उस छोटे कद के फास्ट बॉलर ने उस टूर पर कई बार मुझे आउट किया. जिससे मेरा आत्मविश्वास हिल गया था. यह शायद इसलिए था क्योंकि वह पारंपरिक तेज गेंदबाजों जैसे नहीं थे, जो आमतौर पर लंबे होते हैं और गेंद को ऊंचाई से फेंकते है. ताकि अगर वह गेंद शॉर्ट पिच भी हो तब भी बल्लेबाज उसे समय सही समय पर पढ़ सके. देसाई के ऐसा नहीं था. उनकी शॉर्ट पिच गेंद वाकई शॉर्ट थी.’

हालांकि इतनी बेहतरीन बोलिंग के बाद भी रमाकांत लंबे वक्त तक क्रिकेट नहीं खेल पाए. उनका इंटरनेशनल करियर कुल 10 साल का ही रहा. इंग्लिश क्रिकेटर कॉलिन काउड्रे ने उनके छोटे करियर पर दिलचस्प टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था,

‘सच कहूं तो हमें किसी भारतीय गेंदबाज से जबरदस्त सटीकता के साथ बाउंसर फेंकने की उम्मीद नहीं थी. मैं लॉर्ड्स में उनके उस स्पैल में विकेट के पीछे से आउट हो गया था. मुझे लगता है कि इंडियन कैप्टन ने उनसे लम्बे स्पैल में ज्यादा गेंदबाजी करवाई. सीरीज़ के खत्म होने तक, वह थक गए थे.’

रमाकांत देसाई ने टीम इंडिया के लिए 28 टेस्ट मैच खेले. और भारत ने इनमें से चार में जीत दर्ज की.

रमाकांत की क्रिकेट जर्नी में शिवसेना के संस्थापक बालासाहब ठाकरे का भी अहम रोल था. TOI के मुताबिक साल 1960 और उसके आसपास बालासाहब, रमाकांत देसाई, बापू नाडकर्णी और माधव मंत्री के साथ ट्रेन से दादर से चर्चगेट जाया करते थे. और इस दौरान होने वाली चर्चाओं ने बालासाहब के अंदर क्रिकेट प्रेम जगाने में अहम रोल अदा किया था. इन्हीं चर्चाओं के चलते बालासाहब को क्रिकेट का अच्छा ज्ञान भी हो गया था. कहा तो यहां तक जाता है कि रमाकांत देसाई बालासाहब ठाकरे के पसंदीदा क्रिकेटर भी थे.

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