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ये है पाकिस्तान का दूसरा महानतम कप्तान, कोई शक!

मिस्बाह उल हक़ ने सिर्फ़ आंकड़ों में ही अपनी श्रेष्ठता नहीं साबित की है, उन्होंने डूबते पाकिस्तान को भरोसे की पूंजी दी है.

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19 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 19 जुलाई 2016, 11:05 AM IST)
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Image: Reuters
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'निशान-ए-हैदर है तो फौजी पुरस्कार, लेकिन जैसी बहादुरी मिस्बाह ने दिखाई है, वो इसके हक़दार हैं.'

फेमस साइट क्रिकइंफो पर लॉर्ड्स मैच की रिपोर्ट के नीचे किसी पाकिस्तानी क्रिकेट के फैन ने लिख दिया है. पढ़कर लगता है कि पाकिस्तान में इतने सालों के फौजी शासन का असर ऐसा है कि लोग क्रिकेट खिलाड़ी की तारीफ़ करते हुए भी इसी फौजी शासन के दिए मैटाफरों से घिरे रहते हैं. लेकिन अगर आपने लॉर्ड्स टेस्ट में कप्तान मिस्बाह उल हक़ के हैरतअंगेज़ सेलिब्रेशन को देखा हो तो शायद आपको इस कनेक्शन का दूसरा सुराग़ मिले. हां, देखने से पहले ये ज़रूर याद रखिएगा कि ये स्क्रीन पे दिख रहा खिलाड़ी उमर में 42 पार है, अौर लॉर्ड्स की ज़मीन पर अपना पहला टेस्ट खेलने उतरा है.

https://youtu.be/yNEIgp_Z7Hw

दरअसल कप्तान मिस्बाह उल हक़ अौर कोच मिक्की आर्थर पाकिस्तान की टीम को इंग्लैंड दौरे के पहले ट्रेनिंग अौर सही अभ्यास के लिए आर्मी बूट कैंप में एबटाबाद ले गए थे. वही एबटाबाद जिसकी मशहूरी आतंकी अोसामा बिन लादेन के नाम से साथ पूरी दुनिया में हो गई है. लॉर्ड्स में मिस्बाह ने अपने जीवन की सबसे शानदार पारी खेली, अौर 100 पूरा होने के बाद झंडे को सल्यूट किया. अौर फिर पुश-अप्स. पूरे दस.

बाद में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने बताया कि यह उनका आर्मी के दोस्तों को किया वादा था, जिन्होंने उनकी टीम को अनुशासन अौर मुश्किल में टिके रहना सिखाया. पुश-अप्स कैंप में उनके शेड्यूल का अंतिम हिस्सा होता था. "मैंने आर्मी के दोस्तों से वादा किया था कि शतक मारा तो मैं ग्राउंड में पुश-अप्स करके दिखाऊंगा", मिस्बाह के शब्द थे. वैसे यहां बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उस एबटाबाद के कैंप में भी 42 का यह कप्तान तमाम फिज़िकल ड्रिल में अौर पसीनाबहाऊ शारीरिक मेहनत में अव्वल नंबर पाता था. जो एबटाबाद की मेहनत थी, उसका असल लॉर्ड्स की ढलान पर दिखा. ना शतक में कहीं कच्चापन था, ना कसरती करिश्मे में.

शायद यह एबटाबाद के लिए भी अपनी पहचान बदलने का दूसरा मौका था, सेकंड चांस.


"ये उसके (आमिर) लिए खास मौका था. उसके लिए तो यह नई ज़िन्दगी की शुरुआत है. मुझे उम्मीद है कि वो सबको ये साबित कर सकेगा कि वो एक बहुत अच्छा क्रिकेटर है, अौर एक अच्छा इंसान. वो बहुत खुशकिस्मत है कि उसे दूसरा मौका मिला है. ये उसके लिए नई ज़िन्दगी है, एक नई शुरुआत."

दूसरा मौका. नई ज़िन्दगी. 'बदनाम' गेंदबाज़ मोहम्मद आमिर को इस बात का असल मतलब अौर वकत समझाने के लिए अपनी टीम के वर्तमान कप्तान से बेहतर इंसान चराग लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलता. मोहम्मद आमिर की 6 साल बाद वापसी का यह टेस्ट, उसी 'क्रिकेट के मक्का' मैदान लॉर्ड्स पर जहां 6 साल पहले वो कलंकित इतिहास लिखा गया था, हर लिहाज से खास था. नज़रें आमिर पर थीं, लेकिन लॉर्ड्स के अॉनर्स बोर्ड पर नाम लिखवाया उस कप्तान ने, जिसका करियर इस क्रिकेटीय 'पुनर्जन्म' की सबसे उजली मिसाल है.

मिस्बाह ने अपना पहला टेस्ट 2001 में खेला था, न्यूजीलैंड के खिलाफ़. स्कोर थे 28 अौर 10. उसके बाद अगले स्कोर 17, 10, 2, 12, 11, 17, 13 रहे अौर यह बल्लेबाज़ टीम से बाहर हो गया. वैसे भी जहां के टीनेजर्स क्रिकेट डेब्यू में विश्व कीर्तिमान बनाने के लिए मशहूर रहे हैं, उस देश में 27-28 साल की उमर में डेब्यू करने वाले बल्लेबाज़ खास आकर्षण नहीं पैदा करते. मिस्बाह स्मृतियों में बसने से पहले ही गायब हो गए.

टी-20 तो जवान खून का खेल है! अौर पलट,

मिस्बाह उल हक़ वापस खबरों में आए 2007 में, जब चयनकर्ताअों ने उन्हें क्रिकेट के नए अवतार T-20 के पहले विश्वकप के लिए चुन लिया. वो घरेलू क्रिकेट की सफ़लता के दम पर चुने गए थे, लेकिन 33 साल के इस बुढ़ाते बल्लेबाज़, जो अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट में पहले ही फ्लॉप हो चुका था, का चयन किसी को समझ ना आया. एक अोर उसे नए ज़माने के खून वाले नवेले क्रिकेट में चुना गया था, दूसरा उसे पाकिस्तानी क्रिकेट के तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ मोहम्मद यूसुफ़ की जगह चुन लिया गया था.

लेकिन मिस्बाह के लिए यह दूसरा मौका था. नई ज़िन्दगी. वो मौके को हाथ से जाने नहीं दे सकते थे.

2007 के जिस टी-20 विश्वकप ने डूबते भारत की किस्मत बदली अौर भारत को अपने सदाबहार 'कैप्टन कूल' महेन्द्र सिंह धोनी मिले, उसी ने पाकिस्तान को मिस्बाह उल हक दिया. भारतीय दर्शकों के लिए तो मिस्बाह की लास्टिंग मेमोरी उस रिवर्स स्वीप शॉट में ही बसी है, जिसे श्रीसंत ने विकेट के पीछे लपककर भारत के लिए पाकिस्तान के जबड़ों से निकाल विश्वकप जीत लिया था. लेकिन पकिस्तानी क्रिकेट के चाहनेवालों ने याद रखा कि यही बल्लेबाज़ पाकिस्तान को जीत की दहलीज तक लेकर आया था. बुढ़ाते खुटखुट बल्लेबाज़ का लेबल धुंधला गया था, 54.5 की एवरेज अौर 140 की स्ट्राइक रेट के साथ वे विश्वकप के सितारा बल्लेबाज़ थे.

उनकी बल्लेबाज़ी में एक कूलनेस थी. एक किस्म की तसल्ली, जो पाकिस्तानी क्रिकेट के बड़बोले बल्लेबाज़ों के बीच उन्हें बहुत यूनीक बना रही थी. अचानक पाकिस्तान को उनका 'राहुल द्रविड़' मिल गया था. ऐसा द्रविड़ जिसके पास तकनीक में मज़बूती के साथ बल्लेबाज़ी के तरकश में बड़े शॉट्स भी थे, अौर जो मौके-बेमौके रिवर्स स्वीप भी मारता था!

उनकी बल्लेबाज़ी के आंकड़े बता रहे थे कि वे मितव्ययी बल्लेबाज़ थे, रणनीति को अौर टीम की ज़रूरत को व्यक्तिगत माइलस्टोन से ऊपर रखने वाले. आज भी उनके वनडे के अांकड़ों को देखिए. 162 मैच अौर उनमें एक भी शतक नहीं है, लेकिन अौसत फिर भी 43 से ऊपर की, बताती है कि वो आसानी से फेल नहीं होते अौर उन पर भरोसा किया जा सकता है.

भरोसा. यह सबसे ज़रूरी शब्द था. यही वो शब्द था जिसकी शायद उस दौर में पाकिस्तानी क्रिकेट को, अौर शायद पूरे मुल्क को भी, सबसे ज़्यादा ज़रूरत पड़नेवाली थी.

पाकिस्तान का सितारा डूब रहा था, शुक्र है कि मिस्बाह थे

4 मार्च 2009. पाकिस्तान का दौरा कर रही श्रीलंका टीम की बस पर अातंकी हमला हुआ. टीम लाहौर टेस्ट के तीसरे दिन के खेल के लिए गद्दाफ़ी स्टेडियम जा रही थी, अौर 12 बंदूकधारियों ने खिलाड़ियों से भरी बस पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं. कुमार संगकारा, महेला जयवर्धने अौर तिलन समरवीरा जैसे क्रिकेटर घायलों की सूची में थे. बस, पाकिस्तान में अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट पर बैन लग गया. कोई टीम अपनी जान की बाज़ी लगाकर क्रिकेट खेलने में इंट्रेस्टेड नहीं थी.

अौर फिर अगले ही साल आया इंग्लैंड का वो दौरा, जिसने खेल की ज़मीन पर पाकिस्तान का मान चकनाचूर कर दिया. उनकी टीम के सबसे उभरते गेंदबाज़ 'क्रिकेट के मक्का' लॉर्ड्स के मैदान पर 'स्पॉट फिक्सिंग' में रंगे हाथों पकड़े गए. खिलाड़ी सस्पेंड ही नहीं हुए, जेल गए. पाकिस्तान का सितारा गर्त में जा रहा था अौर उसे एक भरोसे के हाथ की, साथ की ज़रूरत थी. ऐसे दौर में मिस्बाह उल हक़ ने टीम की कमान संभाली.

जिस तरह सौरव गांगुली ने 2000 के मैच फिक्सिंग स्कैंडल के बाद भारतीय टीम को ज़र्रे से उठाकर माहताब बनाया था, मिस्बाह ने भी किसी कुशल कारीगर की तरह बीते चंद सालों में यह काम बखूबी अंजाम दिया है. उनकी मेहनत का पसीना ही नहीं, भरोसे की नक्काशी भी टीम के अौर उनके रिकॉर्ड में नज़र आती है.

मिस्बाह ने पाकिस्तान की कप्तानी करते हुए क्या चमत्कार किया है उसे जानने के लिए ये आंकड़े देखे जा सकते हैं. उन 33 टेस्ट में जो उन्होंने कप्तान बनने से पहले खेले, मिस्बाह ने 1,008 रन बनाए 33 की एवरेज से. लेकिन कप्तान बनने के बाद से 43 टेस्ट में वे 58 की एवरेज से रन बना रहे हैं. लेकिन बल्लेबाज़ के तौर पर इस विश्वस्तरीय योगदान से भी बड़ा है वो भरोसा जो उन्होंने बिखरती टीम में अौर उम्मीद से देख रहे मुल्क के भीतर पैदा किया है. उनकी कप्तानी में पाकिस्तान ने विश्वकप सेमीफाइनल तक का सफ़र तय किया है अौर अॉस्ट्रेलिया अौर इंग्लैंड दोनों को सीरीज़ में हराया है.

इससे भी खास यह कि उन्होंने मोहम्मद हफ़ीज, अज़हर अली अौर असद शफीक़ जैसे बल्लेबाज़ों की स्वर्णिम आभा को अपने अौर यूनिस खान के तांबई अनुभव के साथ जोड़कर बीते 6 सालों में पाकिस्तानी टेस्ट टीम के लिए एक स्थाई मिडिल अॉर्डर तैयार किया है. 20 टेस्ट में जीत के साथ आज वे पाकिस्तान के सबसे सफ़ल टेस्ट कप्तान हैं. वसीम अकरम से भी सफ़ल. जावेद मियांदाद से भी सफ़ल. हां, इमरान खान से भी सफ़ल.

हां, 'महानतम' की लड़ाई शायद चलती रहेगी. वैसे भी, 42 साल के जवान मिस्बाह ने भी अभी अपने जूते कहां टांगे हैं.


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