सब 'देश बेचने वाले' की कहानी दिखाएंगे तो 'लेग ग्लांस' की बात कौन करेगा?
लगान, चक दे इंडिया, भाग मिल्खा भाग, मैरी कॉम और अब अज़हर. हर बार खेल और खिलाड़ी की कहानी सुनाते हुए बॉलीवुड 'खेल' को 'देश' से रिप्लेस क्यों कर देता है?
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फोटो - thelallantop
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एक और खिलाड़ी की कहानी सिनेमा के परदे पर आ रही है. 'अज़हर'. यह अचानक बॉलीवुड में आई उन दनादन स्पोर्ट्स बायोग्राफीज़ की अगली कड़ी है, जिन्हें 'भाग मिल्खा भाग' और 'मैरी कॉम' की सफलता के बाद बड़े निर्माताओं और प्रोडक्शन हाउसेज़ की गुप्त आपसी गॉसिप में दांव लगाने के लिए व्यावसायिक रूप से 'सुरक्षित' मान लिया गया है. धावक मिल्खा सिंह और मुक्केबाज़ मैरी कॉम के अलावा इसके पहले 'पान सिंह तोमर' और 'चक दे इंडिया' जैसी फिल्मों को भी इसी कड़ी में पढ़ा जा सकता है. जल्द ही आने वाली भारतीय क्रिकेट टीम के वर्तमान कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पर नीरज पाण्डेय की महत्वकांक्षी फिल्म का बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है.
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की 'भाग मिल्खा भाग' देखें. मिल्खा सिंह की कहानी में उनका दौड़ना और दुनिया के इस सबसे सिंपल दिखते, लेकिन सबसे चुनौतीपूर्ण खेल से उनका अनन्य प्रेम, पाकिस्तान से हिन्दुस्तान की मैदान पर जीत में सिमट जाता है. ओमंग कुमार की 'मैरी कॉम' भी मैरी की कहानी को और उनके व्यक्तिगत संघर्ष को 'मदर इंडिया' टाइप छवि में समाहित कर देती है और बैकग्राउंड पर बजते राष्ट्रगान के साथ मैरी परदे पर देशभक्ति की मूरत हो जाती हैं. इसमें देश की परिधि पर स्थित एक उपेक्षित प्रदेश की उस तरुण लड़की की छवि कहीं खो जाती है, जिसे मुक्केबाजी से प्यार हो गया था. इसमें शिमित अमीन की 'चक दे इंडिया' भी जोड़ लें, जिसमें हॉकी कोच कबीर खान के लिए खेल 'राष्ट्र' के प्रति अपनी 'वफादारी' साबित करने का एक टूल भर बनकर रह जाता है.
'पान सिंह तोमर' इनसे कुछ अलग है, क्योंकि धावक पान सिंह की कहानी 'राष्ट्र' के प्रति भक्ति की कहानी भर ना होकर उसके सामने खड़ा एक जलता सवाल है. लेकिन तिग्मांशु धूलिया की 'पान सिंह तोमर' भी खिलाड़ी की कहानी को 'राष्ट्र' की वृहत कथा से मुक्त नहीं कर पाती.
अजहर को हमने खेलते देखा है. लाइव. उनके जीवन के उन्नत शिखरों को भी. उनके जीवन की अतल गहराइयों को भी. मैगजीन्स के कवर पर उनकी फोटो. कभी नायक, कभी खलनायक. लेकिन तमाम विवादों के बाद भी आज जब मेरे भीतर का क्रिकेट प्रेमी इस नाम को याद करता है, 'अज़हर', तो सबसे पहले कलाइयों के सहारे पश्चिम की तरफ गर्त में मोड़ा जाता लेग ग्लांस ही याद आता है. बाइस गज़ की उस धूल भरी पट्टी पर देखी गई सबसे दर्शनीय और मुकम्मल अभिव्यक्तियों में से एक. उस अद्वितीय कलाई का जादू, जिसका हुनर अज़हर शायद अपने शहर हैदराबाद से दुआओं में कमा लाये थे.लेकिन यही नयनाभिराम लेग ग्लांस इस हफ्ते मुझे उदास भी करता है. उदास इसलिए कि जब इस शुक्रवार बॉलीवुड भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे विवादित कप्तान की कहानी सत्तर एम एम के परदे पर तमान रंगीनियों और अंधेरों के साथ सुनाएगा, तो उनकी सनसनीखेज़ घटनाओं से भरी ज़िन्दगी की कहानी में उस 'लेग ग्लांस' को क्या जगह मिलेगी? आशंकाओं की वजह के दो सिरे हैं. पहला, जो फिल्म के प्रचार अभियान से जुड़ता है.
"अज़हर ने अपनी टीम को, अपने देश को, अपने हज़ारों फैन्स को धोखा दिया है." "कितने में बेच दिया देश को अजहर?" "इंडिया की हार की कीमत कितनी है?"ये तीनों संवाद 'अज़हर' के पौने तीन मिनट लम्बे ट्रेलर से लिए गए हैं. इनमें पहले दो सीधे अज़हर को संबोधित हैं, और अंतिम संवाद खुद अज़हर के मुंह से बुलवाया गया है. बालाजी की 'अज़हर' में इमरान हाशमी भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन की भूमिका में हैं और कई दृश्यों में मैदान पर क्रिकेट खेलते भी दिखाई देते हैं. तीन मिनट से भी कम के ट्रेलर में 'देश' शब्द की गूँज कई बार सुनाई देती है, लेकिन उनका सिग्नेचर 'लेग ग्लांस' कहीं दिखाई नहीं देता.
इसके आगे, इस आशंका को बलवती बनाने वाली दूसरी वजह है खेल पर बनी हालिया बॉलीवुड फिल्मों का वो टेम्पलेट, जिसमें वो हर खिलाड़ी की कहानी को 'राष्ट्र' की कहानी में समेट देता है.लोकप्रिय हिंदी सिनेमा में खेलों के इस्तेमाल पर बहुत सालों तक अघोषित प्रतिबन्ध रहा. हालाँकि ये आश्चर्यजनक था कि भारत में मनोरंजन के दो सबसे बड़े माध्यम यूं एक-दूसरे से दूर अजनबियों की तरह खड़े थे. 'हिप हिप हुर्रे', 'अव्वल नंबर' से लेकर 'चमत्कार' तक कुछ अपवाद हैं, लेकिन आमिर खान की मैग्नमओपस 'लगान' से पहले तक यह जोड़ा कभी प्रचलन में नहीं आ पाया. खुद 'लगान' के प्रमोशन में क्रिकेट की कहानी को अंतिम मौके तक छिपाया गया और फिल्म को 'राष्ट्रवाद' की चाशनी में लपेटकर बेचा गया. लेकिन लगान की सफलता ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए. पर इसके साथ ही एक और बीज पड़ गया था, जिसके नतीजे हम आज के सिनेमा में अच्छे से देख रहे हैं. ये बीज था खेलों और खिलाड़ियों की कथाओं को 'राष्ट्रवाद' की भावना से पगी कथाओं का स्थानापन्न बनाकर पेश करना. 90s और 2000 के शुरुआती सालों में 'ग़दर' से लेकर 'ज़मीन' तक जो उग्र राष्ट्रवाद की कहानियां हिंदी सिनेमा दिखा रहा था, 2010 के बाद उनका स्थानापन्न सिनेमा ने मिल्खा सिंह और मैरी कॉम की कहानियों में खोज लिया. लेकिन इनका एक साइड इफ़ेक्ट भी था. खेलों की इन कहानियों में खुद खेल ही कहीं हाशिये पर चला गया.
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की 'भाग मिल्खा भाग' देखें. मिल्खा सिंह की कहानी में उनका दौड़ना और दुनिया के इस सबसे सिंपल दिखते, लेकिन सबसे चुनौतीपूर्ण खेल से उनका अनन्य प्रेम, पाकिस्तान से हिन्दुस्तान की मैदान पर जीत में सिमट जाता है. ओमंग कुमार की 'मैरी कॉम' भी मैरी की कहानी को और उनके व्यक्तिगत संघर्ष को 'मदर इंडिया' टाइप छवि में समाहित कर देती है और बैकग्राउंड पर बजते राष्ट्रगान के साथ मैरी परदे पर देशभक्ति की मूरत हो जाती हैं. इसमें देश की परिधि पर स्थित एक उपेक्षित प्रदेश की उस तरुण लड़की की छवि कहीं खो जाती है, जिसे मुक्केबाजी से प्यार हो गया था. इसमें शिमित अमीन की 'चक दे इंडिया' भी जोड़ लें, जिसमें हॉकी कोच कबीर खान के लिए खेल 'राष्ट्र' के प्रति अपनी 'वफादारी' साबित करने का एक टूल भर बनकर रह जाता है.
'पान सिंह तोमर' इनसे कुछ अलग है, क्योंकि धावक पान सिंह की कहानी 'राष्ट्र' के प्रति भक्ति की कहानी भर ना होकर उसके सामने खड़ा एक जलता सवाल है. लेकिन तिग्मांशु धूलिया की 'पान सिंह तोमर' भी खिलाड़ी की कहानी को 'राष्ट्र' की वृहत कथा से मुक्त नहीं कर पाती.
इन तमाम फिल्मों को एक कतार में रखकर देखें तो इनमें सिर्फ खेल ही एक कॉमन थीम नहीं दिखाई देता. इनमें जितनी खेल की उपस्थिति है, उतनी ही (कई बार उससे ज्यादा) 'राष्ट्र' की उपस्थिति दिखाई देती है. खिलाड़ी का खेल से रिश्ता, जो किसी स्पोर्ट्स बायोपिक का मूल थीम होना चाहिए, इन फिल्मों में हाशिये पर चला जाता है और देशभक्ति और त्याग (देश के लिए त्याग, खेल के लिए नहीं) कथानक का मूल संदेश बन जाता है. इस टेम्पलेट की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि यह खिलाड़ियों के खेलों से रिश्ते को खुद साध्य की तरह नहीं, साधन की तरह पढ़ती हैं. जबकि आप किसी भी सच्चे खिलाड़ी से पूछें तो वो आपको बताएगा कि खेल सिर्फ साधन भर नहीं, खिलाड़ी के लिए स्वयंसाध्य होता है.सिनेमा का यह टेम्पलेट 'राष्ट्रवाद' की चाशनी तैयार करने की प्रक्रिया में उस आत्मीय उष्मा को गंवा देता है जो किसी खिलाड़ी और उसके अपने खेल से रिश्ते के मध्य मौजूद होती है. राष्ट्र खिलाड़ी के पीछे तब होता है जब वो जीतता है. लेकिन खेल खिलाड़ी का वो जीवनसाथी है जिसके सहारे खिलाड़ी हार से जन्मे उन दुर्गम क्षणों को जीता है जब उसका राष्ट्र उससे मुँह फिरा लेता है. जैसा मैंने 'मैरी कॉम' के सन्दर्भ में लिखा था, खेल स्वयं में एक जीवनपद्धति है और यह खिलाड़ी का व्यक्तित्व गढ़ता है.
जब लाल बजरी पर खड़े रफ़ेल नाडाल रेकैट के एक प्रहार से सामान्य सी दिखती गेंद में अकल्पनीय घूर्णन भर देते हैं, जब मोहम्मद अजहरुद्दीन अपनी तरफ आती गेंद को कलाइयों के सहारे फाइन लेग की तरफ़ मोड़ते हैं, जब लियोनल मैसी अपनी अपूर्व चपलता के मध्य उस गांडीवधारी सी एकाग्रता भरते हैं और रक्षकपंक्ति को छिन्न-भिन्न करते मछली की आँख सरीख़े उस गोलपोस्ट की ओर बढ़ते हैं, यह सभी अपने आप में मुकम्मल अभिव्यक्तियां हैं और इन्हें भाव की पूर्णता के लिए किसी 'राष्ट्रवादी' पुछल्ले की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.

