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  • Din Gulzar Four poems from Gulzar's poetry collection a tribute to Pluto

ये सब के सब जनाज़े हैं किसानों के, जिन्होंने क़र्ज़ की मिट्टी चबाकर ख़ुदकुशी कर ली!

दिन गुलज़ार में आज गुलज़ार के कविता-संग्रह ‘प्लूटो’ से चार कविताएं.

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20 अगस्त 2016 (अपडेटेड: 20 अगस्त 2016, 12:28 PM IST)
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गुलज़ार! वो जो किसी की कमर के बल पर नदी को मोड़ देता है. वो जो किसी की हंसी सुनवा के फ़सलों को पकवा देता है. वो जो गोरा रंग देकर काला हो जाना चाहता है. वो जिसका दिल अब भी बच्चा है. वो जिसके ख्वाब कमीने हैं. वो जो ठहरा रहता है और ज़मीन चलने लगती है. वो जिसकी आंखों को वीज़ा नहीं लगता. वो जो सांसों में किमाम की खुशबू लिए घूमता है. वो जिसका आना गर्मियों की लू हो जाता है. वो जो दिन निचोड़ रात की मटकी खोल लेता है. वो जो आंखों में महके हुए राज़ खोज लेता है. वो जो बिस्मिल है. वो जो बहना चाहता है. वो जो हल्के-हल्के बोलना चाहता है. वो जिसने कभी चाकू की नोक पर कलेजा रख दिया था. वो जो है तो सब कोरमा, नहीं हो तो सत्तू भी नहीं. वो जिसे अब कोई इंतज़ार नहीं. जन्मदिन का दिन गुजर गया, पर दिन अब भी गुलज़ार है. वाणी प्रकाशन को थैंक्यू वाली चिट्ठियां भेज-भेज हम आपको उनकी रचनाएं पढ़ा रहे हैं.
6869किताब का ब्योरा कुछ यूं कि ISBN:978-93-5072-598-6 है, नंबर कमाल की चीज होते हैं. ये किताब खोजोगे तो पेपर बाउंड में भी मिल जाएगी और हार्ड बाउंड में भी. कुल 144 पन्ने है. 12 को उसी से गुणा कीजिए. कीमत 200. हार्ड बाउंड की 300. किताब उर्दू में भी मिल जाएगी. पन्ने पलटाने के शौक़ीन हो तो खरीदकर पढ़ना. प्लूटो’ से प्लेनेट का रुतबा तो हाल ही में छिना है. साईंसदानों ने कह दिया, “जाओ... हम तुम्हें अपने नौ ग्रहों में नहीं गिनते... तुम प्लेनेट... के नहीं हो!” मेरा रुतबा तो बहुत पहले ही छिन गया था, जब घरवालों ने कह दिया, “बिजनेस फ़ैमली में ये ‘मीरासी’ कहां से आ गया!” ख़ामोशी कहती थी तुम हम में से नहीं हो! अब ‘प्लूटो’ की उदासी देखकर, मेरा जी बैठ जाता है. बहुत दूर है... बहुत छोटा है... मेरे पास जितनी छोटी-छोटी नज़्में थीं सब उसके नाम कर दीं. बहुत से लम्हे छोटे, बहुत छोटे होते हैं. अक्सर खो जाते हैं. मुझे शौक़ है उन्हें जमा करने का। मौज़ू के ऐतबार से, इस मजमूए में बहुत सी नज़्में ग़ैर-रिवायती हैं... लेकिन वो क्या बुरी बात है? —गुलज़ार
मैं लफ़्ज़ों के अंदर... मैं लफ़्ज़ों के अंदर लपेटे हुए लफ़्ज़ और लाइनों को गिरहों पे गिरहें बांधकर नज़्म का एक पलता बनाकर कटी नब्ज़ से बहता खूं रोकने की सई कर रहा था! ये अल्फ़ाज़ हथियार की धार तो कुंद कर सकते हैं पर ये बहते हुए एक मज़लूम के ख़ून को रोक सकते नहीं!! एक ख़याल को... एक ख़याल को कागज़ पर दफ़नाया तो इक नज़्म ने आंखें खोल के देखा ढेरों लफ़्ज़ों के नीचे वो दबी हुई थी! सहमी-सी, इक मद्धम-सी, आवाज़ की भाप उड़ी कानों तक क्यों इतने लफ़्ज़ों में मुझको चुनते हो बांहें कस दी हैं मिसरों की तशबीहों के पर्दे में, हर जुंबिश तह कर देते हो! इतनी ईंटें लगती हैं क्या एक ख़याल दफ़नाने में? ज़रा अल्लामा को कोई ख़बर कर दे... ज़रा अल्लामा को कोई ख़बर कर दे कि जिन खेतों से दहकां को मयस्सर न हुई रोटी किसी ने खेत में जाकर जलाया ही नहीं गंदम के गोशों को... कहीं कोई नहीं उट्ठा, न कोई इन्क़लाब आया! जनाज़े उठ रहे हैं गांव-गांव से ये सब के सब जनाज़े हैं किसानों के जिन्होंने क़र्ज़ की मिट्टी चबाकर ख़ुदकुशी कर ली! ख़्वाब तो देखता रहता हूं.. ख़्वाब तो देखता रहता हूं मैं, मुश्किल ये है आंख खुलने पे भी ख़्वाबों के चकत्ते नहीं जाते आंख खुलती है तो कुछ देर महक रहती है पलकों के तले सूख जाते हैं तो कुछ रोज़ में गिर जाते हैं, बासी होकर ज़र्द-से रेज़े हैं उड़ते हैं फिर आंखों में महीनों! मेरी आंखों से तो दरिया भी गुज़रते हैं मगर दाग़ लग जायें तो धुलते नहीं ख़्वाबों के कभी!

बेसबब मुस्कुरा रहा है चांद, कोई साज़िश छुपा रहा है चांद

दिल अगर है तो दर्द भी होगा, उसका कोई नहीं है हल शायद

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