37 साल पहले पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, अब महिला ने 10वीं के पेपर में कमाल कर दिया
जानिए वो पांच छोटे-छोटे काम जिन्हें करके आप अपनी मां को एम्पावर कर सकते हैं.

लिंक्डइन पर एक शख्स ने बड़ी प्यारी स्टोरी शेयर की है. शख्स का नाम है प्रसाद जम्भाले. उनकी मां ने स्कूल छूटने के 37 साल बाद फिर से पढ़ाई शुरू की और 10वीं का एग्जाम पास कर लिया. और बस पास नहीं किया, 79 परसेंट के साथ पास किया है. उनकी मां का नाम कल्पना अच्युत है.
प्रसाद ने लिखा कि जब उनकी मां 16 साल की थीं, तब उनके पिता अचानक गुज़र गए और उनके परिवार में आर्थिक संकट आ गया. इस वजह से उनकी मां को पढ़ाई छोडऩी पड़ी और काम शुरू करना पड़ा. प्रसाद ने लिखा,
प्रसाद बताते हैं कि जब वो भारत आए तब उनकी मां ने उन्हें अपनी नोटबुक्स दिखाई. वो ये देखकर हैरान थे कि उनकी मां अंग्रेज़ी और गणित में कितनी तेज़ हैं. प्रसाद की शादी फरवरी में थी और उनकी मां की परीक्षा मार्च में. इसके बाद भी उनकी मां ने सबकुछ मैनेज किया और अच्छे नंबर्स से एग्ज़ाम पास किया. उनके 79.6 प्रतिशत मार्क्स आए हैं.
प्रसाद लिखते हैं,
प्रसाद के इस पोस्ट पर लाखों लाइक और रिएक्शन्स आए. प्रसाद ने कहा कि ये देखकर उनकी मां बहुत खुश हुईं. लोगों ने सरकार की स्कीम और जगह के बारे में पूछा था. प्रसाद ने बताया कि उनकी मां मुंबई में रहती हैं. स्कीम का फायदा लेने के लिए आप मुंबई के किसी BMC स्कूल में जाकर नाईट क्लास में एडमिशन देने के लिए कह सकते हैं.
ये तो थी एक प्यारी सी खबर, विमेन एम्पावरमेंट की. पर जब भी हम विमेन एम्पावरमेंट यानी महिला सशक्तिकरण जैसे भारी भारी शब्द सुनते हैं. हमें लगता है कि ये तो मिशन वाला काम है. सरकारी स्कीमें इस नाम पर बनती हैं. पर एक्चुअली एम्पावरमेंट ऐसे छोटे-छोटे स्टेप्स से भी हो सकता है. हो सकता है आपने भी अपनी मां को बचपन से स्ट्रगल करते देखा हो, कई मामलों में जूझते देखा हो. तो चलिए हम 5 ऐसे तरीकों पर बात करते हैं, जिनके ज़रिए हम अपनी मम्मियों को, घर की महिलाओं को एम्पावर कर सकते हैं.
नंबर 1- घर के कामों में मदद करिएमम्मियां तो मल्टीटास्कर होती हैं. पता नहीं वो सब कैसे मैनेज कर लेती हैं. नाश्ता, खाना,घर की सफाई, कपड़े, किचन और न जाने क्या क्या. हम अकसर मम्मियों की तारीफों में ऐसा कहते हैं. और सोचते हैं अप्रीशिऐट कर के हमने अपने हिस्से का काम पूरा कर दिया. पर नहीं, हमे ज़रूरत है कि हम काम में उनका हाथ बटाएं. अकेले पूरे घर का बोझ उनपर डालने के बजाय, कुछ ज़िम्मेदारी अपने नाम लें. वो डस्टिंग से लेकर कपड़े सुखाने तक जैसा कोई भी काम हो सकता है.इससे होगा ये कि उन्हें अपने मन का कोई काम करने के लिए थोड़ा वक्त मिलेगा.
कुछ को सुनकर अजीब लग सकता है पर आज भी कई घरों में मम्मियां आखिर में खाना खाती हैं. वो यही कहेंगी कि अरे तुम बैठो, हम गर्म रोटियां सेक कर दे रहे हैं या गर्म पूरियां छानकर दे रहे हैं. वो साथ बैठने के लिए मानती ही नहीं है. यहां ज़रूरत है आपको उन्हें पुश करने की. माने कहने की कि भई चलो, हम तभी खायेंगे जब आप खाओगी. पहुच जाओ किचन में, साथ खड़े होकर पूरियां निकाल लो और कहो अब चलो. साथ खाने. और ऐसा मेहमानों के आने पर भी करो. कई घरों में रोज़ तो फिर फिर भी मम्मी साथ खा लेती हैं पर मेहमानों के आने पर वो किचन में ही लगी रह जाती हैं और अंत में खाती हैं. इसे बदलने की ज़रूरत है. ताकि घर की औरतों में बराबरी का भाव आए. किसी दिन भूख लगने पर सबसे पहले खा लेने पर उन्हें गिल्ट न हो.
नंबर 3- फाइनेंशियल फैसले लेने दीजियेमिडिल क्लास घरों में औरतें अक्सर कुछ भी खरीदने से पहले परमिशन लेती हैं. परमिशन लीव एप्लीकेशन टाइप नहीं, पर ऐसे बाकि मेम्बेर्स से ओपिनियन लेती हैं. क्या ये ले लूं. साड़ी थोड़ी महंगी तो अपने बच्चे से पूछने लगती हैं, लें या ना लें. हमें ज़रूरत है कि हम उन्हें खुद फैसले लेने के लिए मोटीवेट करें. हम कहें, मम्मी आपके पैसे हैं, चाहे जैसे खर्च करो. आपको वो खर्च के लिए किसी से परमिशन या राय लेने की ज़रूरत नहीं है.फाइनेंशियल फैसले खुद लेना किसी भी व्यक्ति के लिए एक बड़ा कॉन्फिडेंस बूस्टर होता है.
नंबर 4- उनकी भी राय लीजिए.एक किस्सा बताती हूं. मैं उत्तरप्रदेश चुनाव कवर करने फील्ड पर थी. महिलाओं से बात कर रही थी. पीछे से उनके घर के पुरुष बोले, अरे उन्हें रहने दो. उन्हें राजनीति के बारे में क्या पता. मैंने कहा, वोट देने जाती हैं. अधिकार है. वैसे ही अपनी पसंद के नेता के बारे में बात करने का भी अधिकार है.
हम कई बार कुछ मामलों में महिलाओं की राय ही नहीं लेते. सीधे ख़ारिज कर देते हैं. ये कहकर कि उन्हें क्या ही पता होगा. घर में टाइल लगवानी हो या होटल में खाने जाना हो. हो सकता है वो अपने सीमित दायरे के हिसाब से बताएं, पर उन्हें सुनिए ज़रूर. उन्हें बात रखने का स्पेस दीजिये. उनकी भी राय को उतना ही महत्व दीजिये जितना बाकियों को देते हैं.
नंबर 5- गलत के खिलाफ बोलने पर हौसला दीजियेकई घरों में महिलाएं अपने साथ होने वाली ज्यादती को सहती रहती हैं. कभी प्यार के नाम पर, कभी परिवार के नाम पर.किसी बात का बुरा लगे तो अकेले में रोकर रह जाती हैं. पर कभी खुलकर बोलती नहीं है. खामोश रह जाती हैं. ऐसे में हमें ज़रूरत है कि हम उन्हें एनकरेज करें. अपने साथ हो रहे गलत के बारे में बात करने के लिए. उन्हें एहसास कराएं कि उनका स्वाभिमान, व्यक्तिव और उनकी बातें मैटर करती हैं.
इसी के साथ हम अपनी मम्मियों को उनके अधूरे सपने पूरे करने में मदद कर सकते हैं. उनकी चाहतें, इच्छाएं, कोई छूटा हुआ शौक पूछकर, उसे दोबारा शुरू करने में हेल्प कर सकते हैं. जिस एम्पावरमेंट की हम और आप बात करते हैं वो अपने घरों से इस तरह शुरू कर सकते हैं.

.webp?width=60)

