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सुधा यादव ने भाजपा के संसदीय बोर्ड में भरी सुषमा स्वराज की जगह, जानिए कौन हैं वो..

मोदीजी ने फोन पर मेरा हाल चाल पूछा. फिर कहा राष्ट्र और क्षेत्र को भी मेरी ज़रूरत है.

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17 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 17 अगस्त 2022, 09:14 PM IST)
Sudha Yadav
सुधा यादव हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं.
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भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड में बड़ा बदलाव किया गया है. नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं को बाहर किया गया तो वहीं कुछ नए चेहरों को शामिल किया गया.

नए सदस्यों में एक नाम सुधा यादव का भी है. भाजपा के संसदीय बोर्ड में शामिल वो इकलौती महिला हैं.

कौन हैं सुधा यादव?

भाजपा की राष्ट्रीय सचिव और पूर्व लोकसभा सांसद्द सुधा यादव हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. 16 अक्टूबर 1965 को रेवाड़ी में जन्मी सुधा संयोगवश राजनीति में आईं. 

बात 1999 की है. सुधा के पति सुखबीर सिंह यादव कारगिल में लड़ते हुए शहीद हो गए थे. उस वक्त वो बीएसफ में डिप्टी कमांडेंट थे. सुधा याद करते हुए बताती हैं,

"मेरे लिए वो वक्त काफी मुश्किल भरा था. परिवार और बच्चों को संभालने के लिए मैं लेक्चरर बनना चाहती थी. पार्टी के कुछ नेताओं ने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया लेकिन मैंने मना कर दिया."

उस वक्त हरियाणा में भाजपा के प्रदेश प्रभारी नरेंद्र मोदी हुआ करते थे. सुधा 23 साल पुरानी उस फोन कॉल को याद करते हुए कहती हैं,

"उन्होंने फोन पर मेरा हाल चाल पूछा. फिर कहा कि परिवार के साथ- साथ राष्ट्र और क्षेत्र को भी मेरी ज़रूरत है. ये बात सुनने के बाद मैं चुनाव लड़ने के लिए राज़ी हो गई."

भाजपा ने सुधा को महेंद्रगढ़ सीट से टिकट दिया. फिर चुनाव प्रचार की तैयारी शुरू हुई. चंदा इकट्ठा किया गया. इससे जुड़ा भी एक किस्सा है जो सुधा ने ही सुनाया. आज भी इस वाकये से जुड़ा वीडियो उन्होंने ट्विटर पर पिन (टॉप पर) कर के रखा है. सुधा बताती हैं,

"मोदी जी ने कहा कि मैं प्रचारक हूं. सालों पहले मैं घर गया तो मां ने 11 रुपए दिए थे. मेरा खर्च तो संगठन उठाता है इसलिए वो 11 रुपए आज भी रखे हुए हैं. उन 11 रुपए का योगदान उन्होंने मेरे चुनाव प्रचार के यज्ञ में आहुति समान दिया और बाकी कार्यकर्ताओं से कहा कि किराये के खर्च के अलावा जेब के सारे पैसे बहन को चुनाव लड़ने के लिए दें. आधे घंटे के अंदर मोदी जी के आह्वान के चलते साढ़े सात लाख रुपए आए थे."

सुधा के लिए वोट मांगने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी पहुंचे थे. नतीजे भी उनके पक्ष में ही आए. सुधा ने कांग्रेस के दिग्गज नेता राव इंद्रजीत सिंह को 1 लाख 39 हजार से अधिक वोटों से हराया था. उन्हें 56.49 फीसद वोट मिले जबकि राव इंद्रजीत 37 फीसद वोट ही पा सके. हालांकि इसके बाद सुधा 2004 और 2009 में भी लड़ने उतरीं पर जीत नहीं पाईं. 

2015 में सुधा यादव को बीजेपी ने ओबीसी मोर्चा का प्रभारी नियुक्त करके संगठन में ज़िम्मेदारी दी थी. अब जब उन्हें बीजेपी के सबसे ताकतवर संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाया गया तो कहा जा रहा है कि पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया. 'यादव फैक्टर' को वजह बताया जा रहा है. इसी 'यादव फैक्टर' की वजह से भाजपा को बिहार में झटका लगा था.

सुधा की एंट्री को लोग सुषमा स्वराज की खाली जगह भरने की तरह भी देख रहे हैं. इससे पहले सुषमा स्वराज इस पावरफुल पोजिशन पर थीं.

संसदीय बोर्ड का सदस्य होना क्यों है खास?

किसी राजनीतिक दल का संसदीय बोर्ड उस पार्टी के सबसे पावरफुल और भरोसेमंद नेताओं की कमिटी होती है. पार्टी की ओर से देश में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार कौन होगा ये तक संसदीय बोर्ड ही तय करता है. इस बोर्ड में कुल 11 लोग होते हैं. इनमें से एक पार्टी अध्यक्ष होता है, और बाकी  10 दल के मेम्बर होते हैं. सभी बड़े फैसले लेने का अधिकार इसी बोर्ड के पास होता है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पार्टी किसके साथ गठबंधन करेगी ये भी संसदीय बोर्ड के सदस्यों को ही तय करना होता हैं. भाजपा के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष जे पी नड्डा और सचिव बीएल संतोष हैं. इनके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, इकबाल सिंह लालपुरा, सुधा यादव, सत्यनारायण जटिया, सर्बानंद सोनोवाल और के लक्ष्मण सदस्य हैं. 

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