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आज़ाद भारत की पहली लोकसभा की इन महिलाओं के बारे में जानते हैं आप?

अमृत महोत्सव पर जानिए देश की पहली संसद की महिलाओं के बारे में.

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first women to be elected in loksabha
सुभद्रा जोशी, अनूसुयाबाई काले, विजयलक्षमी पंडित (फोटो - फाइल)
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ऑडनारी
15 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 15 अगस्त 2022, 05:26 PM IST)
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देश के पहले लोकसभा चुनाव हुए 1952 में. इस कैबिनेट में 24 महिलाएं शामिल थीं. 2019 में हुए 17वें लोकसभा चुनाव में 78 महिला सांसद चुनी गईं. और, ये आज तक का सबसे बड़ा नंबर है. आज हम आज़ादी के 75 सालों का जश्न मना रहे हैं. अमृत महोत्सव. लेकिन लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी की शुरुआत कहां से हुई थी? पहली लोकसभा में वो महिलाएं कौन थीं, जिन्होंने देश की लोकतांत्रिक यात्रा में अहम भूमिका निभाई? आइए जानते हैं उन महिलाओं के बारे में, जो देश की सबसे पहली संसद का हिस्सा थीं.

इस सीरीज़ का पहला भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

रेणु चक्रवर्ती 

जन्म 1917 में हुआ. कोलकाता में. लोरेटो हाउस और कैंब्रिज से पढ़ाई की. इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन की सदस्य बन गईं. 1938 में भारत वापस लौटीं, तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की सदस्यता ले ली. शुरुआत में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलकाता में बतौर लिटरेचर, इंग्लिश पढ़ाया.

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(फोटो - विकी)

इसके बाद उन्होंने रानी मित्र दासगुप्ता और मणिकुंतला सेन के साथ मिलकर 'महिला आत्म रक्षा समिति' बनाने में अहम भूमिका निभाई. निखिल चक्रवर्ती से शादी की. निखिल अपने ज़माने के मशहूर जर्नलिस्ट माने जाते हैं. बसीरहाट की सीट से 1952 का चुनाव उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ़ से लड़ा. जीत भी गईं. 1957 में भी जीत गईं. इसके बाद 1962 में उन्होंने बैरकपुर से चुनाव लड़ा और जीतीं. 1964 में जब वैचारिक मतभेद की वजह से कम्युनिस्ट पार्टी के दो हिस्से हुए, तब उन्होंने CPI के साथ रहना चुना. 1967 के चुनाव में वो नई पार्टी CPI(M) के उम्मीदवार मोहम्मद इस्माइल से हार गईं. 1971 में भी ऐसा ही हुआ.

विजयलक्ष्मी पंडित

जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी आज़ादी की लड़ाई में दो बार जेल गई थीं. पति रणजीत सीताराम पंडित की मौत के बाद वो अपनी तीन बेटियों को पालने के लिए अकेली रह गई थीं. उस समय औरतों को उनके पति की सम्पत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था, तो वो अपने करियर के लिए अमेरिका गईं. आज़ादी से भी पहले जब 1937 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास हुआ था तब उनको यूनाइटेड प्रोविंसेज (आज का उत्तर प्रदेश) का हेल्थ मिनिस्टर बनाया गया था. इस तरह आज़ादी से पहले की भी कैबिनेट में वो पहली महिला मंत्री हुईं. कांग्रेस के टिकट पर लखनऊ सेन्ट्रल से जीती थीं. जब वो संसद में थीं, तब उनके पार्लियामेंट सेक्रेटरी अपनी पॉकेट में सूई-धागा लेकर जाते थे कि अगर कहीं उनको ज़रूरत पड़ी तो. वो उनको ये समझाने की कोशिश करती थीं कि उनको इस तरह की मदद नहीं चाहिए. वो राष्ट्रपति पद के लिए भी कोशिश करना चाहती थीं, लेकिन उनकी जगह नीलम संजीव रेड्डी को चुना गया और वो जीत कर राष्ट्रपति हुए थे.

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विजयलक्षमी बाई (फोटो - विकी)
अनसूयाबाई पुरुषोत्तम काले

नागपुर सीट से पहली लोकसभा में जाने वाली सदस्य थीं श्रीमती अनसूयाबाई. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था. इसके पहले, 1928 में वो एसेम्बली ऑफ़ सेन्ट्रल प्रोविंसेज़ एंड बरार की सदस्य रह चुकी थीं. इस एसेम्बली की वो पहली नॉमिनेटेड महिला सदस्य थीं. 1930 में उन्होंने विधान परिषद से इस्तीफ़ा दे दिया और गांधीजी के साथ मध्य प्रांतों में छुआछूत के ख़िलाफ़ अभियान में जुड़ गईं. अनसूयाबाई 1935 में नागपुर कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष थीं और 1936 में केंद्रीय हरिजन सम्मेलन की अध्यक्षता भी की. 1937 में सेन्ट्रल प्रोविंसेज की लेजिस्लेटिव असेम्बली में डिप्टी स्पीकर के पद पर थीं. हर ओहदे में अनुसूयाबाई काले ने मध्य प्रदेश में आदिवासियों और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम किया.

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अनसूयाबाई काले (फोटो - विकी)

जब लोकसभा चुनाव हुए 1957 में, तब भी जीतीं. अनसूयाबाई के शुरुआती जीवन के बारे में बहुत जानकारी नहीं मिलती. पूना के फर्ग्युसन कॉलेज से पढ़ी थीं. उसके बाद बड़ौदा के बड़ौदा कॉलेज से. उनको अवध स्टेट के दीवान के परिवार से जुड़ा बताया जाता है.पुरुषोत्तम बालकृष्ण काले से उनकी शादी हुई. तीन बेटे और दो बेटियां रहे उनके. अनसूयाबाई ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस की प्रेसिडेंट भी रह चुकी थीं.

सुभद्रा जोशी

सुभद्रा का नाम भारत की आज़ादी की लड़ाई में मुखरता से लिया जाता है. गांधीवादी खेमे की नेता थीं. परिवार सियालकोट से था. जयपुर, लाहौर, और जालंधर में पढ़ाई की. जब लाहौर में पढ़ रही थीं, तब महात्मा गांधी के वर्धा वाले आश्रम में उनसे मिलने आई थीं. 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया, तब वो स्टूडेंट ही थीं.

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बलरामपुर से अटल बिहारी बाजपई को हराने वाली सुभद्रा जोशी (फोटो - विकी)

अरुणा आसफ अली के साथ मिलकर उन्होंने काम किया. जेल भी गईं. बंटवारे के समय उन्होंने पाकिस्तान से आए लोगों की देखरेख का काम किया. अनीस किदवई अपनी किताब में बताती हैं कि किस तरह वो और सुभद्रा दिल्ली के आस-पास के गांवों में जाकर मुस्लिमों को जबरन बाहर निकालने वालों का विरोध करती थीं. उन्हें भरसक रोकने की कोशिश करती थीं. आज़ादी के बाद पहली लोकसभा में वो करनाल सीट से जीतकर आईं. इसके बाद 1957 में अम्बाला से जीतीं. अपनी तीसरी लोकसभा जीत में उन्होंने इतिहास रच दिया. बलरामपुर से उन्होंने जन संघ के अटल बिहारी वाजपेयी को हरा दिया. उस चुनाव में उनके लिए मशहूर एक्टर-लेखक बलराज साहनी ने कैम्पेनिंग की थी. लेकिन इसी सीट पर 1967 में हुए चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी ने सुभद्रा जोशी को हरा दिया था. 1971 में दिल्ली की चांदनी चौक सीट से वो फिर जीतीं. 30 ऑक्टोबर 2003 को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ.

इला पाल चौधरी

ब्रिटिश भारत के कोलकाता में इला पाल चौधरी का जन्म हुआ. साल 1908 में. इनकी शादी नादिया के बड़े जमींदार अमियनारायण पाल चौधरी से हुई थी. ससुर बिप्रदास पाल चौधरी बंगाल के जाने माने इंडस्ट्रियलिस्ट थे. कम उम्र में ही इला ने कांग्रेस जॉइन कर ली थी. फिर इन्होंने नबद्वीप से चुनाव लड़ा और जीतीं. 1968 में उन्होंने कृष्णनगर का बाई इलेक्शन लड़ा और वहां से भी जीतीं. बंगाल के क्षेत्रीय कांग्रेस की जो महिला शाखा थी, उसकी लीडर वो काफी पहले ही बन चुकी थीं. 1975 में उनकी मृत्यु हुई. इंटरेस्टिंग बात ये है कि कृष्णनगर से ही इस वक़्त महुआ मोइत्रा एमपी हैं जिन्होंने हाल में काफी अटेंशन पाई जब उन्होंने फासिज्म के ऊपर अपनी पहली स्पीच दी लोकसभा में.

गंगा देवी

1916 में देहरादून में जन्मी थीं गंगा देवी. उस समय देहरादून उत्तर प्रदेश में ही था. उत्तराखंड नहीं था अस्तित्व में. महादेवी कन्या पाठशाला से स्कूली पढ़ाई करने के बाद वो DAV कॉलेज गईं पढ़ने के लिए. उसके बाद वो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से BA की डिग्री लेकर निकलीं. लखनऊ/बाराबंकी सीट जोकि आरक्षित थी अनुसूचित जाति के लिए, उससे वो पहला लोकसभा चुनाव जीतीं. यही नहीं, वो दूसरी, तीसरी, और चौथी लोकसभा की भी सदस्य रहीं. दूसरे में उन्नाव से, तीसरे और चौथे में मोहनलाल गंज सीट से. अनुसूचित जाति, जनजाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए जो स्कालरशिप बोर्ड था, उसकी भी वो सदस्य थीं. 52 से 54 तक. टी एंड कॉफ़ी बोर्ड की सदस्य भी रहीं इसी अवधि के लिए. 

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गंगा देवी (फोटो - विकी)

केन्द्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड की सदस्य रहीं 1958 से 1960 तक. ग्रामीण इलाकों में पिछड़े वर्ग की देखरेख और उनके कल्याण के लिए कई प्रक्रियाओं में उन्होंने भाग लिया. बच्चों की पढ़ाई के लिए काम किया. बाल विवाह और जाति प्रथा के खिलाफ काम किया. गांव के उद्योगों को विकसित करने में उन्होंने खास इंटरेस्ट लिया.

(ये स्टोरी हमारी साथी प्रेरणा ने लिखी है)

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