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खाना-पानी से होने वाले हेपेटाइटिस से कुछ ही दिनों में फेल हो सकता है लिवर

फुलमिनेंट हेपेटाइटिस या एक्यूट लिवर फेलियर की समस्या किसी को भी हो सकती है. इस बीमारी में कुछ ही दिनों या हफ्तों में लिवर अचानक से फेल हो जाता है.

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सरवत
| आयूष कुमार
22 दिसंबर 2023 (पब्लिश्ड: 04:45 PM IST)
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फुलमिनेंट हेपेटाइटिस या एक्यूट लिवर फेलियर की समस्या किसी को भी हो सकती है.
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हेपेटाइटिस बीमारी के बारे में आपने पहले भी सुना होगा. थोड़ी-बहुत जानकारी होगी. पर फुलमिनेंट हेपेटाइटिस (Fulminant Hepatitis) का नाम सुना है? अगर नहीं, तो इसे याद कर लीजिए. फुलमिनेंट हेपेटाइटिस, हेपेटाइटिस का ही एक खतरनाक रूप है. पता भी नहीं चलता और देखते-देखते चंद ही दिनों में लिवर फ़ेल हो जाता है. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये बीमारी आपके शरीर तक पहुंचती कैसे है? जवाब है आपके खाने और पानी से. कुछ और कारण भी हैं, जिन पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है. क्या हैं ये कारण और इस बीमारी का इलाज क्या है, जानते हैं डॉक्टर से.

फुलमिनेंट हेपेटाइटिस क्या होता है?

ये हमें बताया डॉ. कंचन मोटवानी ने.

(डॉ. कंचन मोटवानी, कंसल्टेंट, लिवर ट्रांसप्लांट, कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल)

फुलमिनेंट हेपेटाइटिस या एक्यूट लिवर फेलियर की समस्या किसी को भी हो सकती है. अगर लिवर सामान्य अवस्था में है या कमजोर है तो भी ये बीमारी हो सकती है. इस बीमारी में कुछ ही दिनों या हफ्तों में लिवर अचानक से फेल हो जाता है. इसलिए फुलमिनेंट हेपेटाइटिस का सही समय पर पता लगाना और इलाज करना बहुत जरूरी है. इस बीमारी में दिमाग पर भी असर पड़ता है, जिससे जान का खतरा भी हो सकता है.

कारण

ये बीमारी कुछ वायरल इन्फेक्शन या दवाइयों की वजह से भी हो सकती है. हेपेटाइटिस A, हेपेटाइटिस B और हेपेटाइटिस E के वायरस की वजह से ये बीमारी फैलती है. हेपेटाइटिस A और  हेपेटाइटिस E के वायरस दूषित पानी की वजह से फैलते हैं. इनकी वजह से लिवर खराब होने लगता है और ठीक से काम नहीं कर पाता. वहीं हेपेटाइटिस B का वायरस खून के जरिए फैलता है.

इसके अलावा कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट की वजह से भी लिवर खराब हो सकता है. अगर किसी ने गलती से या जानबूझकर पैरासिटामॉल जैसी दवाई ज्यादा मात्रा में खा ली तो लिवर फेल हो सकता है. ऐसा ही चूहे मारने वाली दवाई खाने से भी होता है. कई बार टीबी के मरीजों को टीबी की ज़्यादा दवाई लेने से लिवर की समस्या हो सकती है. ऐसे में टीबी के मरीजों को समय-समय पर लिवर की जांच जरूर करानी चाहिए. प्रेग्नेंट महिलाओं में भी ये बीमारी देखी गई है, लेकिन ऐसे मामले बेहद कम हैं.

लक्षण

कुछ लक्षणों पर ध्यान देने से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है. जैसे,

- बुखार,

- उल्टी होना, पेट दर्द,

- नाक-कान, मुंह से खून आना

- भूख न लगना और पीलिया.

अगर किसी को पीलिया है तो ऐसे व्यक्ति को तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए. सही समय पर इस बीमारी का इलाज नहीं किया गया तो इसका असर दिमाग पर भी पड़ सकता है. इस वजह से मरीज कोमा में भी जा सकता है.

इलाज

इस बीमारी का पता लगाने के लिए कुछ टेस्ट किए जाते हैं. जैसे कि लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT Test). इस टेस्ट में पीलिया और लिवर की जांच की जाती है. लिवर बॉडी में ऐसा पदार्थ बनाता है जिससे खून जमने में मदद मिलती है. अगर लिवर खराब है तो खून पतला हो जाता है और ब्लीडिंग का खतरा होता है. इसके लिए PT-INR टेस्ट किया जाता है. पेट की सोनोग्राफी करने से भी लिवर की हालत के बारे में पता चलता है. इस बीमारी का समय रहते पता लगाना और इलाज करना बेहद जरूरी है. अगर इलाज नहीं किया गया तो मरीज के दिमाग को खतरा हो सकता है. वो कोमा में जा सकता है और जान का खतरा भी हो सकता है.

लिवर को ठीक करने के लिए कोई दवाई मौजूद नहीं है. अगर लिवर फेलियर हेपेटाइटिस A और E के वायरस की वजह से हुआ है तो ये अपने आप ठीक हो जाता है. लेकिन लिवर फेलियर अगर किसी और वजह से हुआ है तो ये अपने आप ठीक नहीं होता. क्योंकि लिवर ठीक करने की कोई दवाई अभी तक नहीं बनी है, इसलिए सिर्फ लिवर ट्रांसप्लांट कर के ही मरीज को बचाया जा सकता है. इसमें मरीज का खराब लिवर निकालकर उसकी जगह डोनर द्वारा दिया गया अच्छा लिवर लगाया जाता है. अगर सही समय पर लिवर ट्रांसप्लांट किया गया तो मरीज के बचने की पूरी उम्मीद होती है. लिवर ट्रांसप्लांट के बिना ये बीमारी काफी जानलेवा हो सकती है. 

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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