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शिवाजी को छत्रपति बनाने वाली साहसी औरत की कहानी

जीजाबाई अपने बेटे छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ. (फोटो- इंडिया टुडे आर्काइव)

छत्रपति शिवाजी. लोग इन्हें महान भारतीय योद्धा और मराठा साम्राज्य के पहले राजा के तौर पर जानते हैं. स्वराज के लिए लड़ने वाले शिवाजी को आज भी कई लोग पूजते हैं. उनके पराक्रम के किस्से सुनाए जाते हैं. लेकिन उस औरत पर बात बहुत ही कम होती है, जिसने शिवाजी को असल में छत्रपति शिवाजी महाराज बनाया. हम बात कर रहे हैं जीजाबाई की, जो शिवाजी की मां थीं. इन्हें राजमाता जिजाऊ भी कहा जाता है.

कौन थीं जीजाबाई?

16वीं सदी के आखिर का समय था. तब भारत का नक्शा वैसा बिल्कुल नहीं था, जैसा आज है. 1598 की बात है. दिन 12 जनवरी था. आज के महाराष्ट्र के बुलढाणा ज़िले में लाखुजी जाधव नाम के एक नामी सरदार के घर एक बच्ची का जन्म हुआ. ये जीजाबाई थीं. काफी छोटी ही थीं कि उनकी शादी करवा दी गई. शाहजी भोसले नाम के एक चर्चित योद्धा के साथ. भोसले वंश से आते थे. इस दौरान आज के महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के इलाकों में आदिल शाह वंश, निज़ाम शाह और मुगलों का शासन था. शाहजी लंबे समय तक इन तीन साम्राज्यों के लिए काम करते रहे.

छत्रपति शिवाजी के राजतिलक की तस्वीर. (फोटो- इंडिया टुडे आर्काइव)

1630 में जीजाबाई और शाहजी के घर शिवाजी का जन्म हुआ. लेकिन शाहजी को युद्ध के काम के लिए जाना था. वो अपनी पत्नी और नवजात बेटे को पुणे के शिवनेरी किले में छोड़कर काम पर निकल गए. पुणे का ये किला शाहजी की जागीर थी. इधर शिवाजी के पालन-पोषण का ज़िम्मा आ गया जीजाबाई पर. उन्होंने वो सब कुछ शिवाजी को सिखाया, जो वो जानती थीं. डॉक्टर विकास नौटियाल, जाने-माने इतिहासकार हैं. वो बताते हैं,

“शिवाजी कम उम्र के थे, जब पिता का साथ उनसे छूट सा गया. शाहजी भोसले बहुत अहम जनरल थे. उन्हें कर्नाटक के जिंजी भेज दिया गया था, उनके एक दूसरे बेटे के साथ. तो पुणे की इनकी जागीर का मैनेजमेंट करने के लिए जीजाबाई रहीं. उनका साथ दिया दादाजी कोणदेव ने. तब मराठा इलाकों में अक्सर लूटपाट होती थी. अक्सर वहां मुगल या आदिल शाह की आर्मी आती थी और मराठा इलाकों में लूटपाट करती थी. ऐसी स्थिति में जीजाबाई को अपने बेटे को पालना था. उनके अंदर इतना टैलेंट था, जिसे उन्होंने पूरी तरह से अपने बेटे में डालने की कोशिश की. जीजाबाई ने शिवाजी को युद्ध कला सिखाई, रणनीति सिखाई, आध्यात्म की जानकारी दी. खासतौर पर रामायण और महाभारत के बारे में बताया. एक और अहम चीज़, जो उस वक्त चल रही थी, वो था वहां का महाराष्ट्र धर्म का मूवमेंट, जिसमें एकनाथ थे, रामदास थे. इनकी जीवनी थी. इन सबके बारे में जीजाबाई ने शिवाजी को बताया.”

डॉक्टर विकास नौटियाल बताते हैं कि शिवाजी के व्यक्तित्व को हर तरह से विकसित करने की कोशिशें हो रही थीं. जिस दौरान शिवाजी की जन्म हुआ, उस दौरान मराठा समुदाय मिलिट्री कम्युनिटी के तौर पर भी ट्रांसफॉर्म हो रहा था. ऐसे में जीजाबाई मिलिट्री के नज़रिए से भी शिवाजी को विकसित कर रही थीं. इतिहासकारों का मानना है कि शिवाजी आगे चलकर जिस व्यक्तित्व के तौर पर सबके सामने आए, उसमें सबसे बड़ा रोल जीजाबाई का ही था.

शिवाजी के किन कामों में जीजाबाई का असर दिखा?

इतिहासकारों का कहना है कि जीजाबाई एक साहसी, निडर और आध्यात्मिक महिला थीं. काफी धार्मिक भी थीं. इतिहासकार रिमझिम शर्मा, PGDAV कॉलेज में प्रोफेसर हैं. वो जीजाबाई के व्यक्तित्व पर कहती हैं,

“जीजाबाई एक बेहद मज़बूत महिला थीं. शिवाजी ही नहीं. जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़ने लगा, वैसे-वैसे हम देखते हैं कि उनका रणनीति, पॉलिसी, युद्ध से जुड़े इलाकों में काफी ज्यादा इन्वॉल्वमेंट रहा है. धार्मिक रूप से भी बहुत एक्टिव थीं. जीजाबाई के व्यक्तित्व को हम एक कंप्लीट वुमन कह सकते हैं. खुले विचारों वाली थीं, कई दिक्कतों के साथ भी, एक जगह से दूसरे जगह शिफ्ट होने के साथ भी उन्होंने शिवाजी का पालन-पोषण एक मज़बूत लीडर के तौर पर किया.”

तुलजा भवानी की पूजा करती थीं. और यही गुण शिवाजी में भी ट्रांसफर हुआ था. डॉक्टर विकास नौटियाल बताते हैं कि इस तुलजा भवानी की पूजा करना, शिवाजी के व्यक्तित्व में इस कदर आया कि जब उनकी सेना नारे भी लगाती थी, तो कहती थी-

“माता तुलजा भवानी की जय हो”

बाएं से दाएं: PGDAV की प्रोफेसर रिमझिम शर्मा. इतिहासकार विकास नौटियाल.

स्वराज का कॉन्सेप्ट शिवाजी को कैसे मिला?

शिवाजी ने स्वराज के सिद्धांत पर बहुत काम किया. सारी ज़िंदगी इसी राह पर चले. ये कॉन्सेप्ट भी जीजाबाई की देन थी. इतिहासकार रिमझिम शर्मा बताती हैं कि जीजाबाई ने बचपन में मुगलों द्वारा औरतों पर होने वाला अत्याचार देखा था, सरदारों को आपस में लड़ते देखा था. तभी वो अपने पिता से कहती थीं कि सरदारों को आपस में नहीं लड़ना चाहिए, एकजुट होकर मुगलों का सामना करना चाहिए. रिमझिम शर्मा के मुताबिक, जीजाबाई के मन में तभी से स्वराज का कॉन्सेप्ट घर कर गया था. और जिसने आगे चलकर बड़ा रूप लिया.

इस कॉन्सेप्ट पर डॉक्टर नौटियाल कहते हैं,

“माता जीजाबाई पुणे की जागीर की संरक्षिका थीं. और वो पुणे और उसके आस-पास के क्षेत्र को स्वराज कहती थीं, यानी यहां मेरा राज है. कहती थीं कि यहां हमारा शासन है, हमारे नियम-कानून हैं. अपने क्षेत्र का नाम तो इन्होंने स्वराज रख दिया. लेकिन इसके अलावा जो निज़ाम शाही का इलाका था, या मुगलों का इलाका था, इसे ये लोग देश क्षेत्र कहते थे.”

डॉक्टर नौटियाल आगे बताते हैं कि शिवाजी ने इसी स्वराज के कॉन्सेप्ट पर काम किया. जब उन्होंने किले जीतने शुरू किए, और जब 1674 में उनका राजतिलक हुआ और वो छत्रपति शिवाजी महाराज बने, तब उन्होंने अपने प्रशासन को ही दो भागों में बांट दिया. एक जिस पर उन्होंने खुद शासन किया, उसका नाम स्वराज क्षेत्र कर दिया. दूसरा जिस इलाके में इनका सीधा कंट्रोल नहीं था, उसको उन्होंने देश क्षेत्र कर दिया, ये देश क्षेत्र निज़ामों और मुगलों के कंट्रोल में आते थे. मराठा देश क्षेत्र में जाकर वसूली किया करते थे. शिवाजी ने जीजाबाई के स्वराज के कॉन्सेप्ट पर काम करते हुए छोटे-बड़े करीब 248 किले जीते थे. और इसी स्वराज के कॉन्सेप्ट को आगे बढ़ाया लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने.

इतिहासकार बताते हैं कि शिवाजी जिस भी किले को जीतने जाते, मां का आशीर्वाद ज़रूर लेते थे. और उनकी परमिशन से ही जाते थे. इतिहासकार ये भी मानते हैं कि शिवाजी ने जो राज्य बनाया, वो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मां की प्रेरणा से ही बना. मां के अलावा डॉक्टर नौटियाल शिवाजी के दो गुरु कोणदेव और रामदास को भी उनके व्यक्तित्व के लिए ज़रूरी फैक्टर मानते हैं.

शिवाजी के लिए ये भी कहा जाता है कि वो महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे. डॉक्टर नौटियाल बताते हैं मुगल और आदिल शाही के लोग मराठा महिलाओं को उठाकर ले जाते थे, लेकिन जब शिवाजी का शासन आया, तो उन्होंने कहा कि मराठा लोग मुगल औरतों के साथ ऐसा नहीं करेंगे. ये बात मराठा साहित्य में लिखी हुई है. और ये आदर्श भी जीजाबाई ने ही उन्हें सिखाया था.

शिवाजी की गैर-मौजूदगी में जीजाबाई सब संभालती थीं!

ये भी कहा जाता है कि जब शिवाजी युद्ध के लिए जाते थे, तब जीजाबाई उनकी गैर मौजूदगी में साम्राज्य संभालती थीं. इस पर डॉक्टर नौटियाल बताते हैं,

“जब तक कोणदेव जीवित थे, तब तक वो सारी चीज़ें डील करते थे. जीजाबाई और कोणदेव का रोल होता था. कोणदेव की 1746-47 में मौत हो जाती है, उसके बाद जीजाबाई का अहम रोल हो गया. तब तक वो अपने काम में माहिर हो चुकी थीं.”

जीजाबाई का निधन 17 जून, 1674 को हुआ. शिवाजी के पहले राजतिलक के महज़ 11 दिन बाद. उन्होंने देश को ऐसा लीडर दिया, जिसने अपनी सीमा केवल महाराष्ट्र तक सीमीत नहीं रखी, बल्कि दिल्ली की सीमा तक वो पहुंचा. मराठा साम्राज्य को 248 किले दिलवाए. ऐसे लीडर को बनाने वाली जीजाबाई के बारे में बहुत कुछ लिखा जाना चाहिए. हो सकता है कि लोकल साहित्य की गहराई में जाएं, तो काफी कुछ मिले, लेकिन ऊपरी तौर पर, आम आदमी अभी तक इससे काफी दूर है.

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