पीड़ाएं सबकी साझी होती हैं. उनमें एक अलग किस्म का आकर्षण होता है. वे सीने मेंज़रा सा भी मोम रखने वाले इंसानों को अपनी तरफ़ खींचतीं हैं. जब एक पिता अपनी बच्चीके बेजान हाथ को थामे बैठा दिखता है, हम सब एक साथ पिता हो जाते हैं. हमारा शरीर भीधम्म से ज़मीन पर पसर जाता है. गला रुंधने लगता है. हम घबराए से अपने आस-पास टटोलनेलगते हैं. दिल का एक हिस्सा कहता है, तुम्हें क्या? वो हज़ारों किलोमीटर दूरतुर्किए में घटी एक त्रासदी की इकाई भर है. उनसे तुम्हारा क्या लेना-देना? मगरदूसरा हिस्सा अभी भी उस पिता जैसा ही बर्ताव कर रहा है. पिता होते ही सारी भावनाएंस्वर खो देती हैं. एक भंवर उठता है. जिसके अंदर का खालीपन सिर्फ एक पिता ही समझसकता है.