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दिल्ली एनसीआर इलाके में लगातार भूकंप क्यों आ रहे हैं?

अगली बार कच्छ जैसा भूकंप आए, तो कौन-से त्वरित फैसले आपकी जान बचा सकते हैं?

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सांकेतिक फोटो (इंडिया टुडे)
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निखिल
17 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 17 नवंबर 2022, 11:31 PM IST)
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एक बात ईमानदारी से बताइए. आखिरी बार कब हुआ था कि भूकंप आया, आपने महसूस किया और आप अच्छे बच्चे की तरह तुरंत - घर, दफ्तर या जहां भी थे, वहां से बाहर निकल गए?

हम ये सब क्यों पूछ रहे हैं? बताते हैं -16 नवंबर की रात साढ़े 9 बजे 4.1 तीव्रता का भूकंप आया, जिसका केंद्र था हिमाचल प्रदेश का मंडी. दिल्ली तक में झटके महसूस किए गए. इसी दिन, तकरीबन 12 घंटे पहले अरुणाचल प्रदेश के बसर में 3.7 तीव्रता का भूकंप आया था. इससे दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के पास 3.2 तीव्रता का भूकंप आया. 12 नवंबर को पश्चिमी नेपाल में 5.4 तीव्रता का भूकंप आया. एक बार फिर लगभग पूरे उत्तर भारत समेत दिल्ली में ज़मीन हिली. और पीछे जाएं, तो 10 नवंबर के रोज़ अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम सियांग में 5.7 तीव्रता का भूकंप आया.

भारत सरकार के नेशनल सेंटर फॉर सीस्मॉलजी के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह रोज़ अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उत्तर भारत और नेपाल के इलाके में ज़मीन कांप रही है. लेकिन हर वो झटका, जो हमारा नुकसान नहीं करता, वो सरकार और समाज दोनों को कुंद बनाता जा रहा है. दिल्ली और आसपास के पूरे पट्टे में भूकंप गंभीर प्रतिक्रिया से कहीं ज़्यादा मीम जनरेट कर रहे हैं. भूकंप आते ही लोग मोबाइल निकालकर पंखे का वीडियो बनाने लगते हैं, ट्विटर पर शोर मचाने लगते हैं. लेकिन वो नहीं करते, जो स्कूल में सिखा दिया गया था - इमारत से बाहर भागो, या टेबल के नीचे छिपो.

खुशफहमी में जीना मानव स्वभाव है. हमें कभी नहीं लगता कि हमारे साथ कुछ ग़लत हो सकता है. हम सबने प्लेन क्रैश के बारे में सुना है. लेकिन जब उड़ान से पहले फ्लाइट का क्रू हमें सीट बेल्ट लगाने से लेकर ये तक बताता हैं कि अगर जहाज़ समंदर में गिर जाए तो लाइफ जैकेट जहाज़ से निकलने के बाद फुलाना है, तो हम अपना फोन चेक कर रहे होते हैं. इसीलिए आप वो वीडियो देखते हैं, जब एमरजेंसी लैंडिंग के बाद क्रू चिल्ला रहा होता है कि बाहर निकलो और लोग अपना बैग तलाश रहे होते हैं.

कुल जमा बात ये है कि भूकंप के वक्त क्लूलेस होने और तुरंत सही फैसला लेने से आप अपनी और अपने प्रियजनों की जान बचा सकते हैं. इसके लिए क्या करना होगा, इसपर आएंगे. लेकिन पहले ये समझ लिया जाए कि भूकंप कैसे और क्यों आता है? एक लाइन का जवाब है - धरती के अंदर चट्टानों के खिसकने से भूकंप आता है. ये चट्टानें क्यों खिसकती हैं? इसका जवाब है प्लेट टेक्टॉनिक्स में.
इस सिद्धांत के मुताबिक ज़मीन जितनी स्थिर नज़र आती है, उतनी स्थिर वो होती नहीं. सच तो ये है कि जिस ज़मीन पर आप खड़े हैं, वो वास्तव में तैर रही है. जी हां. पूरी धरती में ठोस ज़मीन के 7 बड़े बड़े टुकड़े हैं. जिन्हें हम कहते हैं प्लेट्स. कुछ छोटी प्लेट्स भी हैं, लेकिन फिलहाल अपना फोकस है सात बड़ी प्लेट्स पर. हर प्लेट की मोटाई है तकरीबन 100 किलोमीटर. और ये सौ-सौ किलोमीटर मोटे ज़मीन के विशाल टुकड़े धरती के गर्भ में मौजूद गर्म लावा पर धीरे धीरे तैर रहे हैं. लेकिन ये प्लेटें अक्सर आपस में टकराती हैं. और इस टक्कर के नतीजे में निकलती है ढेर सारी ऊर्जा, और एक झटका पैदा होता है. यही झटका है भूकंप.

तीन तरफ से समंदर से घिरा भारत का हिस्सा, जिसे हम पेनिनसुलर इंडिया कहते हैं, इंडियन प्लेट का वो हिस्सा है, जो पानी से ऊपर नज़र आता है. यकीन मानिए, भारत समेत पूरी इंडियन प्लेट एक वक्त अंटार्कटिका के पास थी. पिघले लावे पर तैरते तैरते ये प्लेट दक्षिणी ध्रुव से चली और तकरीबन साढ़े चार करोड़ साल पहले यूरेशियन प्लेट से टकरा गई. माने मोटा-माटी वो हिस्सा, जिसमें रूस और चीन वगैरह हैं. नतीजा, यूरेशियन प्लेट ने ऊपर उठते उठते हिमालय का रूप ले लिया. ये टक्कर आज भी जारी है. इंडियन प्लेट आज भी उत्तर पूर्व की तरफ बढ़ रही है. रोज़ आपके नाखून जितना बढ़ते हैं, उतना ही इंडियन प्लेट भी बढ़ जाती है. और हिमालय की नींव के नीचे धंस जाती है. अब जो चीज़ रगड़ खाएगी, वो चटकेगी भी. सो इंडियन प्लेट में भी बड़ी बड़ी दरारें पड़ गई हैं. जिन्हें हम कहते हैं थ्रस्ट फॉल्ट. और इसी के चलते अफगानिस्तान से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक लगातार भूकंप आते रहते हैं. जिनके बारे में हमने आपको शुरुआत में बताया.

ये हलचल धरती में बहुत गहरे होती है. इसीलिए आपने सुना होगा, भूकंप का केंद्र फलाने शहर से 100 किलोमीटर पूर्वोत्तर में 15 किलोमीटर की गहराई पर था. अब जैसे कि हमने बताया था कि पूरी धरती पर ज़मीन की मोटी मोटी प्लेटें तैर रही हैं, तो ढेर सारे भूकंप भी आते रहते हैं. एक साल में तकरीबन 10 लाख भूकंप रिकॉर्ड किए जाते हैं. इनमें से तकरीबन 100 ही ऐसे होते हैं, जिनसे बड़ा नुकसान हो सकता है. मतलब सामान्य गणित कहता है कि 10 हज़ार में से एक भूकंप जानलेवा हो सकता है. तब आप पूछ सकते हैं कि ऐसा शो बनाने की ज़रूरत ही क्या थी. तो जवाब ये है कि भूकंप पूरी दुनिया में बराबरी से नहीं आते. 80 फीसदी भूकंप आते हैं प्रशांत महासागर के उस इलाके में, जहां जापान, न्यूज़ीलैंड वगैरह पड़ते हैं. और 15 फीसदी आते हैं अल्पाइड इलाके में, जिसमें जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया और हिमालय का इलाका आता है. और आप तो जानते ही हैं कि हिमालय के दक्षिण में हम माने भारत है.

बीते तीस सालों के कुछ बड़े भूकंपों पर गौर कीजिए.
1.
20 अगस्त 1988
केंद्र- उदयपुर, नेपाल
तीव्रता- 6.6 मैग्नीट्यूट
भोर में 4 बजकर 39 मिनट पर आए इस भूकंप ने नेपाल और बिहार में जमकर तबाही मचाई थी.  इस भूकंप की वजह से भारत में करीब 280 और नेपाल में 720 लोगों की मौत हुई थी. जबकि 16 हजार लोग घायल हुए थे.

2.
20 अक्टूबर 1991
केंद्र-  उत्तरकाशी, उत्तराखंड (अविभाजित उत्तर प्रदेश)
तीव्रता- 6.6 मैग्नीट्यूट
भोर में करीब 2.53 मिनट पर आए इस भूकंप के झटके उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर तक में महसूस किया गया था. इस भूकंप की वजह से 768 इंसानों और 3 हजार से अधिक जानवरों की मौत हो गई थी. 5 हजार लोग घायल हुए थे. जबकि करीब 20 हजार से अधिक रिहायशी मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे.

3.
30 सितंबर 1993
केंद्र- लातूर, महाराष्ट्र
तीव्रता- 6.4 मैग्नीट्यूट
भोर में करीब 3 बजकर 56 मिनट पर धरती हिली. लोग गहरी नींद में सो रहे थे. जिसकी वजह से जान-माल का काफी नुकसान हुआ. कहा जाता है कि 40 सेकेंड के इस भूकंप ने लातूर को पूरी तरह से उजाड़ दिया था. 52 गांव पूरी तरह बर्बाद हो गए थे. इसमें 10 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.

4.
26 जनवरी 2001
केंद्र-  भुज, गुजरात
तीव्रता- 7.7 मैग्नीट्यूट
सुबह 8 बजकर 40 मिनट पर करीब 2 मिनट तक धरती हिलती रही. कई गांव-कस्बे खंडहर में तब्दील हो गए. 20 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी. करीब डेढ़ लाख लोग जख्मी हुए थे.

5.
8 अक्टूबर 2005
केंद्र- मुज़फ्फराबाद, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर
तीव्रता- 7.6
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में 8 अक्टूबर 2005 को सुबह 8 बजकर 50 मिनट पर आए भूकंप ने भयानक तबाही मचाई थी. भूकंप के झटके भारत, पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान, तजाकिस्तान और चीन तक महसूस किए गए. इस विनाशकारी भूकंप की वजह से करीब 86 हजार लोगों की जान चली गई थी.

6.
25 अप्रैल 2015
केंद्र- काठमांडू, नेपाल
तीव्रता- 7.8
दोपहर करीब 11 बजकर 45 मिनट पर आए भूकंप ने नेपाल के साथ-साथ भारत को भी हिलाकर रख दिया था. भूकंप का केंद्र राजधानी काठमांडू से करीब 80 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम में था. इसमें करीब 9 हजार लोगों की मौत हो गई थी.

7.
26 अक्टूबर 2015
केंद्र- फैज़ाबाद, अफगानिस्तान
तीव्रता-  7.5 मैग्नीट्यूट
दोपहर 2 बजकर 40 मिनट पर हिंदुकुश माउंटेन रेंज में आए इस शक्तिशाली भूकंप के झटके पाकिस्तान से लेकर दिल्ली तक महसूस किए गए थे. इसमें करीब 300 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 1 हजार से अधिक लोग घायल हुए थे.

ये उदाहरण स्थापित करते हैं कि हाल के ही सालों में बार बार भारत और आसपास के इलाकों में ऐसे भूकंप आए, जिन्होंने बड़ी तबाही मचाई. यहां तक आते आते आपने कई बार तीव्रता के साथ एक आंकड़ा सुना होगा. इतना तो आप समझ गए होंगे कि जितना बड़ा आंकड़ा, उतना बड़ा भूकंप. आम तौर पर ये आंकड़ा रिक्टर स्केल पर बता दिया जाता है. क्योंकि चार्ल्स फ्रांसिस रिक्टर ने भूकंप की ताकत नापने के लिए इसका सिद्धांत दिया था. अब भूकंप की ताकत नापने के लिए नए तरीकों का भी इस्तेमाल होता है, लेकिन रिक्टर स्केल वाला नाम चिपक सा गया है. यहां एक बात समझने वाली है. रिक्टर स्केल पर 4 का झटका झेल लेने पर आपको लगता होगा कि अपन तो 5 को भी देख लेंगे और 6 को भी. लेकिन ये इतना आसान नहीं है. रिक्टर स्केल पर 5 के भूकंप में रिक्टर स्केल पर 4 से तकरीबन 32 गुना ज़्यादा ताकत होती है. और 6 वाले भूकंप में तो रिक्टर 4 से 1000 गुना से भी ज़्यादा ताकत होती है. इसीलिए हम बार बार कह रहे हैं, भूकंप मज़ाक का विषय कतई नहीं हैं.

भारत से अपना फोकस और पैना करके दिल्ली ncr और हिमालय की तराई पर ले आते हैं. भारत में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स ने भारत को 4 ज़ोन में बांटा है. ज़ोन 5 में भूकंप का खतरा सबसे ज़्यादा है. और ज़ोन 2 में सबसे कम. दिल्ली NCR का इलाका ज़ोन 4 में आता है. माने यहां भूकंप का खतरा काफी ज़्यादा है. इस इलाके के आसपास तीन तीन फॉल्ट लाइन्स भी हैं. अब दिक्कत ये है कि दिल्ली में तकरीबन 90 फीसदी इमारतें इस लिहाज़ से बनी ही नहीं हैं कि ये ज़ोन 4 में आने वाले भूकंप को झेल लें. सोचिए - 90 फीसदी इमारतें भूकंप की तैयारी के लिहाज़ से असुरक्षित हैं. ऐसे में क्या छोटे छोटे झटकों को एक बड़े भूकंप की आहट माना जाए, इस पर राष्ट्रीय भू भौतिक अनुसंधान संस्थान के चीफ साइंटिस्ट विनीत गहलोत का कहना है कि भूकंप लगातार आते रहते हैं लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि ये छोटे भूकंप किसी बड़े भूकंप की चेतावनी दे रहे हैं.

अब आपको लगातार आ रहे भूकंपों के लिए एक संदर्भ मिल गया होगा. और इस सवाल का जवाब भी, कि क्या छोटे भूकंप का मतलब बड़े भूकंप की दस्तक होता है? लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारी तैयारी में कोई कमी रह जाये. सरकार के स्तर पर जो काम हुआ है, उसपर विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे-छोटे भूकंपों के डेटा को रिकार्ड करना और उसपर रिसर्च करने के काम में भारत बहुत पीछे है. भारत जैसे बड़े देश में जहां इतने भूकंप आते हों वहां देशभर में केवल 150 लैब्स हैं. जबकि देश में काम से काम 500 लैब्स होनी चाहिए.

समस्या आप जान गए. अब जानिए कि समाधान क्या है. हमने ये पूछा कि दुनिया में बेस्ट प्रैक्टिस क्या हैं, और भारत उनसे क्या सीख सकता है? इस पर चीफ साइंटिस्ट विनीत गहलोत का कहना है कि हम इस मामले में जापान से सीख सकते हैं. वहां नियमों का पालन अच्छे से किया जाता है और भूकंप को झेलने वाली इमारतें बनाई जाती हैं.

तो हमारी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि जब भूकंप आए, तो वीडियो न बनाएं. पहले बिल्डिंग से बाहर आएं. और इस बात का ध्यान रखें कि जब आप कोई इमारत बनवाएं तो वो आपके यहां की सीसमिक ज़ोन के नियमों अनुरूप हो. ताकि जब अनहोनी हो, तब वो इमारत आपका साथ दे और बहुमूल्य जीवन बचे.

वीडियो: दिल्ली एनसीआर में लगातार आने वाले भूकंपों की असली वजह ये है, क्या आप बच पाएंगे?

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