भूस्खलन के लिए इंसानी करतूतें भी जिम्मेदार, बचने के लिए कोई तिकड़म है?
जिस वजह से न्यूटन ने सेब ज़मीन पर गिरते देखा, बड़े-बड़े पहाड़ भी उसी कारण खिसकते-दरकते हैं, भूस्खलन होते हैं.
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जून का महीना खत्म होने से पहले देश में मॉनसून एक्टिव हो गया है. इसके साथ ही बारिश के चलते पहाड़ी इलाकों से भूस्खलन और फ्लैश फ्लड की खबरें सामने आ रही हैं. हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दूसरे पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन के चलते रास्ते कट जाते हैं. यात्री फंस जाते हैं. फंसे हुए यात्रियों को तो फिर भी निकाल ही लिया जाता है. लेकिन कभी-कभी भूस्खलन पूरे के पूरे गांव को चपेट में लेते हैं. जैसे 30 जुलाई, 2014 को हुआ था. महाराष्ट्र के पुणे में मलिन नाम का गांव है. सुबह-सुबह, जब ज़्यादातर ग्रामीण सो रहे थे, पहाड़ की एक ढलान खिसकी और गांव पल भर में हज़ारों टन मलबे के नीचे दब गया. कुल 151 लोगों की मौत हुई. बारिश और कीचड़ के चलते राहत और बचाव का काम पूरा करने में 10 दिन लग गए.
मलिन में भी बारिश के मौसम में ही भूस्खलन हुआ था. ऐसे में ये सवाल लाज़मी है कि बारिश के चलते भूस्खलन क्यों बढ़ जाते हैं. और जो पहाड़ ऊंचे होते-होते आसमान का सीना चीर देते हैं, वो इतने कमज़ोर कैसे हो जाते हैं कि धंसकने लगते हैं? क्या साइंस ने इतनी तरक्की नहीं की, कि हम इसे रोक पाएं? या इसके असर को कम कर पाएं? आज यही सब जानेंगे.
क्यों होते हैं ये भूस्खलन?भूस्खलन ऐसी किसी घटना को कहते हैं, जब किसी ढलान से भारी मात्रा में चट्टान, मलबा या मिट्टी नीचे खिसक आए. खिसकने से आप ये मत समझिए कि ये धीरे-धीरे होता है. पल-भर में पूरे के पूरे पहाड़ भी धंसक जाते हैं. जिस वजह से न्यूटन ने सेब ज़मीन पर गिरते देखा, बड़े-बड़े पहाड़ भी उसी कारण खिसकते-दरकते हैं. उस प्राकृतिक बल का नाम है ग्रैविटी. गुरुत्वाकर्षण भूस्खलन का मुख्य कारण है. लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल तो हमेशा मौजूद होता है, फिर पहाड़ कुछ खास मौकों पर ही क्यों दरकते हैं?
कई कारण हो सकते हैं. जैसे कि वर्षा, भूकंप, बर्फ का पिघलना, ज्वालामुखी का फटना या फिर भूगर्भीय गतिविधि. इंसानी गतिविधि जैसे माइनिंग, भारी निर्माण और जंगलों की कटाई से भी भूस्खलन की नौबत आ सकती है. एक-एक कर इन कारणों पर गौर करते हैं.
बारिश
भारत में आमतौर पर भारी वर्षा के कारण लैंडस्लाइड देखे जाते हैं. ढलान की ऊपरी सतह फ्रिक्शन(घर्षण) के ज़रिए पर नीचे वाली सतह पर टिकी रहती है. इसलिए ऊंचाई पर होने के बावजूद गुरुत्वाकर्षण का बल इसे नीचे नहीं खींच पाता. लेकिन ज़्यादा बारिश से ऊपरी सतह पर पानी इकट्ठा होता है, जिससे वो भारी हो जाती है. और बारिश का पानी इन सतहों बीच का फ्रिक्शन भी कम करने लगता है. इन वजहों से गुरुत्वाकर्षण का बल फ्रिक्शन पर हावी हो जाता है. और ढलान की ऊपरी सतह नीचे खिंची चली जाती है. बर्फ के पिघलने से भी कमोबेश यही स्थिति ब नती है.
भूगर्भीय गतिविधि
धरती के भीतर की हलचल कैसे भूस्खलन पैदा करती है, ये जानने के लिए हमने डॉ रत्नाकर महाजन से बात की. डॉ महाजन एक ऐसी कंपनी में टेक्निकल मैनेजर हैं, जो लैंडस्लाइड मिटिगेशन, माने भूस्खलन की रोकथाम का काम करती है. उन्होंने बताया,
भूगर्भीय गतिविधि का ही एक नमूना है ज्वालामुखी का फटना. जब ये धमाके के साथ फटते हैं, तो शॉक वेव्स (कंपन) उठती हैं और ढलानें खिसक जाती हैं.
इंसान की करतूतें
मैदानों की तरह की इंसान पहाड़ों की ढलानों पर भी बसा है. उसने पहाड़ काटकर सड़कें बनाई हैं. शहर बसाए हैं. और जंगलों को काटकर लकड़ी बेची है. हाल के दिनों में भूस्खलनों के बढ़ने की ये एक बड़ी वजह है. डॉ महाजन बताते हैं,
वैसे तो भूस्खलन को रोकने का कोई ठोस उपाय नहीं है. और न ही इनका कोई सटीक अनुमान ही लगाया जा सकता है. लेकिन इनके असर को कुछ कम किया जा सकता है. डॉक्टर रत्नाकर के मुताबिक जहां नदियों के बहाव के चलते भूस्खलन की आशंका है, वहां पानी के बहाव को छोटी-छोटी धाराओं (चैनल) में बांटा जा सकता है. इसके अलावा कोई भी नया निर्माण करने से पहले हमें इलाके के ईकोसिस्टम और भूगर्भीय स्थिति पर ध्यान देना चाहिए. कोशिश ये होनी चाहिए कि निर्माण वैली (घाटी) की तरफ किया जाए, ना कि पहाड़ों की ढलानों की तरफ.
डॉक्टर रत्नाकर के मुताबिक जहां भारी निर्माण हुआ हो, मसलन सड़क या बड़ी इमारतें, वहां भूस्खलन रोकने के लिए ‘गेबियन रिटेनिंग वॉल’ जैसे स्ट्रक्चर बनाने पर ज़ोर देना चाहिए. इसके लिए पत्थरों को तार के जाल से बांधकर चट्टानों की शक्ल दी जाती है. फिर इनके सहारे ढलानों को बांधा जाता है.
अगर चट्टानें खिसकने की समस्या हो, तो रॉक बोल्टिंग की जा सकती है. इसके लिए चट्टानों की परतों को आपस में कसने के लिए लंबे-लंबे बोल्ट ड्रिल करके डाले जाते हैं. और फिर इन्हें ऊपर से कस कर ग्राउटिंग कर दी जाती है. माने एक खास तरह के सीमेंट से सील कर दिया जाता है.
मिट्टी की ढलानों पर हाइड्रोसीडिंग की जा सकती है. इसके ज़रिए बीज और उर्वरक का घोल ढलान पर स्प्रे किया जाता है. वक्त के साथ बीज से अंकुर निकलते हैं और ढलान पर हरियाली हो जाती है. जड़ें ढलान को मज़बूत कर देती हैं.
लेकिन ये सब कृत्रिम उपाय हैं. और ज़्यादातर वहीं कारगर हैं, जहां भारी निर्माण होता है. कुदरती तौर पर होने वाले भूस्खलनों को पूरी तरह टालना संभव नहीं है. इसीलिए ज़रूरी है कि अंधाधुंध इंसानी गतिविधियों पर लगाम लगे और जलवायु परिवर्तन पर ध्यान दिया जाए.
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