ईरान-इजरायल संघर्ष नहीं रुका तो कौन किसके साथ? US की एंट्री से इशारे मिलने लगे हैं
US bombs Iran nuclear sites: इस ऑपरेशन के लिए इज़रायल ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की तारीफ़ की. जबकि ईरान ने इज़रायल के ख़िलाफ़ हमले तेज़ कर दिए हैं. ऐसे में कौन, किसकी तरफ़ है, ये जान लीजिए.

ईरान-इज़रायल संघर्ष (Iran-Israel Conflict) में अमेरिका के कूदने से पूरी दुनिया में हलचल है. दुनिया के कई नेताओं ने संयम बरतने की अपील की है. ऐसे में ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि कौन, किसकी तरफ़ है. और, अगर लड़ाई बड़ी होती गई, तो कौन, किसके साथ कितने हद तक जाएगा.
कौन करेगा ईरान की मदद?ईरान को लंबे समय से अपने दो प्रमुख ग्लोबल सहयोगियों से भी समर्थन हासिल है. नाम- रूस और चीन. 22 जून को ईरान में परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमले के बाद, चीन ने इस कदम की निंदा की. इसे ‘एक खतरनाक मोड़’ बताया.
जबकि रूस ने भी अमेरिका पर ‘पूरी मानवता की सुरक्षा और भलाई के साथ खिलवाड़’ करने का आरोप लगाया. रूस के संयुक्त राष्ट्र राजदूत वसीली नेबेंजिया ने कहा,
हालांकि, कई जानकारों का मानना है कि रूस और चीन के सीधे तौर पर इसमें शामिल होने की संभावना बहुत कम है. रूस ट्रंप प्रशासन के साथ अपने सुधरते संबंधों को ख़तरे में नहीं डालना चाहेगा. वहीं, चीन को भी मध्य पूर्व के लफड़े में सीधे तौर पर शामिल होने में कोई दिलचस्पी नहीं है.
ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि जब सीरिया में असद शासन का पतन हुआ. तब भी सबसे बड़ा समर्थक माने जाने वाले रूस ने बयानबाजी के लिए अलावा ज्यादा कुछ नहीं किया.
Iran के और सहयोगी कौन?लेबनान में हिज़बुल्ला, ग़ाज़ा में हमास, इराक़ में पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF) और यमन में हूती. ये सारे उग्रवादी ग्रुप्स मिलकर 'प्रतिरोध की धुरी' (Axis Of Resistance) के रूप में जाने जाते हैं. ईरान ने ऐतिहासिक रूप से अपने सहयोगी रहे, इन पैरामिलिट्री ग्रुप्स के नेटवर्क पर हमेशा भरोसा किया है.
ये ग्रुप्स ईरान के इन ग़ैर-राज्य सहयोगी (non-state allies) हैं. यानी कोई देश पूरी तरह से इनके कंट्रोल में नहीं आता. हालांकि, बीते कुछ सालों में, इज़राइल ने ईरान के इन सहयोगियों को बड़े झटके दिए हैं. 2023 में इज़राइल-हमास युद्ध की शुरुआत के बाद से हमास की स्थिति कमज़ोर हो गई है. वहीं, इज़राइली ने कई हमलों के ज़रिए हिज़बुल्ला की ताक़त को भी कम कर दिया है.
इसके अलावा, ईरान ने सीरिया में कुछ मिलिशियाओं का भी समर्थन किया था. लेकिन बशर अल-असद के सत्ता से बेदखल होने के बाद, इनका प्रभाव कम हो गया है. हां, ये ज़रूर है कि ईरान इराक़ में मजबूत प्रभाव रखता है. जहां अनुमान के मुताबिक़, क़रीब 2 लाख PMF लड़ाके हैं. यमन में हूतियों की भी लगभग इतनी ही संख्या है.
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इज़राइल का साथ कौन देगा?13 जून को ईरान के परमाणु ठिकानों पर इज़रायल के हमले के साथ संघर्ष शुरू हुआ. इसके बाद से ही अमेरिका ने अपने सहयोगी इज़रायल को स्पष्ट समर्थन दिया है. इसके अलावा, ग्रुप ऑफ़ सेवन (G7) के सभी देशों ने भी एक बयान जारी किया. जिसमें उन्होंने इज़रायल के प्रति समर्थन जताया था और ईरान को मध्य पूर्व एशिया में अस्थिरता का कारण बताया था. G7 के देश हैं - कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका.
कुछ दिनों पहले जी-7 नेताओं ने बयान में कहा था,
इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया ने भी ईरान पर हुए अमेरिकी हमले का समर्थन किया. ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने 23 जून को कहा,
इज़रायली दावों के मुताबिक़, इज़रायल-ईरान के बीच संघर्ष तब शुरू हुआ. जब ईरान ने परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश की. हालांकि, ईरान ने परमाणु हथियार बनाने की कोशिश से इनकार किया है. उसने कहा है कि उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु तकनीक विकसित करने का अधिकार है.
भारत-पाकिस्तान का स्टैंडईरान पर अमेरिकी हमले के कुछ ही घंटों बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बात की. ईरानी परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को खुद फोन मिलाया. दोनों के बीच करीब 45 मिनट तक बातचीत चली. इस दौरान पीएम मोदी ने हाल ही में तनाव बढ़ने को लेकर चिंता जताई है. इसके अलावा उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति से तनाव को तुरंत कम करने की अपील की है.
बीते दिनों, पाकिस्तान सरकार ने 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की सिफारिश की थी. इसके ठीक बाद, अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले कर दिये. ऐसे में पाकिस्तान ने इन अमेरिकी हमलों की निंदा की. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा,
बताते चलें, पाकिस्तान, ईरान के साथ 900 किलोमीटर की सीमा शेयर करता है.
वीडियो: अमेरिकी हमले से भड़का Iran, इजरायल पर किए ताबड़तोड़ मिसाइल हमले

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