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दिल्ली NCR में नज़र आ रहा धुआं आया कहां से है, और ये आग किसकी लगाई है.

आज दिल्ली में AQI औसतन 400 से ऊपर रहा.

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air pollution delhi
सांकेतिक फोटो (साभार: आजतक)
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निखिल
3 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 3 नवंबर 2022, 11:14 PM IST)
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जिसका मुझे, था इंतज़ार वो घड़ी आ गई. जी हां. दिल्ली में प्रदूषण फिर चरम पर है. दिल्ली की सांसें कब तक देंगी साथ टाइप के पैकेज टीवी पर चलने लगे हैं. और ज़िम्मेदारी तय करने के नाम पर नूरा-कुश्ती भी शुरू हो गई है. नूरा कुश्ती समझते हैं न आप - दिखावे की लड़ाई. तू मुझे ढिशूम कर देना, फिर मैं तुझे चित्त कर दूंगा. न तुझे चोट लगेगी, न मुझे मोच आएगी. पब्लिक तालियां पीटेगी. और दोनों का काम हो जाएगा. कंफ्यूज़ मत होइए, हम प्रदूषण के नाम पर हो रही राजनीति की बात कर रहे हैं. बड़ी बड़ी बातें और लंबे चौड़े बयान सामने आ रहे हैं. लेकिन गंभीरता है, कि कहीं नज़र आती ही नहीं. इन सबको कटघरे में खड़ा किया जाएगा, आज दिन की बड़ी खबर में. गुजरात विधानसभा चुनाव का कैलेंडर जारी हो गया है, उसके बारे में भी आपको बताएंगे और ये भी कि बिंदी को इंटरव्यू के आड़े कौन ले आया. लेकिन पहले मालूम करेंगे कि दिल्ली NCR में नज़र आ रहा धुआं आया कहां से है, और ये आग किसकी लगाई है. 

दिल्ली में प्रदूषण के जो आंकड़े आप सुनते हैं, वो नेशनल एयर क्वालिटी इंडेक्स माने AQI के होते हैं. इसकी शुरुआत 2014 में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के कार्यकाल में हुई थी. इसके तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड CPCB, नेशनल एयर मॉनिटरिंग प्रोग्राम NAPM के तहत भारत के करीब ढाई सौ शहरों में हवा की गुणवत्ता के आंकड़े दिये जाते हैं. इनकी छह कैटेगरी होती हैं - गुड, सैटिसफैक्ट्री, मोडरेटली पलूटेड, पूअर, वेरी पुअर और सिवियर. जितना ज़्यादा AQI होगा, हवा उतनी ही प्रदूषित होगी.

आज दिल्ली में AQI औसतन 400 से ऊपर रहा. माने वेरी पुअर और सिवियर कैटेगरी में. इसका मतलब हवा काफी हानिकार है. ये आंकड़े आए, तो लोगों का गुस्सा भी जवाब देने लगा और राजनीति को भी हवा मिली. चूंकि अरविंद केजरीवाल का दूसरा कार्यकाल चल रहा है, और उन्होंने हर बार प्रदूषण को मुद्दा बनाया है, उनके पुराने बयानों की खुदाई शुरू हो गई. सुनिये केजरीवाल ने कब कब, क्या क्या कहा? जब इन बयानों की चर्चा शुरू हुई, तो केजरीवाल ने आज फिर एक बयान जारी किया. 

केजरीवाल ने अपना पक्ष तो रख दिया, लेकिन भाजपा की ओर से हमलों के कोई कमी नहीं हुई. आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने कई ट्वीटस करके उन्हें घेरा. एक ट्वीट में अमित ने लिखा कि जब पंजाब में केजरीवाल की पार्टी की सरकार नहीं थी, तब उनके पास समाधान ही समाधान थे. वो तब जो सलाह देते थे, उसका 1 फीसदी भी उन्होंने क्यों नहीं किया. मालवीय ने जिस बिंदु पर केजरीवाल को घेरा है, वो वाकई आम आदमी पार्टी को असहज करने वाला है. पराली को लेकर होने वाली राजनीति में सबसे ज़्यादा ज़िक्र पंजाब में जलने वाली पराली का ही होता है. जबकि पराली हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक में जलाई जाती है. ये तथ्य है कि पंजाब में पराली बड़े पैमाने पर जलाई जाती है. ये सारा प्रदूषण दिल्ली के आसमान पर क्यों ठहर जाता है, इसका जवाब भूगोल और मौसम में हैं. साल के इस वक्त दिल्ली में हवा की रफ्तार बहुत कम होती है. या न के बराबर होती है. इसीलिए धुआं जमने लगता है. और ये सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं है. दिल्ली के आसपास के इलाकों के साथ साथ हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई शहरों का यही हाल है. बस वो चर्चा से बाहर रहते हैं. इस बुलेटिन की तैयारी के वक्त यूपी के मेरठ में AQI 349 था. माने वेरी पुअर. मेरठ के ही एक सेंटर पर AQI 403 था. माने सिवियर. राजस्थान के अलवर में AQI 246 था. माने पुअर.

तो ये समस्या बस दिल्ली की नहीं है. पूरे indo gangetic plains में यही समस्या है. दिल्ली की बात इसीलिए होती है, क्योंकि वो राजधानी है. और सबसे ज़्यादा प्रभावित लोग वही हैं. दिल्ली को लेकर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने क्या कहा? दिल्ली में प्रदूषण पर हो रही राजनीति के केंद्र में पराली है. लेकिन जैसा कि हम बार-बार आपसे कहते हैं, नेताओं की वाणी पार्टी लाइन से बंधी रहती है. इसीलिए उनके कहे में सच्चाई खोजना बेमानी होता है. वास्तविकता ये है कि दिल्ली में प्रदूषण का सिर्फ एक हिस्सा पराली जलाने से आता है. ये हम नहीं, आंकड़े कह रहे हैं. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट (CSE) पर्यावरण पर शोध करने वाली एक संस्था है, जिसने 21 से 26 अक्टूबर के बीच दिल्ली में हवा की गुणवत्ता पर एक रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट की जानकारी हमें इंडियन एक्सप्रेस पर छपी अभिनय हरगोविंद की खबर से मिली. आप पूछ सकते हैं कि 21 से 26 अक्टूबर का डेटा ही क्यों लिया गया. तो जवाब ये है कि इसी हफ्ते में इस मौसम का पहला ''वेरी पुअर'' एयर डे था. माने पहला दिन, जब हवा की गुणवत्ता काफी खराब थी.

CSE की रिपोर्ट बताती है कि 21 से 26 अक्टूबर के बीच दिल्ली की हवा में जितना प्रदूषण था, उसका सिर्फ 9.5 फीसदी पराली जलाने से आ रहा था. इसका मतलब दिल्ली में 90 फीसदी प्रदूषण का पराली से कोई लेना देना नहीं है. CSE के मुताबिक दिल्ली में प्रदूषण कुछ इस तरह से हो रहा है -
अंदरूनी स्रोत - 32.9 %
NCR से आने वाला प्रदूषण - 32.8 %
बाहरी ज़िलों से आने वाला प्रदूषण - 25.8 %
पराली आदि - 9.5 %

ये आंकड़े साफ कर देते हैं कि अकेले दिल्ली के प्रदूषण के इर्द गिर्द बात करने से समाधान निकल ही नहीं सकता. क्योंकि दिल्ली में दो तिहाई प्रदूषण बाहर से आता है. NCR के इलाके - गाज़ियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गांव आदि से पैदा होने वाला प्रदूषण भी दिल्ली पर असर डालता है. फिर बाहरी ज़िले हैं. ये बाहरी ज़िले कहां हैं, ये आप भारत के नक्शे में देख सकते हैं. ये हैं दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में - माने उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान. दिल्ली में तकरीबन 60 फीसदी प्रदूषण इन्हीं दो स्रोतों से आ रहा है.

आप आते हैं दिल्ली में प्रदूषण के अंदरूनी कारणों पर. अंदरूनी कारण माने गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, सड़क पर उड़ती धूल आदि. बीते हफ्ते दिल्ली में जितना प्रदूषण था, उसका 32.9 फीसदी इन्हीं के चलते था. और अंदरूनी कारणों में सबसे बड़ा विलन है या कहें कि सबसे बड़ी विलन हैं, आपकी और हमारी गाड़ियां. जी हां. और CSE की रिपोर्ट बताती है कि 21 से 26 अक्टूबर के बीच दिल्ली के अपने पैदा किए प्रदूषण में 51 फीसदी तक हिस्सा गाड़ियों से निकलने वाले धुएं का था. इसके बाद नंबर आता है रेज़िडेंशियल सोर्सेज़, माने घर वगैरह और फिर नंबर आता है उद्योगों का. आंकड़े भी जान लीजिए -
वाहन - 51 %
घरेलू स्रोत - 13 %
उद्योग - 11 %
निर्माण - 7 %
कचरा प्रबंधन-उर्जा उत्पादन - 5 %
सड़क पर धूल - 4 %

साफ नज़र आ रहा है कि दिल्ली की चौड़ी चौड़ी सड़कों पर इतनी गाड़ियां दौड़ाई जा रही हैं, कि हवा ही ज़हरीली होती जा रही है. इसीलिए CSE ने अपनी रिपोर्ट में ये कहा है कि दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर ज़ोर देने की बहुत आवश्यकता है. इसके लिए ऐसे कदमों को उठाना होगा, जिनके असर को भी मापा जा सके. मतलब दिखावे के लिए नियम न बना दिये जाएं. मेट्रो को यातायात के दूसरे माध्यमों से जोड़ना होगा. कंजेशन और पलूशन प्राइसिंग लागू करनी होगी. माने व्यस्त समय में गाड़ियां चलाने पर फीस. और एक फीस इस हिसाब से, कि आप कितना प्रदूषण कर रहे हैं. इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाए.

इसमें एक चीज़ हम अपनी ओर से जोड़ना चाहते हैं. सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने का मतलब सारी ज़िम्मेदारी मेट्रो के सिर नहीं मढ़ी जा सकती. दिल्ली में भारत का सबसे विशाल नेटवर्क है. तकरीबन साढ़े 3 सौ किलोमीटर का डबल इलेक्ट्रिफाइड ट्रैक है, जिसपर एक के पीछे एक मेट्रो चलती हैं. लेकिन जैसा कि CSE की रिपोर्ट में भी कहा गया, मेट्रो स्टेशन से कनेक्टिविटी बहुत खराब होती है. इसीलिए लोग कैब वगैरह करने को मजबूर होते हैं. DTC के पास बसों की विशाल फ्लीट है, लेकिन अव्वल तो वो जाम में फंस जाती हैं. फिर दूर दराज़ के इलाकों से ऐन पहले कई रूट्स खत्म हो जाते हैं. दिल्ली की स्थिति तो फिर भी ठीक है. दिल्ली के ठीक बगल में पड़ने वाले नोएडा, गाज़ियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव में वहां की सिटी बसें कब आती हैं और कब जाती हैं, मालूम नहीं चलता. सेवाएं नियमित नहीं हैं, इसीलिए लोग इनपर बहुत भरोसा करते नहीं हैं.

एक और बड़ी समस्या है ऑटो वालों का मीटर से न चलना. पूरे दिल्ली NCR में ऑटो वाले मीटर से नहीं चलते. आपको कई ऑटो नज़र आ जाएंगे, जिनमें या तो मीटर लगा नहीं होता, और लगा होता है, तो वो चलने की हालत में नहीं होता. औने-पौने दाम लिए जाते हैं, तो लोग अपनी बाइक या गाड़ी से ही चल देना पसंद करते हैं. अगर इन सारी चीज़ों पर गौर किया जाए, तो कम से कम कुछ लोग अपनी निजी गाड़ियां छोड़कर सार्वजनिक परिवहन की तरफ लौटेंगे. आप दफ्तर जाने वाले किसी भी शख्स से पूछ लीजिए. कोई भी सुबह शाम 50 मिनिट जाम में फंसकर तेल नहीं जलाना चाहता. अगर ऐसा विकल्प मिले, जो सहज हो, सस्ता हो और सुरक्षित हो, तो निजी गाड़ियों के इस्तेमाल में ज़रूर कमी आएगी.

जैसा कि हमने पहले भी कहा, ये समस्या सिर्फ दिल्ली की नहीं है. मेरठ की है, बागपत की है, अलवर की है, फरीदाबाद और लुधियाना की भी है. इसीलिए समाधान भी इन सब जगहों से ही निकलेगा. नेताओं की तू तू मैं मैं सुनकर आनंद मत लीजिए. अपनी सांसों की परवाह कीजिए. और सवाल पूछिये ज़िम्मेदारों से.

दी लल्लनटॉप शो: दिल्ली NCR में प्रदूषण की असली वजह जानकर आपको अपने नेताओं पर बहुत गुस्सा आएगा

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