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नवाज़ और मुशर्रफ को निशाने पर लेने के बाद इंडियन एयरफोर्स ने बम क्यों नहीं दागा?

दो देशों को परमाणु हमले से बचाने वाले पल का किस्सा.

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24 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 24 जुलाई 2017, 11:41 AM IST)
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1999 में मई-जुलाई के बीच भारत के 527 जवान शहीद हुए और 1,363 ज़ख्मी. वजह - पाकिस्तान के आर्मी चीफ परवेज़ मुशर्रफ की भारत के साथ वादाखिलाफी. ठंड के दिनों में अपनी फौज को चुपके से भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने भेज दिया. इस सब को रोकने में नाकामयाब रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ. कारगिल की लड़ाई के दो गुनहगार. कारगिल की लड़ाई के बीचो-बीच एक वक्त ऐसा भी आया कि भारत की एयरफोर्स ने इन दोनों पर निशाना लगा लिया था. लेकिन बम नहीं दागा गया. ये कुछ किस्मत का खेल था और कुछ एक अनुभवी फाइटर पायलट की समझदारी का. आज हम इन दोनों के बारे में जानेंगे.
दो जेट, एक बम
बात 24 जून 1999 की है. सुबह के पौने नौ बज रहे थे. लाइन ऑफ कंट्रोल के करीब भारतीय वायुसेना का एक जैगुआर फाइटर उड़ रहा था. उसके कॉकपिट लेज़र डेज़िग्नेशन सिस्टम पर पॉइंट 4388 नज़र आने लगा. ये पाकिस्तान का एक फॉरवर्ड बेस था. पायलट को बेस पर काफी लोग नज़र आए. उसने इस निशाने को लॉक कर लिया. अब बारी थी बम चलाने की. लेकिन इस जेट से सिर्फ टार्गेट लॉक किया जा सकता था. इस जेट के पीछे एक और जैगुआर फाइटर आ रहा था, जो लॉक हुए निशाने पर बम दागने वाला था. लेकिन बम निशाने पर चलाने की बजाए कहीं और चला दिया गया. इंडियन एक्सप्रेस के पास उपलब्ध सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक ठीक उसी वक्त वहां परवेज़ मुशर्रफ और नवाज़ शरीफ मौजूद थे. बम निशाने पर चलाया जाता, तो इन दोनों की जान चली जाती.
 
जैगुआर फाइटर जेट (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
जैगुआर फाइटर जेट (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

 
कम ही लोगों को शुबहा होगा कि भारतीय वायुसेना के हमले में नवाज़ शरीफ और परवेज़ मुशर्रफ की मौत के बाद लड़ाई कारगिल तक सीमित रहती. परमाणु हथियारों से लैस दो देशों में खुली जंग की असल संभावना पैदा हो जाती. एक बम अपने निशाने पर नहीं लगा और दो देश तबाही से बच गए.
लेकिन बम न चलाने की वजह ये नहीं थी
इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में एयर मार्शल विनोद पाटने (रिटायर्ड) का बयान छापा है. विनोद तब भारतीय वायु सेना की वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ की हैसियत से कारगिल में वायुसेना के ऑपरेशन के इंचार्ज थे. उनके मुताबिक पॉइंट 4388 को लॉक करने के बाद पहले जैगुआर के पायलट को कुछ शुबहा हुआ. इसलिए वो लौट गया.
पॉइंट 4388 दरअसल गुलतेरी था. पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में लाइन ऑफ कंट्रोल से तकरीबन 9 किलोमीटर अंदर पड़ने वाला गुलतेरी पाकिस्तानी फौज का फॉर्वर्ड एडमिनिस्ट्रेटिव बेस था. कारगिल की लड़ाई में पाकिस्तानी फौज को यहीं से गोला-बारूद सप्लाई होता था.
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने तय किया था कि भारत कारगिल में लाइन ऑफ कंट्रोल को पार नहीं करेगा. गुलतेरी LOC के पार था और इसलिए बम नहीं गिराने का फैसला लिया गया.
 
मशकोह घाटी से बरामद हुआ पाकिस्तानी फौज का स्नो हट.
मशकोह घाटी से बरामद हुआ पाकिस्तानी फौज का स्नो हट.

 
इनकार तीसरे जेट से आया था
पहले फाइटर को निशाना तय करना था और दूसरे को बम चला देना था. लेकिन उस रोज़ बम चलाने का फैसला एक तीसरे जेट में सवार एयर मार्शल एके सिंह ने लिया था. वो उस वक्त उसी इलाके में थे. गुलतेरी को टार्गेट करने वाले जेट को उड़ा रहा पायलट एके सिंह का जूनियर था. तो उसने बेस नज़र आने पर एके सिंह को रेडियो पर बताया.
एके सिंह ने गुलतेरी पर से उड़ान भर रखी थी. तो वो जानते थे कि निशाने पर लिया गया बेस गुलतेरी हो सकता है. उन्होंने पहले पायलट से इंतज़ार करने को कहा और अपना जेट वहां ले गए, जहां से वो पहले जेट को देख सकते थे. जब वो वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि पहले जेट का पायलट पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर पर उड़ान भर रहा था. वो समझ गए कि वहां से हमला करना वाजपेयी की बनाई सीमा को पार करना होता. उन्होंने पायलट से बम को हिंदुस्तान की तरफ के किसी टार्गेट पर चला कर वापस आ जाने को कहा.
 
एयरमार्शल ए.के सिंह (फोटोःयूट्यूब स्क्रीनग्रैब)
एयरमार्शल ए.के सिंह (फोटोःयूट्यूब स्क्रीनग्रैब)

 
जब एके सिंह का डर सही निकला
तीनों जेट जब आदमपुर बेस पर वापस लौटे, तो फाइटर जेट की वीडियो फुटेज खंगाली गई. एके सिंह का डर सही निकला. पहले जेट पर लॉक हुआ बेस गुलतेरी ही था. यानी वो बेस, जो LoC के उस पार था, जिस पर हमला नहीं किया जाना था.
उस सुबह बेस पर नवाज़ शरीफ और परवेज़ मुशर्रफ थे. पायलट को जो वहां जमा भीड़ नज़र आई थी, वो नवाज़ शरीफ को सुन रहे फौजी थे. भारत के किए हमले में नवाज़ शरीफ या परवेज़ मुशर्रफ की जान जाने से सुलह के सारे रास्ते एक साथ खत्म हो जाते. फिर बस लड़ाई का पागलपन बचता. लेकिन ये वो जानकारी है, जो इलाके में मौजूद तीनों फाइटर जेट्स के पास तब मौजूद नहीं थी.
किस्मत ही थी कि वहां उस वक्त एके सिंह भी थे, जिनके अनुभव ने एक साथी पायलट को गलती करने से बचाया और दो देशों को संभावित परमाणु हमले से भी.


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