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अडानी FPO वापसी का पूरा सच क्या है?

अडानी समूह ने ऐलान किया कि वो अपना FPO वापस ले रहा है.

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2 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 2 फ़रवरी 2023, 09:28 PM IST)
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बुधवार को अडानी ग्रुप ने 20 हजार करोड़ का अपना FPO कैंसिल किया (फोटो: गौतम अडानी/साभार: आजतक)
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6 मई 1937 को एक बड़ा सा गुब्बारा अमेरिका में न्यू जर्सी के आसमान पर तैर रहा था. ये एक एयरशिप था, जो जर्मनी के फ्रैंकफर्ट से 97 लोगों को अपने साथ लेकर आया था. इसने हवा से ज़मीन पर आने की बहुत कोशिश की, लेकिन एक चिंगारी उठी और देखते ही देखते ही देखते हाइड्रोजन से भरा गुब्बारा जलने लगा. एयरशिप में सवार 35 लोगों के साथ-साथ ज़मीन पर खड़े एयरशिप कंपनी के एक कर्मचारी की भी जान चली गई. एयरशिप्स के इतिहास में न ये पहला हादसा था, और न ही सबसे बड़ा. फिर भी इस एक हादसे के बाद दोबारा कभी एयरशिप्स यात्रियों को लेकर नहीं उड़े. एक इंडस्ट्री का अंत हो गया. क्यों, क्योंकि न्यू जर्सी वाले हादसे के वक्त दर्जनों कैमरे मौजूद थे. न्यूज़ रील्स पर लाइव कॉमेंट्री रिकॉर्ड हुई और हर एंगल से हादसे की तस्वीरें आईं, जिनमें सबसे चर्चित थी फोटो जर्नलिस्ट सैम शेयर की ये तस्वीर, जो हिंडनबर्ग डिज़ास्टर की प्रतीक तस्वीर बन गई. 

हिंडनबर्ग हादसे में हाइड्रोजन गुब्बारे में भर दिया गया था. (फोटो-विकिमीडिया कॉमन्स/ सैम शेयर)


जांच में सामने आया कि हिंडनबर्ग हादसे में जितना मौसम का हाथ था, उससे ज़्यादा इंसानी लालच का. हाइड्रोजन बेहद ज्वलनशील होती है, ये जानते हुए भी गुब्बारे में उसे भर दिया गया. क्योंकि वो सस्ती थी. और हीलियम के निर्यात पर अमेरिका ने पाबंदी लगा रखी थी. इसीलिए हिंडनबर्ग को एक मैन मेड डिज़ास्टर कहा जाता है. 
जो अमेरिकी फर्म अडानी समूह के गले की हड्डी बनी हुई है, उसका भी यही दावा है कि वो मानव निर्मित त्रासदियों की जांच करती है. इसीलिये उसका नाम है हिंडनबर्ग रीसर्च. 25 जनवरी को जब इस फर्म ने अडानी समूह पर स्टॉक्स में हेरफेर और बैलेंसशीट फ्रॉड जैसे इल्ज़ाम लगाए, तो विशेषज्ञों ने कहा कि अडानी समूह की सेहत पर इसका बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा और कुछ दिनों में बात आई-गई हो जाएगी. लेकिन 25 जनवरी से 2 फरवरी आ गया और हिंडनबर्ग की रिपोर्ट से मची तबाही रुकने का नाम नहीं ले रही. जिस FPO को भारत के इतिहास में सबसे बड़ा होना था, उसे अडानी समूह ने वापस ले लिया. अब निवेशकों को पैसे लौटाए जा रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं अडानी समूह की कंपनियों के बॉन्ड पर कर्ज़ देने से इनकार कर रही हैं. और सूत्रों ने दावा किया है कि RBI ने भी अब भारतीय बैंकों से पूछ लिया है कि अडानी समूह को कितना कर्ज़ दिया. शेयर मार्केट में जो हाहाकार मचा है, उसकी खबरें लगातार आप तक पहुंच ही रही हैं. इसीलिए आज एक बार फिर अडानी समूह पर बात होगी. हम समझने की कोशिश करेंगे कि क्या वाकई अडानी समूह में कुछ गड़बड़ चल रही है या फिर ये भारतीय कंपनी पर एक विदेशी कंपनी का हमला है. 

1 फरवरी के रोज़ सबसे बड़ी खबर भारत का बजट थी. लेकिन सिर्फ आधे दिन तक ही.  बजट में टैक्स छूट के ऐलान के बाद शेयर मार्केट ने चढ़ना तो चाहा, लेकिन अडानी समूह के शेयर्स में इतनी भारी गिरावट हुई कि बाज़ार धीमा पड़ने लगा. और अडानी समूह के शेयर्स फिर खबरों में लौट आए. शाम तक खबर आ गई कि स्विस इंवेस्टमेंट बैंक क्रेडिट सुइस ए.जी. ने अडानी समूह के बॉन्ड्स पर नए कर्ज़ जारी नहीं करेगी. और रात को एक ऐसी खबर आई, जिसने बजट को खबरों से पूरी तरह बाहर कर दिया. अडानी समूह ने ऐलान किया कि वो अपना FPO वापस ले रही है. ये खबर क्यों अहम है, उसके लिए आपको समझना होगा कि ये FPO होता क्या है.

आपने शेयर मार्केट के संदर्भ में एक शब्द बार बार सुना होगा - IPO या इनीशियल पब्लिक ऑफर. आप ये समझ गये, तो FPO समझ जाएंगे. तो बात ऐसी है कि जब कोई कंपनी आगे बढ़ने के लिए कर्ज़ चाहती है, तो वो बैंक भी जा सकती है और शेयर मार्केट भी. बैंक की प्रक्रिया आप जानते ही हैं. अपनी हैसियत स्थापित कीजिए, और पैसा ले जाइए. सूद समेत वापिस कीजिए. शेयर मार्केट में तरीका थोड़ा अलग है. यहां से पैसा उठाने के लिए पहले कंपनी को ''लिस्ट'' होना होता है. आप जिस देश के शेयर मार्केट से पैसा लेना चाहते हैं, वहां के कानूनों के मुताबिक कंपनी पंजीकृत की जाती है. जैसे भारत में प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड SEBI के नियम लागू होते हैं. इसके बाद कंपनी एक तय दाम पर अपने शेयर्स को बेचने का ऑफर निकालती है. इसी को कहते हैं IPO. इच्छुक लोग इन शेयर्स को खरीद सकते हैं. माने पैसे देकर कंपनी का एक छोटा सा हिस्सा अपने नाम कर लेते हैं. और फिर शेयर बाज़ार में इनकी खरीद-बिक्री का खेल चलता रहता है. अच्छी कंपनी के IPO में आपको शेयर मिल जाएं, तो बल्ले बल्ले, क्योंकि आप इन्हें ऊंचे दाम पर बेच सकते हैं. भारतीय बाज़ार के हिसाब से अडानी कुछ वक्त पहले तक बहुत अच्छी कंपनी मानी जाती थी.

IPO निकाल चुकी कंपनी दोबारा अपने शेयर बेचने बाज़ार में उतारे, तो उसे कहा जाता है फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर FPO. अगर कंपनी दमदार है, तो FPO लेने के लिए भी होड़ मच जाती है. अडानी समूह के मामले में यही माना जा रहा था कि ये भारतीय शेयर बाज़ार इतिहास के सबसे बड़े FPO's में से होगा, जिसके ज़रिये समूह तकरीबन 20 हज़ार करोड़ जुटा लेगा. 

लेकिन अडानी के FPO के ऐन पहले आ गई हिंडनबर्ग रीसर्च की रिपोर्ट, जिसके बारे में हमने आपको 27 जनवरी के दी लल्लनटॉप शो में विस्तार से बताया था. हिंडनबर्ग रीसर्च की रिपोर्ट आने के बाद आम निवेशकों ने अडानी के FPO में दिलचस्पी नहीं दिखाई. किसी तरह बड़े निवेशकों ने FPO के शेयर खरीदकर उसे तकनीकी रूप से सफल बनाया. माने सारे शेयर्स के लिए खरीददार मिल गए. लेकिन जब तक ये हुआ, अडानी एटरप्राइज़ेस के एक शेयर की कीमत धड़ाम हो गई. माने निवेशक को नुकसान होना तय हो गया. जो शेयर उसने 3200 रुपए में खरीदा था, वो उसे बाज़ार में 2000 से 2100 के बीच मिल रहा था. आज तो इसका दाम 1 हज़ार 565 रुपये पर आ गया. इसका मतलब शेयर की कीमत आधी रह गई. 

ये तो संदर्भ था. इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला है कि अडानी समूह ने वास्तव में FPO वापिस क्यों किया. आप पहले समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी ने क्या कहा जान लीजीए. उन्होंने कहा, 

“प्रिय मित्रों, FPO के पूरी तरह से सब्सक्राइब होने के बाद कल इसे रद्द करने के फैसले से कई लोग सरप्राइज हुए हैं। लेकिन बाजार की अस्थिरता की वजह से हमारे बोर्ड ने महसूस किया कि इन परिस्थितियों में FPO के साथ जाना नैतिक तौर पर सही नहीं होगा. एक उद्यमी के तौर पर 4 दशकों की मेरी यात्रा में मुझे सभी हितधारकों और इंवेस्टर्स से खूब सहयोग मिला है. यह मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है कि मैं यह स्वीकार करूं कि मैंने जीवन में जो कुछ भी पाया है वो इनके विश्वास का नतीजा है. मैं उन्हें अपनी सफलता का क्रेडिट देना चाहूंगा. मेरे लिए मेरे निवेशक सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं. यही वजह है कि हमने उनको हो रहे नुकसान की वजह से FPO वापस लिया है. इस फैसले का असर हमारे किसी प्रोजेक्ट पर नहीं पड़ेगा. साथ हमारे भविष्य की योजनाओ पर भी यह फैसला कोई प्रभाव नहीं डालेगा. हम लगातार तक समय पर प्रोजेक्ट्स पूरा करने के लिए फोकस करते रहेंगे. कंपनी के फंडामेंटल्स भी काफी मजबूत हैं. हमारी बैलेंसशीट भी दुरुस्त है. इसके अलावा EBITDA लेवल और कैश फ्लो भी बहुत बेहतर स्थिति में है. हम लगातार लॉन्ग टर्म वैल्यू क्रिएट करने और ग्रोथ फोकस करते रहेंगे.”

अडानी समूह ने ''निवेशकों के हितों की रक्षा'' और ''नैतिकता'' जैसी बातें की हैं. और सामान्य गणित भी यही कहता है कि अगर किसी सौदे में अकारण नुकसान पहुंचा है, तो पैसे लौटा देने चाहिए. लेकिन यहां एक पेच है. हमने जितने विशेषज्ञों से बात की, सबने यही कहा कि संभवतः भारतीय इतिहास में पहले कभी किसी कंपनी ने FPO वापिस नहीं लिया. जबकि उनके निवेशकों ने पैसे देकर हाथ जला लिए थे. फिर चाहें अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस एनर्जी रही हो या पेटीएम का आईपीओ. ये आईपीओ बंपर पिटे और निवेशक अब भी भारी नुकसान में चल रहे हैं. इन्हें किसी ने अनैतिक नहीं कहा. क्योंकि शेयर बाज़ार जिन नियमों पर चलता है, वहां ये पूरी तरह वैध है. खरीददार जोखिम को समझकर ही शेयर खरीदता है. और वो पैसा लौटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं होता है. 

फिर अडानी समूह के FPO में आम निवेशकों का बहुत सारा पैसा लगा हो, ये मानने का आधार भी नहीं मिलता. ये ऑफर के अंतिम दिन पूरी तरह से सब्सक्राइब हो पाया था. माने जितने शेयर थे, उनके लिए खरीददार मिल पाए. जबकि पूर्व में नामी कंपनियों के FPO कई गुना सब्सक्राइब हुए हैं. तब समूह के शेयर लिए किसने थे? गौर कीजिए -
> 5 हज़ार 985 करोड़ रुपये एंकर इंवेस्टर्स ने दिए. माने बड़ी संस्थाएं. मिसाल के लिए भारतीय जीवन बीमा निगम. इसके जैसे कुल 33 फंड्स ने पैसा लगाया. 
> गैर-संस्थागत निवेशक माने (Non Institutional Invester). अमूमन ऐसे निवेशक 2 लाख से ऊपर की बोली लगाते हैं. इन्होंने FPO में बड़ी दिलचस्पी दिखाई. अपने कोटे के शेयरों के मुकाबले 3.26 गुना शेयरों के लिए बोलियां लगाईं. 
>सबसे अधिक योगदान दिया अल्ट्रा-हाई-नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (UHNIs) ने. बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें मुकेश अंबानी, सज्जन जिंदल, सुनील मित्तल, सुधीर मेहता और पंकज पटेल जैसे बड़े-बड़े नाम शामिल हैं. इसी कैटेगरी में अबू धाबी और दुनिया के दूसरे हिस्सों के निवेशकों ने भी हिस्सा लिया. 

इस पूरी कहानी में आम निवेशक पीछे रहे, जो अपने पास से पैसा लगाते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया है कि कंपनी ने अपने एम्प्लॉईज़ के लिए जो कोटा रखा था, उसे भी उम्मीद के मुताबिक रिस्पॉन्स नहीं मिला. तो जो पैसा अडानी ने किसी तरह इकट्ठा किया था, उसे अचानक वापिस कर देना किस स्ट्रैटजी का हिस्सा है? इस पर संतोष सिंह, जीआरडी सेक्योरिटी ने कहा,

 “अडानी ग्रुप ने मार्केट केप के हिसाब से रिलायंस को पीछे छोड़ दिया था. मुझे लगता है कि FPO को वापस लॅास को रिकवर करने के लिए किया गया है.”

FPO वापिस लेकर समूह भले अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन समूह के सामने अब और बड़ी समस्याएं आ रही हैं. क्रेडिट सुइस के बाद सिटी ग्रुप ने भी अडानी समूह के बॉन्ड्स के बदले कर्ज़ देने पर रोक लगा दी है. बॉन्ड एक नोट की तरह होता है. मान लीजिये कि कंपनी 100 रुपये का बॉन्ड निकालती है. आप इसे 100 से कुछ कम में खरीदेंगे और एक तय तारीख पर कंपनी को लौटा देंगे. तब कंपनी आपको पूरे 100 रुपये चुका देगी. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बड़े बड़े बैंक नामी कंपनियों के बॉन्ड्स के बदले भी कर्ज़ देते हैं. लेकिन अब अडानी समूह के बॉन्ड्स के बदले दो कंपनियां कर्ज़ नहीं देंगी. यहां एक बात समझने वाली है. इन कंपनियों ने ये नहीं कहा कि ये अडानी समूह से अपना लेनदेन खत्म कर रही हैं. ये भविष्य में लिये जाने वाले कर्ज़ के लिये हैं. और उनमें भी कई कैटेगरी हैं. फिर भी इसका असर कंपनी की साख पर तो पड़ता ही है.

हमने 27 जनवरी के शो में आपको बताया था कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर अडानी ग्रुप ने क्या जवाब दिया. उनका पहला जवाब था कि हिंडनबर्ग के रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं है जो अडानी ग्रुप ने पहले से ना बताया, दूसरी बात ये भी कही थी कि हिंडनबर्ग के खिलाफ वो कार्रवाई करेंगे. अमेरिका और भारत में उसके लिए कानूनी विकल्पों की तलाश चल रही है. इस हिंडनबर्ग ने कहा था कि वो कानूनी कार्रवाई का जवाब देने के लिए तैयार हैं. तब से अब तक अडानी समूह की तरफ से कई जवाब और सफाई आ चुकी है. एक बयान में अडानी ग्रुप के CFO जुगेशिंदर सिंह ने रिपोर्ट को झूठ का पिटारा बताते हुए इसकी तुलना जलियांवाला बाग नरसंहार से की थी. MINT बिजनेस डेली की ओर से पूछा गया था कि शेयर बाजार, हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर विश्वास करता दिख रहा है, क्या इससे आपको निराशा हुई है? जवाब अडानी ग्रुप के CFO ने कहा-

 ''मैं इतिहास का छात्र रहा हूं और पंजाब से आता हूं. यह माहौल मुझे हैरान नहीं करता है, जलियांवाला बाग में केवल एक अंग्रेज ने आदेश दिया और भारतीयों ने ही दूसरे भारतीयों पर गोली चला दी। ये मेरे राज्य में हुआ था और हम उस दिन को याद करते हैं। यही वजह है कि मुझे इस माहौल से हैरानी नहीं हुई.'' 

यहां एक तरह से अडानी ग्रुप के शेयर गिरने और जलियांवाला कांड की तुलना की गई. सफाई ही कड़ी में अडानी ग्रुप की तरफ से हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को इंडिया पर कैलकुलेटेड अटैक बताया गया. उनकी तरफ से आए जवाब में कहा गया- 

''ये केवल किसी खास कंपनी पर अनुचित हमला नहीं है बल्कि ये भारत, भारतीय संस्थानों की आजादी, अखंडता, उनकी गुणवत्ता, ग्रोथ स्टोरी और भारत की महत्वकांक्षा पर सुनियोजित हमला है.''

 इसके जवाब मे हिंडनबर्ग की तरफ से कहा गया- Fraud cannot be obfuscated by nationalism" मतलब ये कि धोखाधड़ी को राष्ट्रवाद से नहीं ढक सकते हैं. हिंडनबर्ग ने अपने जवाब में कहा-

''अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी की संपत्ति में तेजी से हुए इजाफे को भारत की सफलता से जोड़ने का प्रयास किया है, जिससे हम सहमत नहीं हैं. भारत एक उभरता हुआ सुपर पावर के साथ सुनहरे भविष्य वाला लोकतांत्रिक देश है. हमें लगता है कि अडानी ग्रुप इसे पीछे ढकेल रहा है. समूह ने व्यवस्थित तरीके से देश को लूटते हुए तिरंगे में छुपा लिया है."

ये जवाब आम निवेशकों को संतुष्ट क्यों नहीं कर पा रहे, इस पर संतोष सिंह, जीआरडी सेक्योरिटी ने कहा,

“किसी भी कंपनी पर अगर आरोप लगे हैं तो उस कंपनी को अपने ऊपर लगे आरोपों को अपने किसी भी रेगुलेटर के सामने रखना चाहिए. जो भी रेगुलेटर हों जैसे SEBI या RBI.”

मार्केट पर जो असर है, हमने उसकी बात की। अब बात संसद की। जहां फिलवक्त बजट सत्र चल रहा है। आज यानी 2 फरवरी को बजट पर चर्चा होनी थी। मगर अडानी और हिंडनबर्ग का मुद्दा ही दोनों सदनों में छाया रहा। लोकसभा की कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई, क्वेश्चन हॉवर यानी प्रश्नकाल के दौरान हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर जमकर हंगामा हुआ और फिर लोकसभा को 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया.  विपक्षी दलों ने पूरे दिन अडानी पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आरोपों पर जेपीसी यानी ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी की मांग की.

दो बजे जब दोबारा लोकसभा बैठी तो वेल में जाकर विपक्षी सांसदों ने अडानी-मोदी को लेकर नारेबाजी करने लगे। हंगामे के बीच संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने विपक्षी सांसदों से बजट पर चर्चा करने की अपील की. मगर बात तब भी नहीं बनी और हंगामा बढ़ता देख लोकसभा को कल यानी 3 फरवरी की सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया। राज्यसभा का भी हाल कुछ ऐसा ही रहा। राज्यसभा में विपक्ष के 9 सांसदों ने रूल नंबर 267 के तहत सदन में चर्चा के लिए बिजनेस नोटिस दिया।नोटिस के तहत विपक्ष LIC, SBI, अडानी-हिंडनबर्ग रिपोर्ट और पब्लिक सेक्टर बैकों की गिरती मार्केट वैल्यू पर चर्चा करना चाहता था. नोटिस देने वालों नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी और आम आदमी पार्टी के संजय सिंह का नाम था.

नोटिस को सभापति जगदीप धनखड़ ने ये कहते हुए रिजेक्ट कर दिया कि नोटिस ऑर्डर में नहीं थे। नोटिस रिजेक्ट होते ही राज्यसभा में विपक्ष के सांसद विरोध करने लगे। जिसके बाद राज्यसभा को भी 2 बजे तक स्थगित करना पड़ा। आगे भी हंगामा हुआ तो राज्यसभा भी अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दी गई.

ये अनुमान लगाया जा रहा था कि अडानी समूह जल्द हिंडनबर्ग रिपोर्ट के फेर से बाहर निकल आएगा. लेकिन अब तक ऐसा हुआ नहीं है. ज़रूरी है कि नियामक संस्थाएं जल्द से जल्द स्थिति को साफ करें. क्योंकि हिंडनबर्ग के तो हित जुड़े हुए हैं. इसीलिए उनके सवालों की मंशा पर प्रश्नचिह्न कभी हटेगा नहीं. लेकिन ये ज़रूरी है कि कॉर्पोर्ट गर्वनेंस से जुड़े जो प्रश्न हैं, उनके सटीक उत्तर मिलें. क्योंकि आपकी राय चाहे जो हो, अडानी जैसी बड़ी कंपनियां किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के भविष्य के साथ नत्थी होती हैं. हमें मेहनतकश लोगों की ज़रूरत है. और उद्योगपतियों की भी. बस ये आवश्यक है कि सबकुछ नियमों के तहत हो.

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