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माउंट एवरेस्ट का 'डेथ जोन' क्या है जहां भारतीय पर्वतारोहियों की मौत हो गई?

क्या है एवरेस्ट का डेथ जोन? और ऐसा क्यों कहा जाता है कि एवरेस्ट की चोटी पहुंचने से भी ज्यादा खतरनाक है वहां से वापसी का रास्ता?

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22 मई 2026 (अपडेटेड: 22 मई 2026, 05:36 PM IST)
Mount everest Death zone
माउंट एवरेस्ट की कुल ऊंचाई 8848.86 मीटर है. असली खतरा 8000 मीटर के बाद शुरू होता है. फोटो-Reuters
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माउंट एवरेस्ट. दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत. लगभग हर पर्वतारोही का सपना होता है इसके शिखर तक पहुंचना. अब तक हजारों का ये सपना पूरा भी हुआ है. मगर कई ऐसे हैं जिनको इस सपने की कीमत अपनी जान देकर गंवानी पड़ी है. कई बार एवरेस्ट के टॉप पर पहुंचने के पहले, कभी रास्ते में और ज्यादातर बार वापसी में. 

22 मई को भी दो भारतीय पर्वतारोहियों की माउंट एवरेस्ट पर मौत की खबर आई. दोनों एवरेस्ट की चोटी से वापसी कर रहे थे. कहा जा रहा है कि दोनों की जान Death Zone पार करते हुई है. क्या है एवरेस्ट का डेथ जोन? ऐसा क्यों कहा जाता है कि एवरेस्ट की चोटी पहुंचने से भी ज्यादा खतरनाक है वहां से वापसी का रास्ता? समझते हैं.

एवरेस्ट का डेथ जोन क्या है?

माउंट एवरेस्ट की कुल ऊंचाई 8848.86 मीटर है. समुद्र तल से ये  29,032 फीट ऊपर है. माउंट एवरेस्ट का “डेथ ज़ोन” 8,000 मीटर की ऊंचाई से शुरू होता है. नीचे दी गई फोटो के हिसाब से समझें तो कैंप IV के बाद से ये जोन शुरू हो जाता है.

Mount Everest Map
माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई चार कैंप्स में बंटी हुई है. फोटो- AFP

यहां पहुंचने के बाद इंसानी शरीर के लिए इतनी ज्यादा ऊंचाई और कम ऑक्सीजन वाले माहौल में खुद को संभाल पाना बेहद मुश्किल हो जाता है. यहां ऑक्सीजन का लेवल समुद्र तल के मुकाबले सिर्फ एक-तिहाई ही रह जाता है.

ये क्यों खतरनाक है?

- डेथ जोन में पतली हवा की वजह से सांस लेना बहुत मुश्किल हो जाता है. शरीर जल्दी थकने लगता है और थोड़ा-सा चलना भी बहुत भारी लगता है. यहां कई बार मौसम इतना ठंडा और खराब मौसम हो जाता है कि लोगों के हाथ-पैर तक जम सकते हैं. ऑक्सीजन कम होने से पर्वतारोहियों का शरीर और दिमाग ठीक से काम नहीं कर पाता. इसलिए पर्वतारोही “डेथ ज़ोन” को ऐसी जगह मानते हैं, जहां सपनों से ज्यादा जरूरी अपनी जान बचाना होता है.

- रिपोर्ट्स बताती हैं कि माउंट एवरेस्ट के डेथ ज़ोन में ऐसा महसूस होता है, जैसे शरीर धीरे-धीरे काम करना बंद कर रहा हो. ऑक्सीजन की इतनी भारी कमी हो जाती है कि दम घुटने लगता है. शरीर और दिमाग दोनों कमजोर पड़ने लगते हैं. वहां हर छोटी हरकत, छोटे मूवमेंट में भी बहुत ज्यादा ताकत लगती है. जिससे इंसान जल्दी थक जाता है, उलझन महसूस होने लगती है. दस्ताने ठीक करना, रस्सी पकड़ना या पानी का एक घूंट पीना भी बेहद मुश्किल लगता है. कई बार तो Hallucination होने लगता है, मतलब ऐसी चीजें दिखने या सुनाई देने लगती हैं जो असल में हैं ही नहीं. इसकी वजह ऑक्सीजन की कमी, शरीर और दिमाग पर बढ़ता दबाव और जानलेवा ठंड होती है.

Death zone Mt everest
डेथ जोन में हवा इतनी पतली हो जाती है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है.  फोटो- AI generated stock images

- डेथ ज़ोन में इंसान की शारीरिक के साथ-साथ मानसिक ताकत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है. भूख कम हो जाती है, खाना ठीक से पच नहीं पाता और शरीर में पानी की कमी होने लगती है. हालत ऐसी हो जाती है कि शरीर अंदर से टूटने लगता है. इससे रिकवरी तभी हो पाती है जब इंसान नीचे कम ऊंचाई वाले इलाके में लौटे.

- डेथ ज़ोन में तापमान -30°C से भी नीचे चला जाता है. ऊपर से तेज़ हवाएं. ऐसे हालात में फ्रॉस्टबाइट का खतरा बहुत बढ़ जाता है. शरीर जरूरी अंगों को बचाने के लिए हाथ-पैरों की उंगलियों और नाक तक खून पहुंचाना कम कर देता है.

एवरेस्ट चढ़ने से ज्यादा वापसी खतरनाक क्यों?

इन सब वजहों से एवरेस्ट पर अक्सर नीचे उतरना, चढ़ाई करने से भी ज्यादा खतरनाक साबित होता है. जब पर्वतारोही एवरेस्ट के टॉप पर पहुंचते हैं, तब तक उनका शरीर लगभग टूट चुका होता है. हर कदम शरीर की बची हुई ताकत को तेजी से खत्म करता है. नीचे उतरते समय पर्वतारोहियों को उसी खतरनाक रास्ते से वापस आना पड़ता है. तब तक वे बेहद थक चुके होते हैं, शरीर में पानी की कमी हो जाती है, फ्रॉस्टबाइट का खतरा बढ़ जाता है और मौसम भी खराब होने लगता है. कई पर्वतारोही शिखर पर जरूरत से ज्यादा समय बिता देते हैं, जिससे उतराई देर से शुरू होती है. दोपहर तक हवाएं और तेज हो जाती हैं और रास्ता साफ दिखना भी अचानक मुश्किल हो सकता है.

ये भी पढ़ें- भारत के पर्वतारोहियों ने माउंट एवरेस्ट फतेह किया, उतरते वक्त मौत कैसे हो गई?

हालांकि ज़्यादातर मौतें नीचे उतरते समय होती हैं, लेकिन अब तक डेथ ज़ोन में 340 से ज्यादा लोगों की मौत दर्ज की जा चुकी हैं. इसकी बड़ी वजह कड़ाके की ठंड, ऑक्सीजन की कमी और ऊंचाई पर होने वाली गंभीर बीमारियां HAPE और HACE हैं. HAPE माने High Altitude Pulmonary Edema यानी ऊंचाई पर फेफड़ों में पानी भर जाना, और HACE माने High-Altitude Cerebral Edema यानी ऊंचाई की वजह से दिमाग में सूजन आना.

वीडियो: माउंट एवरेस्ट कितना ऊंचा हो गया कि चीन और नेपाल दोनों को साथ में नापना पड़ा

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