बंगाल में एक और BJP कार्यकर्ता की हत्या और पुलिस ने जो किया, उस पर विश्वास नहीं होता
क्या और हत्याओं का इंतजार कर रही हैं ममता बनर्जी?
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पुरुलिया के बलरामपुर में तीन दिन में ये दूसरी हत्या है और दोनों ही बार निशाने पर बीजेपी कार्यकर्ता रहे हैं.
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क्या पश्चिम बंगाल में कानून नाम की कोई चीज बची है? क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का इकबाल कायम है? क्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक चेतना से अलग होकर कोई जिंदा रह सकता है? ये सवाल यूं ही नहीं हैं. ये सवाल इसलिए हैं, क्योंकि पिछले तीन दिनों में बीजेपी के दो कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई है. और ये व्यक्तिगत नहीं, राजनैतिक दुश्मनी का नतीजा है. ये ममता बनर्जी की तानशाही है और तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी है.
नतीजे पर पहुंचने के लिए 1 जून को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में हुई बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या और उसे अंजाम देने का तरीका काफी है. पुरुलिया जिले के बलरामपुर इलाके के दाभा गांव के रहने वाले दुलाल कुमार बीजेपी के कार्यकर्ता थे. उम्र 32 साल थी. 2 जून की सुबह दुलाल का शव गांव में ही बिजली के बड़े वाले पोल से लटकता पाया गया.
इसके अलावा शव के पास एक पर्ची भी पड़ी थी. इसपर लिखा था-

30 मई को त्रिलोचन महतो की हत्या कर शव पेड़ से टांग दिया गया था. धमकी भरा मैसेज भी था ताकि लोगों में दहशत भरी जा सके.
इन दोनों ही घटनाओं में एक चीज कॉमन है और वो है पुलिस की निष्क्रियता. त्रिलोचन महतो ने हत्या से ठीक अपने भाई को फोन कर कहा था कि उसे जान से मारने की धमकी मिल रही है. उसके बाद त्रिलोचन का पता नहीं चला. घरवालों ने पुलिसवालों को सूचना दी, लेकिन कुछ पता नहीं चला और उसकी लाश ही मिली. दूसरी घटना के बारे में भी बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ट्वीटर पर लिखा है. उन्होंने बताया है कि पश्चिम बंगाल के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर अनुज शर्मा से उनकी बात हुई थी. उन्होंने एडीजी को बताया भी था कि दुलाल की जान खतरे में है. एडीजी ने कहा भी था कि पुलिस उसे बचाने की कोशिश कर रही है. लेकिन नतीजा ये हुआ कि दुलाल का शव बिजली के पोल से लटका हुआ मिला.

पंचायत चुनाव में वोटिंग वाले दिन की हिंसा में ही 18 लोग मारे गए. ममता बनर्जी ने कहा- ये तो छोटी सी घटना है. 18 लोगों का मर जाना, खुलेआम उत्पात होना, मारकाट होना, ये सब ममता के लिए छोटी बात है (फोटो: पीटीआई)
सत्ता मिलने के बाद बदलाव कितना आया, ये तो पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोग ही बता सकते हैं, लेकिन ममता बनर्जी बदला ज़रूर ले रही हैं. पंचायत चुनाव में एक दिन में 18 लोगों की मौत उसी बदले का नतीजा है, जो 1967 के वक्त से ही पश्चिम बंगाल की सियासत में जड़ तक बैठा हुआ है. सत्ता में कांग्रेस रही, तो उसने वामपंथ के कार्यकर्ताओं की हत्याएं की, उन्हें जेल में डाला और हर तरह के जुल्म किए. फिर जब सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथ का शासन आया तो उसने बदला लिया. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की हत्या की और वही कहानी दोहराई जिसे कांग्रेस ने शुरू किया था. वामपंथ लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में राज करता रहा, तो सबसे ज्यादा कांग्रेस के कार्यकर्ता मारे गए. फिर जब 2015 में ममता बनर्जी ने सत्ता संभाली तो उनके सामने विरोधी के तौर पर कांग्रेस और वामपंथ के साथ ही बीजेपी भी थी. एक साथ तीन विरोधियों से निपटने के लिए ममता बनर्जी के कार्यकर्ताओं ने भी वही रास्ता अपनाया, जो उनकी पूर्ववर्ती कांग्रेस और वामपंथी सरकारें कर चुकी थीं. और इसी का नतीजा है कि पश्चिम बंगाल देश का वो राज्य है, जहां किसी भी एक साल में सबसे ज्यादा राजनैतिक हत्याएं हुई हैं.
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नतीजे पर पहुंचने के लिए 1 जून को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में हुई बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या और उसे अंजाम देने का तरीका काफी है. पुरुलिया जिले के बलरामपुर इलाके के दाभा गांव के रहने वाले दुलाल कुमार बीजेपी के कार्यकर्ता थे. उम्र 32 साल थी. 2 जून की सुबह दुलाल का शव गांव में ही बिजली के बड़े वाले पोल से लटकता पाया गया.
इससे पहले भी 30 मई को पुरुलिया के बलरामपुर इलाके में ही बीजेपी के एक और कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो की हत्या कर दी गई थी. त्रिलोचन महतो का शव भी पेड़ से लटकता हुआ पाया गया. शव के टीशर्ट पर एक मैसेज भी था, जिसपर लिखा था-#WestBengal
— ANI (@ANI) June 2, 2018
: Body of 32-year-old BJP worker, Dulal Kumar, found hanging by a pole in Dabha village of Purulia's Balarampur. BJP alleges TMC is behind the incident.
''बीजेपी के लिए काम करोगे तो यही अंजाम होगा.''
इसके अलावा शव के पास एक पर्ची भी पड़ी थी. इसपर लिखा था-
''चुनाव के वक्त से ही तुम्हें कत्ल करने की कोशिश कर रहा था. नाकाम रहा. मगर आज तुम मारे गए.''

30 मई को त्रिलोचन महतो की हत्या कर शव पेड़ से टांग दिया गया था. धमकी भरा मैसेज भी था ताकि लोगों में दहशत भरी जा सके.
इन दोनों ही घटनाओं में एक चीज कॉमन है और वो है पुलिस की निष्क्रियता. त्रिलोचन महतो ने हत्या से ठीक अपने भाई को फोन कर कहा था कि उसे जान से मारने की धमकी मिल रही है. उसके बाद त्रिलोचन का पता नहीं चला. घरवालों ने पुलिसवालों को सूचना दी, लेकिन कुछ पता नहीं चला और उसकी लाश ही मिली. दूसरी घटना के बारे में भी बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ट्वीटर पर लिखा है. उन्होंने बताया है कि पश्चिम बंगाल के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर अनुज शर्मा से उनकी बात हुई थी. उन्होंने एडीजी को बताया भी था कि दुलाल की जान खतरे में है. एडीजी ने कहा भी था कि पुलिस उसे बचाने की कोशिश कर रही है. लेकिन नतीजा ये हुआ कि दुलाल का शव बिजली के पोल से लटका हुआ मिला.
हम शर्मिंदा हैं! मैंने कल रात अनुज शर्मा ADG लॉ & ऑर्डर, #WestBengal
से बहुत देर बात की.. बलरामपुर के दुलाल की जान खतरे मे है बताते हुए,उनसे किसी भी हाल मे उसे बचाने के लिए अनेक बार कहा! उन्होने कहा था, पुलिस पूरी ताकत से कोशिश कर रही है और मैं स्वयं पूर्ण प्रयास करूंगा.. 1/2 pic.twitter.com/eW8FFWm4j1
— Kailash Vijayvargiya (@KailashOnline) June 2, 2018
ये कौन सी कोशिश थी, जो पुलिस कर रही थी. अगर कोशिश की होती तो न तो त्रिलोचन महतो मारे गए होते और न ही दुलाल. लेकिन दोनों ही मारे गए. और इनका मरना बंगाल में ममता विरोधी लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन जाए, इसकी भरपूर कोशिश की गई है, जिसमें पुलिस की भागीदारी साफ-साफ दिख रही है.ये दोनों ही घटनाएं उस ममता बनर्जी के राज की हैं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में वामपंथ के किले को ढहाकर कहा था-ADG के पूर्ण प्रयास के बाद भी आखिर#WestBengal
हम शर्मिंदा हैं! शायद प्रजातन्त्र भी शर्मिंदा है!! pic.twitter.com/0IjlhwWctb
के पुरुलिया जिले में,#BJP
कार्यकर्ता दुलाल की लाश भी सुबह टॉवर पर लटकी हुई मिली है!
— Kailash Vijayvargiya (@KailashOnline) June 2, 2018
''हमें बदला नहीं, बदलाव चाहिए.''

पंचायत चुनाव में वोटिंग वाले दिन की हिंसा में ही 18 लोग मारे गए. ममता बनर्जी ने कहा- ये तो छोटी सी घटना है. 18 लोगों का मर जाना, खुलेआम उत्पात होना, मारकाट होना, ये सब ममता के लिए छोटी बात है (फोटो: पीटीआई)
सत्ता मिलने के बाद बदलाव कितना आया, ये तो पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोग ही बता सकते हैं, लेकिन ममता बनर्जी बदला ज़रूर ले रही हैं. पंचायत चुनाव में एक दिन में 18 लोगों की मौत उसी बदले का नतीजा है, जो 1967 के वक्त से ही पश्चिम बंगाल की सियासत में जड़ तक बैठा हुआ है. सत्ता में कांग्रेस रही, तो उसने वामपंथ के कार्यकर्ताओं की हत्याएं की, उन्हें जेल में डाला और हर तरह के जुल्म किए. फिर जब सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथ का शासन आया तो उसने बदला लिया. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की हत्या की और वही कहानी दोहराई जिसे कांग्रेस ने शुरू किया था. वामपंथ लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में राज करता रहा, तो सबसे ज्यादा कांग्रेस के कार्यकर्ता मारे गए. फिर जब 2015 में ममता बनर्जी ने सत्ता संभाली तो उनके सामने विरोधी के तौर पर कांग्रेस और वामपंथ के साथ ही बीजेपी भी थी. एक साथ तीन विरोधियों से निपटने के लिए ममता बनर्जी के कार्यकर्ताओं ने भी वही रास्ता अपनाया, जो उनकी पूर्ववर्ती कांग्रेस और वामपंथी सरकारें कर चुकी थीं. और इसी का नतीजा है कि पश्चिम बंगाल देश का वो राज्य है, जहां किसी भी एक साल में सबसे ज्यादा राजनैतिक हत्याएं हुई हैं.
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कहानी उस राज्य की, जहां सत्ता में कोई भी रहा हो विपक्ष के लोग मारे जाते रहे हैं
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पश्चिम बंगाल कांग्रेस वाले आज के दिन इससे बुरा कुछ नहीं कर सकते थे
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