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आंध्र गैंगरेप केस: 16 साल बाद 13 पुलिसवाले बरी, पीड़िता बोलीं- "फैसला मुंह पर थप्पड़ जैसा"

पीड़ित महिलाओं का घरवालों ने भी बहिष्कार कर दिया था. उन्हें 'शुद्धि स्नान' के बाद घर आने दिया गया.

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Andhra Pradesh Vakapalli gangrape case
कोर्ट ने जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश भी दिया है (फोटो- AFP)
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साकेत आनंद
9 अप्रैल 2023 (अपडेटेड: 9 अप्रैल 2023, 08:05 PM IST)
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ये शब्द 45 साल की आदिवासी महिला के हैं. यह महिला उन 11 आदिवासी महिलाओं में शामिल हैं, जिनके साथ आंध्र प्रदेश में 16 साल पहले 13 पुलिसकर्मियों ने कथित रूप से बलात्कार किया था. 6 अप्रैल को विशाखापट्टनम की एक अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी पुलिसकर्मियों को आरोपों से बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा था कि जांच अधिकारी मामले की सही और निष्पक्ष जांच करने में फेल रहे. कोर्ट ने राज्य सरकार को जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने का भी निर्देश भी दिया.

20 अगस्त 2007 को आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले में पुलिस ने माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन लॉन्च किया था. यह ऑपरेशन राज्य पुलिस ने जिले वाकापल्ली इलाके में चलाया था. इस ऑपरेशन में कुल 30 पुलिसकर्मी शामिल थे. उसी दौरान आदिवासी समुदाय की 11 महिलाओं ने आरोप लगाया था कि पुलिसवालों ने बंदूक का डर दिखाकर उनके साथ बलात्कार किया था. इसी मामले में अब 16 साल बाद पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया गया. हालांकि कोर्ट ने आरोप लगाने वाली महिलाओं को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है.

"परिवारवालों ने भी बहिष्कार किया"

इन 11 महिलाओं में दो की मौत हो चुकी है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने आरोप लगाने वाली एक महिला से बात की. महिला की उम्र अब 45 साल हो चुकी है. उन्होंने अखबार को बताया, 

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रिपोर्ट के मुताबिक, घटना के बाद महिला का पति भी उससे नाराज था. पति ने दो महीने तक उसे छोड़ दिया था. बाद में उसे वापस लाया. दोनों वाकापल्ली में एक एकड़ जमीन पर हल्दी की खेती करते हैं.

40 साल की एक और महिला के साथ ऐसा ही हुआ. परिवार और समाज के लोगों ने बहिष्कार कर . उन्होंने अखबार को बताया, 

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इन महिलाओं की कानूनी लड़ाई सीनियर वकील सुंकारा राजेंद्र प्रसाद ने लड़ी थी. प्रसाद के अनुसार, कोर्ट ने फैसले में कहा कि इस केस की जांच में FIR दर्ज करने के वक्त से ही गड़बड़ी की गई. कोर्ट ने कहा कि जब महिलाओं ने शिकायत की कि उनके साथ 20 अगस्त 2007 को बलात्कार हुआ. लेकिन 26 अगस्त तक FIR दर्ज नहीं की गई. किसी पुलिसवाले ने घटनास्थल पर जाकर बयान दर्ज नहीं किया.

12 साल तक आरोपियों की पहचान ही नहीं करवाई

27 अगस्त 2007 को राज्य सरकार ने आरोपों की जांच करने के लिए विशाखापट्टनम के डिप्टी एसपी (ग्रामीण) बी आनंद राव को मामले की जांच के लिए नियुक्त किया. लेकिन राव 8 सितंबर तक एक बार भी घटनास्थल पर नहीं गए. कोर्ट ने कहा कि 17 दिनों तक अपराध की जगह को ना ही सुरक्षित किया गया और ना ही कोई सबूत इकट्ठा किया गया.

कोर्ट ने ये भी कहा कि FIR दर्ज करने में 6 दिन की देरी के बाद पुलिस ने महिलाओं को मेडिकल जांच के लिए भेजने में दो दिन और लगा दिए. पुलिस ने महिलाओं को ऐसे अस्पताल में जांच के लिए भेजने की कोशिश की, जहां रेप मामलों की जांच के लिए पर्याप्त सुविधा ही नहीं थी. महिलाओं ने विरोध किया तो बाद में उन्हें विशाखापट्टनम के किंग जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया.

कोर्ट के मुताबिक, मामले में 12 सालों तक आरोपियों की पहचान ही नहीं करवाई गई. जब फरवरी 2019 में मुकदमा शुरू हुआ तो कोर्ट ने आरोपियों की पहचान कराने का आदेश दिया. तब महिलाओं ने कहा था कि 12 साल बाद वो कैसे किसी आदमी की पहचान करेंगे.

"तूफान में डॉक्यूमेंट्स गुम हो गए"

जांच अधिकारी बी आनंद राव ने पुलिस स्टेशन से उस ड्यूटी रजिस्टर को लेकर नहीं रखा था, जहां से पुलिसकर्मी नक्सल विरोधी ऑपरेशन के लिए गए थे. जांच पूरी होने से पहले ही आनंद राव का निधन हो गया. बाद में दूसरे जांच अधिकारी एम शिवानंद रेड्डी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अक्टूबर 2014 में हुदहुद तूफान के दौरान डॉक्यूमेंट्स गुम हो गए. बाद में शिवानंद रेड्डी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ली थी. फिर तेलुगू देसम पार्टी में शामिल हो गए. 2019 में नांदयाल से लोकसभा चुनाव भी लड़े लेकिन हार गए थे.

इस मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों की तरफ से वकील ने कहा कि महिलाओं का आरोप "माओवादी साजिश" का हिस्सा था. ताकि पुलिसकर्मियों को फंसाकर ऐसे नक्सल विरोधी ऑपरेशन को रोका जा सके. वकील हरीश वर्मा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि एक सबूत नहीं था जिससे आरोप साबित हो पाए कि महिलाओं के साथ रेप हुआ. मामले में महिलाओं के बयान के अलावा और कुछ भी नहीं था.

मामले में सभी पुलिसकर्मियों के खिलाफ IPC की धारा- 376(2) (पुलिस अधिकारी द्वारा रेप) के तहत केस दर्ज किया गया था. साथ ही SC/ST (अत्याचार रोकथाम) कानून की धाराएं भी लगाई गई थीं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप पर 11 साल बाद मुकदमा शुरू हुआ था.

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