सुबह से क्या किया - 'हगा और भगा': कहानी वंडर बॉय बुधिया की (Trailer arrival)
"बुधिया सिंह - बोर्न टु रन" का ट्रेलर आ गया है जिसमें मनोज बाजपेयी कोच बिरंची दास की भूमिका में है जिनकी 2008 में हत्या कर दी गई थी.
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फोटो - thelallantop
भुवनेश्वर, उड़ीसा के अपने हॉस्टल में बैठकर 14 साल की वो आंखें भी इस ट्रेलर को जरूर देख रही होंगी जो अभी-अभी रिलीज हुआ है. आंखें बुधिया सिंह की. सारा हिसाब उसी के पास है कि निर्देशक सौमेंद्र पधी ने उसकी कहानी कितनी सच्चाई से पेश की है और कितनी सिनेमाई छूट ली है. ट्रेलर के अंत में सड़क पर पसीने में लथपथ चार साल का बुधिया दौड़ रहा है और बोल रहा है, जितना ज्यादा रोकोगे, उतना ज्यादा दौड़ूंगा. लगता नहीं कि उतनी कम उम्र में ऐसा कोई संकल्प उसके मन में रहा होगा. ये तो दर्शकों की सहूलियत के लिए उनके विचारों को कतारबद्ध करने की सस्ती सुरंग बना दी गई है.
ये बुधिया पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री है जो 2011 में प्रदर्शित हुई थी और इसे एमी पुरस्कार में भी नामांकित किया गया था. डॉक्यूमेंट्री का ट्रेलर हजार गुना बेहतर है. इसमें जैसे बुधिया और बिरंची के किरदार बहुत ही विशेष रूप से उभरकर आते हैं, वैसे इस फीचर फिल्म में बिलकुल नहीं आ पाते.
https://www.youtube.com/watch?v=QWMpcOsfk9w
एक औसत फिल्म के सारे पैमानों पर मनोज बाजपेयी स्टारर फीचर फिल्म का ट्रेलर खरा उतरता है. उन्हीं सांचों में फिल्म का एक-एक फ्रेम डाला गया है जो बॉलीवुड की स्टोरीटेलिंग है. मनोज और बुधिया के पात्र में बालक या अन्य सब पात्र कोई भी उड़िया का एक शब्द भी नहीं बोलता, कितनी विडंबना है, जबकि असल में बुधिया को हिंदी नहीं आती. बिरंची भी हिंदी-इंग्लिश के कुछेक शब्द ही बोलते थे.
खैर, फिल्म में ताजा कुछ नहीं है. ऋतिक स्टारर मुअनजो दड़ो वाली ही बात है कि सब कुछ predictable है.
फिल्म में फनी पल भी डालने की कोशिश हुई है. जब उसे स्कूल में दाखिला दिलवाया जाता है और वो पहली बार क्लास पहुंचता है तो टीचर सब बच्चों से परिचय करवाती है कि बोलो बेटा आज क्या क्या किया, तो बुधिया कहता है, हगा और भगा. सब हंसने लगते हैं. जाहिर है हंसने जैसा कुछ है नहीं. फिर बाद के दृश्यों में कोलाहल भी बहुत है.
बुधिया की असली कहानी भी यही थी. टीवी पर न्यूज़ सर्कस के शुरुआती दौर में 2006 में चार साल के बच्चे बुधिया सिंह की कहानी सामने आई. पिता की मृत्यु हो गई थी. भुखमरी के चलते मां ने 800 रुपए में बेच दिया था. लेकिन जानवरों जैसा बर्ताव देख मां का दिल जरा पसीजा और भुवनेश्वर के स्थानीय जूडो कोच से कहा कि उसे अपने पास रखे.
कोच बिरंची दास ने उसे 800 रुपए में वापस खरीदा. वहां एक दिन उसे सजा दी कि मैदान के चक्कर लगाए. कुछ घंटों बाद उसे याद आया. लौटकर देखा है कि बुधिया अभी भी दौड़ रहा है और उसका शरीर सामान्य है. ह्रदयगति भी. यहीं से बिरंची ने उसे विशेष रूप से ट्रेन करना शुरू किया. लिम्का बुक में उसका नाम दर्ज हुआ. चार की उम्र में भुवनेश्वर से पुरी के बीच की 65 किलोमीटर की दूरी 7 घंटे 2 मिनट में पूरी की. आस-पास मीडिया, राजनेताओं, संगठनों का सर्कस बढ़ता गया लेकिन इस उम्र में बुधिया 48 मैराथन/दौड़ पूरी कर चुका था. इसी दौरान बिरंची पर भी तरह तरह के आरोप लगे.
https://www.youtube.com/watch?v=YGft9XiX4bs

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