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तमिलनाडु: सरकार और राज्यपाल की लड़ाई के पीछे असली खेल कौन खेल रहा है?

क्या सिर्फ भाजपा के ही राज में ''एक्टिव'' महामहिम रहे?

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13 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 13 जनवरी 2023, 08:47 PM IST)
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सांकेतिक फोटो (साभार: आजतक)
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शुरुआत आज फिर एक सवाल से हो रही है. क्या आपको असम के राज्यपाल का नाम मालूम है? सोचिए, दिमाग पर ज़ोर डालिए. आप में से कुछ ही होंगे, जिनकी ज़बान पर प्रोफेसर जगदीश मुखी का नाम आएगा. लेकिन अगर आपसे केरल के गवर्नर का नाम पूछा जाएगा, तो आप दन्न से बता देंगे - आरिफ मोहम्मद खान. शॉक लगा?

चलिए एक और बार ये खेल खेलते हैं. मध्यप्रदेश के राज्यपाल कौन हैं? मंगूभाई पटेल, या आनंदीबेन पटेल? लेकिन जैसे ही हम दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर का नाम आपसे पूछेंगे, आप तुरंत बता देंगे - विनय कुमार सक्सेना.

जवाब देने की हड़बड़ी में आप पश्चिम बंगाल का राज्यपाल, जगदीप धनखड़ को मत बता दीजिएगा. वो तो उप राष्ट्रपति बन गए. उनकी जगह आए हैं --- सोचिये सोचिये -- सीवी आनंद बोस.

गलती आपकी नहीं है. भारत में सारे सूबों के राज्यपाल महामहिम ही होते हैं, लेकिन कुछ का ज़िक्र आप तक पहुंचता है, कुछ का नहीं. जैसे आप नहीं जानते कि थावर चंद गहलोत ने कर्नाटक राजभवन से आखिरी बयान क्या दिया था. लेकिन आप अच्छे से जानते हैं कि चेन्नई के राजभवन से आर. एन रवि ने जो निमंत्रण पत्र भिजवाया, उसमें तमिलनाडु को एक नए नाम से पुकारा गया. एक दिन ऐसा नहीं बीतता, जब रवि और सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस की स्टालिन सरकार के बीच किसी नए झगड़े की खबर नहीं आती. फिर दिल्ली दिल्ली है, जहां मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच की खटपट कबसे जारी है, आपको याद भी नहीं होगा.

आज हम इसी विचित्र फिनोमिना को समझने की कोशिश करेंगे. कि ये कैसे तय होता है कि कौन से सूबे का राजभवन एक्टिव रहेगा, और कौनसा नहीं. कि माननीय और महामहिम की इस लड़ाई के पीछे है कौन? और सबसे बड़ा सवाल - कि क्या सिर्फ भाजपा के ही राज में ''एक्टिव'' महामहिम रहे, या इतिहास के पन्ने पलटने पर एक दूसरी परंपरा मिलती है, जिसमें रोमेश भंडारी, बूटा सिंह और मोतीलाल वोहरा जैसे नाम आते हैं. तो आइये शुरू करें.

सबसे पहले हम चलेंगे तमिलनाडु, जहां की हलचल से हमें इस विषय पर शो बनाने की प्रेरणा मिली. यहां सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस SPA की MK स्टालिन सरकार है. इस गठबंधन में सीनियर पार्टनर है तमिलनाडु की द्रविड राजनीति की पुरानी खिलाड़ी DMK. और राज्यपाल हैं RN रवि. इन दोनों के बीच एक बड़ा विचित्र झगड़ा चल रहा है. भाषा का. 4 जनवरी 2023 को रवि ने कहा,

"तमिलनाडु को तमिळागम कहना ज्यादा उपयुक्त होगा."

गवर्नर साहब का ये कहना था कि तमिलनाडु की द्रविड पार्टियों ने विरोध शुरू कर दिया. सबसे आगे रही DMK. 9 जनवरी को तमिलनाडु विधानसभा में सदन की कार्यवाही चल रही थी, तब तमिळागम वाली बात पर रवि के खिलाफ नारेबाज़ी हो गई. DMK प्रवक्ताओं ने तो ये भी कह दिया कि रवि चाहें तो राज्याल के साथ-साथ सूबे में भाजपा प्रमुख भी हो जाएं.

लेकिन अगले ही दिन, माने 10 जनवरी को चेन्नई स्थित राजभवन ने पोंगल के लिये जो निमंत्रण पत्र तैयार किये, उनमें तमिलनाडु शासन की जगह भारत सरकार का लोगो लगा दिया. और राज्यपाल के लिये ''तमिळागा आलुनार'' शब्द का इस्तेमाल हुआ है. माने ''तमिळागम'' के राज्यपाल. इसी दिन उन्होंने एक और बयान दे दिया, जिसके निशाने पर एक बार फिर स्टालिन सरकार थी. उन्होंने कहा कि स्टालिन सरकार केंद्र सरकार के लिए ''मतिय अरसु'' की जगह ''ओंद्रिय अरसु'' शब्द का इस्तेमाल कर रही है, जो कि ''पॉलिटिकली ओवरलोडेड'' और अपमानजनक है. जवाब में DMK ने तपाक से बयान दे दिया कि सही शब्द ओंद्रिय अरसु ही है, जिसका अर्थ हुआ संघीय सरकार, माने यूनियन गवर्मेंट. जबकि मतिय अरुसु, मतलब केंद्र सरकार एक ''प्रोब्लेमैटिक'' शब्द है.

आपको लग रहा होगा कि सीएम-राज्यपाल के झगड़े तो बहुत सुने, लेकिन ऐसा झगड़ा पहली बार सुना जहां भाषा और व्याकरण पर बहस हो रही हो. तो हम आपको बता दें, बात यहां भाषा की है ही नहीं. बात क्या है, सुनिए रूस्टर न्यूज़ के संपादक राहुल वी से. उन्होंने हमें बताया कि तमिळागम और तमिलनाडु को लेकर कभी बहस थी ही नहीं.

इसी तरह जब MK स्टालिन मतिय अरसु और ओंद्रिय अरसु में फर्क करते हैं, और रवि उसे अपमान जनक बताते हैं, तब भी निशाना कहीं और होता है.

रवि और स्टालिन सिर्फ भाषा पर नहीं झगड़ रहे. DMK का आरोप है कि गवर्नर ने डेढ़ दर्जन बिलों को आगे बढ़ाने में देरी की. तो राजभवन की शिकायत है कि गवर्नर के कार्यक्रम में सरकार के मंत्री शिरकत नहीं करते.

DMK का आरोप है कि गवर्नर ने 9 जनवरी के रोज़ पेरियार, आंबेडकर और द्रविड़ मॉडल जैसे शब्दों को अपने अभिभाषण में नहीं पढ़ा, जबकि वो अप्रूव्ड कॉपी थी. स्टालिन सरकार ने गवर्नर को टोक दिया और एक प्रस्ताव पास करवा दिया कि रिकॉर्ड पर वही भाषण जाएगा, जो सरकार ने तय किया. रवि आहत हुए, सदन से बाहर चले गये. जबकि राष्ट्रगान हुआ नहीं था.

अगले दिन DMK कार्यकर्ताओं ने चेन्नई में रवि के पोस्टर लगा दिये, जिनपर लिखा था - रवि बाहर जाओ. और इसके अगले ही दिन राजभवन से पोंगल का वो निमंत्रण पत्र आ गया, जिसका ज़िक्र हमने पहले किया था.

टिप्पणीकार कह रहे हैं कि तमिल नाडु में राजभवन और सरकार, दोनों की ओर से सामान्य शिष्टाचार की अवहेलना हो रही है. अखबारों में लंबे लंबे संपादकीय छप रहे हैं, लेकिन फिक्र किसे है.

तमिलनाडु के बाद आ जाइए दिल्ली. यहां अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सरकार है और उप राज्यपाल हैं विनय कुमार सक्सेना. दिल्ली में जब से अरविंद केजरीवाल आए हैं, तभी से उनकी खटपट उप राज्यपालों से चल रही है. नजीब जंग, अनिल बैजल और विनय कुमार सक्सेना के अब तक के कार्यकाल में हमने अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक स्टांस को बदलते हुए भी देखा है. एक वक्त उन्हें confrontational माना जाता था. फिर कहा गया कि आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया ने राजनीति में विरोधियों से समन्वय बनाना सीख लिया है. लेकिन जैसे जैसे आम आदमी पार्टी अपनी पहुंच दिल्ली से बाहर बढ़ा रही है, एक बार फिर दिल्ली सरकार और उप राज्यपाल आमने सामने हैं.

मई 2022 में विनय कुमार सक्सेना नए-नए दिल्ली के उपराज्यपाल बने थे. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सिंगापुर से न्योता आया. उन्हें वर्ल्ड सीटीज़ समिट में बुलाया गया था. दिल्ली सरकार ने सीएम के सिंगापुर जाने के लिए फाइल को LG ऑफिस भेजा. LG ने परमीशन देने से मना कर दिया. LG ने कहा कि ये समिट मेयर्स की समिट है. इसमें मुख्यमंत्री का जाना ठीक नहीं होगा.

उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच ये पहला बड़ा विवाद था. केजरीवाल ने LG को अपनी चिट्ठी में लिखा कि ये सिर्फ मेयर्स की समिट नहीं है. इसमें दुनिया के अलग-अलग शहरों के मेयर, लीडर्स और एक्सपर्ट्स आ रहे हैं. और सिंगापुर की सरकार ने मुझे दिल्ली का प्रतिनिधित्व करने के लिए न्योता भेजा है.

15 जुलाई, 2022 तक केजरीवाल को सिंगापुर सरकार को ये बताना था कि उन्होंने न्योता स्वीकार कर लिया है. लेकिन इजाजत नहीं मिलने पर केजरीवाल सरकार की तरफ से कोई रिप्लाई नहीं दिया गया. सिंगापुर सरकार ने बाद में न्योता स्वीकार करने की तारीख को 20 जुलाई तक बढ़ा दिया. लेकिन 20 जुलाई तक भी LG ने केजरीवाल को सिंगापुर जाने की इजाजत नहीं दी. इस मसले पर दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच खूब तनातनी देखने को मिली थी.

ये उदाहरण पुराना लग रहा हो, तो 11 जनवरी, 2023 की मिसाल ले लीजिये. दिल्ली के LG विनय कुमार सक्सेना ने आम आदमी पार्टी को एक नोटिस जारी करते हुए 10 दिन के अंदर 163 करोड़ 62 लाख रुपये जमा करने का आदेश दे दिया. केजरीवाल सरकार पर आरोप हैं कि उन्होंने सरकार के पैसों से दिल्ली के बाहर प्रचार कराया. जो कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का उल्लघन है. केंद्र सरकार की तीन सदस्यीय कमेटी की जांच में केजरीवाल सरकार और आम आदमी पार्टी को दोषी पाया था. ये जांच 2016 में हुई थी.

163 करोड़ 62 लाख रुपये में से 99 करोड़ 31 लाख मूल धन है. और 63 करोड़ 31 लाख रुपये ब्याज. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक LG के नोटिस में कहा गया है कि अगर आम आदमी पार्टी आदेश का पालन नहीं करती है पार्टी का हेडक्वॉटर भी सीज़ किया जा सकता है.

LG इस आदेश से कुछ दिन पहले ही एक और आदेश आया था. जिसमें कहा गया था आम आदमी पार्टी का प्रचार भी दिल्ली सरकार के पैसों से हुआ है. इस चिट्ठी में निर्देश दिया गया था कि वह राज्य के खजाने को 42 करोड़ 26 लाख 81 हजार रुपये तुरंत भुगतान करें. साथ ही बकाया 54 करोड़ 87 लाख 87 हजार रुपये का भुगतान संबंधित विज्ञापन एजेंसियों या प्रकाशक को 30 दिनों के भीतर करें. पत्र में कहा गया कि ये पैसे आम आदमी पार्टी के विज्ञापनों पर खर्च किए गए थे, जिनका भुगतान सरकारी खजाने से किया गया.

LG के 163 करोड़ के नोटिस पर दिल्ली सरकार ने जवाब दिया है. डिप्टी सीएम सिसोदिया ने कहा कि दिल्ली सरकार के अधिकारियों का एलजी और बीजेपी द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है. कोई सार्वजनिक सेवा कार्य करने के लिए नहीं, बल्कि निर्वाचित मंत्रियों और सत्तारूढ़ आप को निशाना बनाने के लिए. इसलिए वे "सेवाओं" पर अपना नियंत्रण जारी रखना चाहते हैं. लेफ्टिनेंट गवर्नर के दफ्तर से इन लक्षित बयानों का सीधा जवाब तो नहीं आता. लेकिन गतिविधियां जारी रहती हैं.

ऐसा नहीं है कि एक्टिव राज्यपाल 2014 के बाद ही आए. ये सिलसिला उतना ही पुराना है, जितनी पुरानी आज़ाद भारत की चुनावी राजनीति. एक वक्त में पंजाब और राजस्थान के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित और कभी राजीव गांधी सरकार में नंबर 2 की हैसियत रखने वाले सरदार बूटा सिंह. 2004 में उन्हें संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन UPA ने बिहार का राज्यपाल बनाया. फरवरी 2005 में बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ, किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला. 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी राष्ट्रीय जनता दल RJD. कांग्रेस के पास आईं 10 सीटें. बहुमत का नंबर फिर भी नहीं जुट पा रहा था। 55 सीटें JDU के पास थीं और 37 सीटें बीजेपी को मिली.

सत्ता की चाबी 28 सीटें पाने वाली रामविलास पासवान की LJP के पास फंसी थी. लेकिन रामविलास पासवान ने एक शर्त रख दी। वो ये कि RJD अगर किसी मुस्लिम को सीएम बनाए तो वो समर्थन देंगे. वरना नहीं. यहीं से खेल शुरू हो गया. खरीद-फरोख्त की कोशिशें हुई. तो पार्टियां अपने विधायकों को बचाने नए-नए बने झारखंड ले जाने लगीं.

अगले 3 महीने तक कोई सरकार नहीं बना सका, राज्यपाल बूटा सिंह ने अनुच्छेद 356 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, बिहार विधानसभा को 23 मई 2005 की आधी रात को भंग कर दिया. जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार अपना दावा पेश करने वाले थे, उससे ठीक पहले ये फैसला लिया गया.

बूटा सिंह के फैसले पर गंभीर सवाल उठे. सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई गई. संविधान पीठ ने अक्टूबर 2005 में अपना फैसला सुनाया. मामले में सुप्रीम कोर्ट के कहा- राज्यपाल बूटा सिंह ने असंवैधानिक निर्णय लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल को गुमराह किया. पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से  दिए गए फैसले में कहा- राज्यपाल का उद्येश्य एक दल को सरकार बनाने का दावा करने से रोकना था. विधानसभा भंग करने के लिए बूटा सिंह ने जो रिपोर्ट भेजी थी उसे संविधान पीठ ने दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा था- ये रिपोर्ट पूर्वाग्रह और परिकल्पनाओं पर आधारित थी। हालांकि  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया था, लेकिन ये जरूर कहा कि इसे लेकर एक बड़ी संवैधानिक बहस की जरूरत है. फैसले के बाद 2006 में ही केंद्र की कांग्रेस सरकार ने उन्हें वापस बुला लिया था.

ये पहला उदाहरण था. दूसरा उदाहरण उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे रोमेश भंडारी से जुड़ा है. 21 अक्टूबर 1998 की तारीख थी. तब यूपी का राज्यपाल रहते हुए रोमेश भंडारी ने सबको हैरत में डालते हुए कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया. दरअसल समर्थन देने वाले - लोकतांत्रिक कांग्रेस, जनता दल पाण्डेय सरीखे दलों ने खुद को सरकार अलग कर लिया था. कल्याण सिंह बहुमत साबित करने का वक्त चाहते थे, मगर उससे पहले ही सरकार को बर्खास्त कर दिया गया.

रातों-रात लोकतांत्रिक कांग्रेस के जगदंबिका पाल को सूबे के मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी. साथ में 17 मंत्रियों ने भी शपथ ली. रातों-रात वाजपेयी दिल्ली से लखनऊ की ओर भागे. आनन-फानन में मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचाया. कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को असंवैधानिक करार दिया. जगदंबिका पाल दो दिनों तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बने. बहुमत भी साबित कर लिया.

इनके अलावा 2005 में झारखंड के राज्यपाल रहे सैय्यत सिब्ते रजी और 2009 में कर्नाटक के राज्यपाल रहे हंसराज भरद्वाज के फैसले भी विवादित रहे थे. झारखंड में बिना बहुमत के UPA के साथी सीबू सोरेन को शपथ दिला दी गई थी तो कर्नाटक में बीजेपी की यदुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर दोबारा बहुमत साबित करने को कहा गया था. एक वाक्या बीजेपी की तरफ से राज्यपाल बनाए गए सुंदर सिंह भंडारी का भी याद आता है, जब उन्होंने 1999 में राबड़ी देवी की सरकार को बर्खास्त कर दिया था. एक महीने के भीतर ही उनका भी फैसला गलत साबित हो गया था.

ये सारे उदारण हमने इसलिए दिए. ताकि ये समझाया जा सके कि केंद्र की सत्ताएं कैसे अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से विपक्षी राज्यों में अपने राज्यपाल का इस्तेमाल करती रही हैं.

तो साफ है, झंडे का रंग बदल गया, लेकिन महामहिमों के काम करने का तरीका नहीं बदला. बार बार केंद्र की तरफ से राज्यों में दखल देने की कोशिश हुई. आप इसे ''चलता है'' या ''सबने किया'' कहकर खारिज नहीं कर सकते. अगर ऐसे चला, तो फिर संघीय ढांचे का क्या मतलब रह जाता है. क्या एक बड़ी सरकार, दूसरी सरकार को सिर्फ इसलिए परेशान कर सकती है, कि वो आकार या ओहदे में छोटी है? जबकि जनता ने तो दोनों को ही चुना. ऐसे में तो लोकतंत्र का मतलब यही रह जाएगा कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस. अब फैंसला आपको करना है. कि आप सर्वोच्च किसे मानते हैं - राज्यपाल को, मुख्यमंत्री को या फिर संविधान को.

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