"...धर्मनिरपेक्षता की जरूरत नहीं" कहने वाले राज्यपाल आरएन रवि बहुत कुछ कहते रहे हैं
ये पहली बार नहीं है कि जब आर.एन. रवि के बयान पर विवाद हुआ है. राज्यपाल बनने के बाद से ही तमिलनाडु सरकार के साथ उनकी तनातनी रही है.

तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि के धर्मनिरपेक्षता पर दिए बयान के बाद विवाद छिड़ा हुआ है. विपक्ष के नेता उनका इस्तीफा मांग रहे हैं. 22 सितंबर को कन्याकुमारी में एक कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने कहा था कि "धर्मनिरपेक्षता एक यूरोपीय अवधारणा" है और भारत को इसकी जरूरत नहीं है. राज्यपाल के इस बयान पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने तुरंत उन्हें पद से हटाने की मांग कर दी.
राज्यपाल ने क्या-क्या कहा?आर.एन. रवि ने कहा कि भारत के लोगों के साथ कई सारे फ्रॉड हुए हैं और उनमें से एक धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा है. उन्होंने कहा,
राज्यपाल का इशारा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरफ था. 1976 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए ही संविधान में संशोधन कर धर्मनिरपेक्ष शब्द को संविधान में जोड़ा गया था. तब देश में आपातकाल लागू था.
तमिलनाडु के राज्यपाल ने आगे कहा कि स्वतंत्रता के दौरान जब संविधान ड्राफ्ट किया जा रहा था, तब धर्मनिरपेक्षता की चर्चा आई थी. उन्होंने दावा किया कि संविधान सभा ने इसे ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि भारत एक धर्म केंद्रित राष्ट्र है और यहां यूरोप की तरह कोई झगड़ा नहीं है. ये उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय अवधारणा नहीं है.
विपक्ष ने हटाने की मांग कीकांग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि राज्यपाल वही बात कर रहे हैं, जो प्रधानमंत्री उनसे करवाना चाहते हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा,
पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर लिखा,
CPI(M) नेता बृंदा करात ने राज्यपाल की आलोचना करते हुए कहा कि ये RSS का विचार है. उन्होंने न्यूज एजेंसी ANI से कहा,
पहले भी विवादों में रहे आर.एन. रविआर.एन. रवि, एक चर्चित IB अधिकारी रहे हैं, जिनका उत्तर-पूर्वी संघर्ष पर विशेष काम रहा है. उन्होंने 1 अगस्त 2019 से 9 सितंबर 2021 तक नागालैंड के राज्यपाल के तौर पर काम किया. इस बीच 18 दिसंबर 2019 से 26 जनवरी 2020 तक उनके पास मेघालय के राज्यपाल की भी अतरिक्त जिम्मेदारी थी. नगा उग्रवादियों के साथ बातचीत में वे भारत सरकार की ओर से मुख्य वार्ताकार थे, लेकिन नगा उग्रवादियों के एक गुट ने आर.एन. रवि के साथ कोई भी डायलॉग करने से इनकार कर दिया था. इसके बाद उन्हें तमिलनाडु भेजा गया. सितंबर 2021 में उनकी नियुक्ति के बाद से ही सरकार के साथ तनातनी रही है.
4 जनवरी 2023. राज्यपाल आर.एन. रवि ने कह दिया कि तमिलनाडु को "तमिझगम" कहना ज्यादा उपयुक्त होगा. उन्होंने दलील दी थी कि नाडु का अर्थ राष्ट्र होता है जो "अलगाववाद" को दिखाता है. उनके इस बयान के खिलाफ डीएमके और दूसरे दलों के नेताओं ने खूब विरोध किया था.
9 जनवरी 2023. तमिलनाडु विधानसभा के शीतकालीन सत्र का पहला दिन था. राज्यपाल आर.एन. रवि कार्यवाही के बीच में सदन छोड़ कर चले गए. राष्ट्र गान के लिए भी नहीं रुके. दरअसल, डीएमके-गठबंधन के विधायक 'तमिलनाडु वाझगवे' (तमिलनाडु अमर रहे) और 'एंगलनाडु तमिलनाडु' (हमारी ज़मीन तमिलनाडु है) जैसे नारे लगाने लगे. ये नारे असल में आर.एन. रवि की "तमिझगम" वाली टिप्पणी के विरोध में थे.
इसके बाद राज्यपाल ने 'द्रविड़ मॉडल', 'पेरियार', 'धर्मनिरपेक्षता' और 'आंबेडकर' सहित कुछ शब्द अपने भाषण में नहीं पढ़े. राज्य के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने आर.एन. रवि के भाषण को रोका और आपत्ति जताई कि आर एन रवि ने तैयार किया हुए भाषण के कुछ हिस्से जानबूझ कर छोड़ दिए. फिर स्टालिन ने एक प्रस्ताव पेश किया कि सदन के शीतकालीन सत्र के पहले दिन वही भाषण जाना चाहिए, जो सरकार तैयार करती है. प्रस्ताव पारित हो गया. इसके बाद विरोध के तौर पर रवि सदन से वॉक-आउट कर गए.
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जून 2023. आर.एन. रवि ने राज्य सरकार के मंत्री सेंथिल बालाजी को पद से हटा दिया था. सेंथिल बालाजी को ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया था, जिसके बाद राज्यपाल ने ये फैसला लिया था. हालांकि, इसके लिए उन्होंने राज्य सरकार से कोई सलाह नहीं ली थी. सरकार ने घोषणा की थी कि वे मंत्री पद पर बने रहेंगे. बाद में राज्यपाल ने अपने ही फैसले को पलट दिया था. केंद्रीय गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद इस फैसले को पलटा गया था.
28 अक्टूबर 2023. तमिलनाडु सरकार राज्यपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. सरकार ने दावा किया कि राज्यपाल ने विधानसभा से पारित 12 विधेयकों पर अपनी सहमति रोक रखी है. आरोप लगाया कि राज्यपाल 'असंवैधानिक तरीके' से राज्य सरकार के कामकाज में व्यवधान डाल रहे हैं. डीएमके सरकार ने याचिका में कहा था कि ये असाधारण परिस्थिति है और इसके लिए असाधारण उपाय होने चाहिए.
तमिलनाडु के साथ पंजाब और केरल सरकार ने भी इसी तरह की याचिकाएं दायर की थीं. 7 नवंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को थोड़ा आत्ममंथन करना चाहिए. राज्यपालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे लोगों के चुने हुए प्रतिनिधि नहीं हैं.
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