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'असभ्यता का प्रतीक'- मुस्लिम बहुल देश में लगा हिजाब पर बैन, पूरी कहानी बहुतों को सोचने पर मजबूर कर देगी!

Tajikistan ने हिजाब पहनने पर बैन लगा दिया है. ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति Emomali Rahmon हिजाब को विदेशी ड्रेस बताते हैं. और देश में बढ़ते धार्मिक कट्टरता को अपनी सत्ता के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं. राष्ट्रपति रहमान ने 2015 में हिजाब के खिलाफ अपना अभियान शुरू किया था. और इसे खराब शिक्षा और असभ्यता का सबूत बताया था.

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24 जून 2024 (अपडेटेड: 24 जून 2024, 01:58 PM IST)
Tajikistan hijab ban President Emomali Rahmon
ताजिकिस्तान ने हिजाब पहनने पर बैन लगा दिया है. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)
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मुस्लिम बहुल देश ताजिकिस्तान ने हिजाब पहनने पर बैन (Tajikistan Hijab Ban) लगा दिया गया है. 8 मई को इसके लिए ताजिक संसद के लोअर हाउस (मजलिसी नमोयंदगोन) में एक विधेयक पारित किया गया था. जिस पर बकरीद के जश्न के बाद 19 जून को अपर हाउस (मजलिसी मिल्ली) ने भी मुहर लगा दी. ताजिकिस्तानी संसद के इस फैसले से राष्ट्रपति इमोमाली रहमान के बयानों को कानूनी आधार मिल गया है. जिसमें वो हिजाब को विदेशी ड्रेस बताते हैं. आखिर एक ऐसा देश जहां 90 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, राष्ट्रपति इमोमाली रहमान हिजाब पर बैन क्यों लगाना चाहते हैं? इसको समझने की कोशिश करेंगे. लेकिन पहले नए कानून के बारे में जान लेते हैं.

क्या है Hijab Ban पर नया कानून?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विधेयक छुट्टियों और समारोहों के रेगुलेशन से संबंधित मौजूदा कानून में संशोधन करता है. और राष्ट्रीय संस्कृति के मुताबिक, विदेशी माने जाने वाले कपड़ों के आयात, बिक्री, प्रचार और पहनने पर रोक लगाता है. इन बदलावों के केंद्र में हिजाब पर लगने वाला बैन है. जो मुस्लिम महिलाओं द्वारा सिर ढंकने के लिए पहने जाने वाला एक कपड़ा है. इस विधेयक में ईद और नवरोज पर बच्चों को मिलने वाली ईदी (बच्चों को उपहार में पैसे देने की प्रथा) पर बैन लगाया गया है. ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा पर होने वाले उत्सवों पर भी बैन का प्रावधान है. रेडियो लिबर्टी की ताजिक सेवा के अनुसार, इस कानून का उल्लंघन करने पर 7,920 सोमोनी ($747) से लेकर 39,500 सोमोनी ($3,724) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. यानी लगभग 62 हजार रुपये से लेकर लगभग 3 लाख 10 हजार रुपये तक.

हिजाब और इमोमाली रहमान की राजनीति

राष्ट्रपति इमोमाली रहमान एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं. जिसका उद्देश्य ताजिक संस्कृति को बढ़ावा देना और सार्वजनिक रूप से धर्म और उससे जुड़े प्रतीकों के प्रदर्शन को सीमित करना है. हिजाब पर प्रतिबंध उनके द्वारा इस दिशा में लिए गए फैसलों की सीरीज में लेटेस्ट स्टेप है. यह उनकी राजनीति और सत्ता पर पकड़ की गहराई से जुड़ा हुआ है.
रहमान 1994 से इस मध्य एशियाई देश के राष्ट्रपति का पद संभाल रहे हैं. वे 30 साल से सत्ता मे हैं. जोकि इस इलाके में सबसे लंबे समय तक चलने वाला शासन है. अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने कट्टर धार्मिक रुझान वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ स्टैंड लिया था.

उन्होंने सोवियत समाजवादी गणराज्य ताजिकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में काम किया था. जो उस समय (USSR) का हिस्सा था. 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद देश में सोवियत समर्थकों और जातीय-धार्मिक समूहों (संयुक्त ताजिक विपक्ष) के बीच गृह युद्ध हुआ. रहमान सोवियत समर्थक ग्रुप का हिस्सा थे.

देश में गरीबी और आर्थिक अवसरों की कमी के खिलाफ व्यापक विरोध के बीच 1994 में राष्ट्रपति चुनाव हुआ. जिसमें रहमान को जीत मिली. वह ताजिकिस्तान के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रमुख हैं. जो 1994 से सत्ता में है.

सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए पिछले कई दशकों में उन्होंने देश के संविधान में कई बदलाव किए हैं. सबसे बड़ा बदलाव 2016 में हुआ. जब उन्होंने ताजिकिस्तान के संविधान में संशोधन करके राष्ट्रपति के कार्यकाल की संख्या पर लगी सीमा को हटा दिया. उन्होंने धर्म आधारित राजनीतिक दलों पर भी बैन लगा दिया. जो उनकी पार्टी के लिए चुनौती खड़ी कर सकते थे.

ताजिकिस्तान में इस्लामी कट्टरता रोकने के लिए बैन?

ताजिकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक मिशन के पूर्व प्रवक्ता और पत्रकार मासूमेह तोरफे ने अलजजीरा में 2015 में देश में बढ़ते धार्मिक प्रतिबंधों के बार में लिखा, 

ताजिक राष्ट्रपति का कपड़ो के प्रति घबराहट वाला रवैया सोवियत संघ के विघटन के बाद आम लोगों में बढ़ती धार्मिकता का परिणाम है. इबादत के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को आकर्षित करने के लिए नई मस्जिदें बनाई गई हैं. नए-नए इस्लामिक अध्ययन समूह बने हैं. और अधिकतर पुरुष और महिलाओं ने इस्लामी शैली के पहनावे अपनाए हैं. साथ ही ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान के बॉर्डर एरिया में इस्लामी आर्म्ड ग्रुप एक्टिव रहे हैं.

हालांकि ‘तोरफे’ से इतर कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मध्य एशियाई देशों में कट्टरपंथी इस्लाम से खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है. उनके मुताबिक देश में सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों में तेजी आई है. लेकिन यह विचार बहुत सटीक नहीं है कि सोवियत शासन खत्म होने के बाद इस क्षेत्र में इस्लामिक प्रभाव बढ़ा है. सोवियत नियंत्रण के दौरान भी इस्लामिक प्रथाएं स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा रही थी.

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पहले भी इस तरह के नियम बने थे

2007 में भी ताजिकिस्तान में छुट्टियों और समारोहों को रेगुलेट करने वाला एक कानून पास किया गया था. जिसमें इस्लामिक कपड़ों और वेस्टर्न स्टाइल के मिनी स्कर्ट पर बैन लगाया गया था. इसके परिणामस्वरूप सभी छात्रों और सभी सार्वजनिक संस्थानों में हिजाब के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी.

राष्ट्रपति रहमान ने 2015 में हिजाब के खिलाफ अपना अभियान शुरू किया था. उन्होंने कहा था कि यह खराब शिक्षा और असभ्यता का सबूत है. उन्होंने इसे कपड़ो में ‘जेनोफोबिया’ बताते हुए कहा था कि नकली नाम और हिजाब के साथ विदेशी कपड़े पहनना हमारे समाज के लिए एक गंभीर मुद्दा है.

2017 में सरकार ने महिलाओं से ताजिक पोशाक पहनने का अनुरोध करते हुए एक अभियान शुरू किया था. इसके लिए सरकार की ओर से ऑटोमेटेड कॉल का इस्तेमाल किया गया. जिसमें महिलाओं को रिकॉर्डेड कॉल जाते थे. एक साल बाद सरकार ने महिलाओं के लिए उपयुक्त कपड़ों पर 376 पेज की एक बुकलेट जारी की. जिसका शीर्षक था, 'ताजिकिस्तान में अनुशंसित पोशाकों की मार्गदर्शिका'. यानी सरकार द्वारा सुझाए गए कपड़ों की गाइडबुक.

इस गाइडबुक में सरकार द्वारा स्वीकृत कपड़े, उनकी लंबाई, रंग और साइज की लिस्ट है. इसमें हिजाब की जगह पारंपरिक रंगीन दुपट्टा बांधने की अनुमति है. जो चेहरे और गर्दन को ढंके बिना सिर के पीछे बांधा जाता है. यह गाइड अंतिम संस्कार में काले कपड़ों की जगह सफेद दुपट्टे के साथ नीले रंग के कपड़े पहनने की सलाह देती है.

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