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गोरखपुर ऑक्सीजन कांड: सस्पेंड हुए डॉक्टर कफील खान अब सोशल मीडिया पर क्या मदद मांग रहे हैं?

18 महीने से आधी सैलरी मिल रही है.

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16 मार्च 2019 (अपडेटेड: 16 मार्च 2019, 11:13 AM IST)
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अगस्त 2017 में गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से 36 बच्चों की मौत हुई. ये सभी मौतें दो दिनों के भीतर हुईं. इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर तीन जांच कमेटियों का गठन किया गया, लेकिन सभी जांच कमेटियों ने अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी होने की बात से इंकार कर दिया.
इस इंकार के बाद मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से जुड़े कई लोगों को अनियमितता और बच्चों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार बताकर जेल में डाल दिया गया. इसमें मेडिकल कॉलेज को ऑक्सीजन की सप्लाई करने वाली फर्म पुष्पा सेल्स भी शामिल है. लेकिन सबसे चर्चित नाम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर कफील अहमद खान का है. दस्तावेजों के मुताबिक़ घटना के समय कफील अहमद खान मेडिकल कॉलेज के बाल चिकित्सा विभाग में जूनियर डॉक्टर-असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत थे.
अभी कफील अहमद खान बीते 18 महीनों से अपने पद से निलंबित हैं. बीते साल अप्रैल में उन्हें जमानत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी उन्हें ऑक्सीजन कांड से जुड़े आरोपों से बरी किया था. कफील अहमद खान के खिलाफ पुलिस ने अपनी चार्जशीट में लिखा था कि घटना के समय कफील अहमद खान 100 बेड्स के इन्सेफेलाइटिस वार्ड के प्रमुख थे और उनकी लापरवाही की वजह से ही ऑक्सीजन की कमी हुई थी और अस्पताल में बच्चों की मौत हुई थी. हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने जमानत देते हुए आरोपों को खारिज किया था.
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मौजूदा वक्त में कफील कई सामाजिक-राजनीतिक मंचों पर दिखने लगे हैं.

मौजूदा समय में कफील अहमद खान अपनी बहाली के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन चला रहे हैं. ट्विटर पर #RevokeDrKafeel के टैग के साथ उनके समर्थक ट्वीट भी कर रहे हैं, और वाट्सऐप पर भी कफील और उनके भाई अदील अहमद खान और लोगों को लगातार जोड़ रहे हैं.
दी लल्लनटॉप से बातचीत में कफील कहते हैं –
“मुझे अपनी बेसिक तनख्वाह का आधा ही मिल रहा है. बीते 18 महीने से मेरी यही स्थिति है.”
कफील कहते हैं कि हाईकोर्ट में अपनी सुनवाई के दौरान उनके बहुत पैसे खर्च हो गए. और अब स्थायी नौकरी न होने की सूरत में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
अपने नाम के साथ इन दिनों “सस्पेंडेड लेक्चरर” लिखने वाले कफील आगे कहते हैं –
“मेरा कहना साफ़ है. अगर आप मेरा निलंबन ख़त्म करके मुझे वापिस नहीं रख सकते तो आप मुझे नौकरी से पूरी तरह बाहर कर दीजिये. कम से कम मैं कहीं और काम करके अपने परिवार का पेट भर सकता हूं.”
पिछले साल कफील अहमद खान ने पैसे जुटाने के लिए सोशल मीडिया पर पैसे जुटाने का एक कैम्पेन चलाया था. इसकी आलोचना का सामना भी उन्हें करना पड़ा था कि वे अपनी लोकप्रियता का इस्तेमाल पैसे मांगने के लिए कर रहे हैं. कफील इस पर जवाब देते हैं –
“मैं पैसा न माँगता तो क्या करता? मेरे पास घर है, जमीन है. लेकिन मेरे जेल जाने के बाद कोई भी मेरी संपत्ति खरीदने को राजी नहीं हुआ. इसी कारण से मुझे पैसे भी उधार नहीं दे रहे लोग. दिक्कत हो रही है. क्या करता?”
कैम्पेन की ज़रुरत क्यों पड़ी? इस सवाल पर कफील कहते हैं कि उन्होंने बहाली के संबंध में कुल 27 चिट्ठियां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह, स्टाम्प और पंजीकरण विभाग के मुख्य सचिव हिमांशु कुमार, मेडिकल एजुकेशन के डिप्टी जनरल केके गुप्ता और मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल गणेश कुमार को लिखीं. कोई फायदा नहीं हुआ.
कफील अहमद खान पर प्राइवेट प्रैक्टिस करने और वित्तीय अनियमितता के आरोप भी लगे थे. नवम्बर 2017 में ही अदालत ने इन आरोपों को हटा दिया था.
कफील खान (दाएं) और उनके बड़े भाई आदिल खान (बाएं)
कफील खान (दाएं) और उनके बड़े भाई आदिल खान (बाएं)

इसके अलावा कफील अहमद खान और उनके भाई अदील अहमद खान पर पैसों की धोखाधड़ी, जमीन के लेनदेन में घपले और धमकी देने के भी मामले दर्ज हैं. इसी मामले में कफील बीते कुछ दिनों पहले भी जेल जा चुके हैं. बीते साल जून में कफील के भाई काशिफ जमील पर दो अज्ञात हमलावरों गोली चला दी थी. बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मौजूद कफील अहमद खान के हितैषियों के मुताबिक कफील और उनके परिवार पर ये सारे मामले इसलिए दर्ज किए जा रहे हैं क्योंकि कफील बच्चों की मौत पर मुखर होकर बात कर रहे हैं.
36 बच्चों की मौत के बाद भी योगी आदित्यनाथ और भाजपा के सभी नेता जनता के बीच यही कहते रहे हैं कि ऑक्सीजन की कमी से मौतें नहीं हुईं, लेकिन अदालत में जांच कमेटियों के साथ-साथ पुलिस ने भी ऑक्सीजन की कमी होने की बात स्वीकारी है.
कफील के साथ-साथ कई अन्य डॉक्टर और अस्पताल के कर्मचारी भी निलंबित हुए थे. इनमें से अधिकतर कफील की मुहिम में समर्थन दे रहे हैं. कर्मचारियों के निलंबन का मामला हाईकोर्ट में लंबित है. कफील कहते हैं कि कुछ न होता देख वे हाईकोर्ट में इस मामले में रिव्यू पेटीशन डालेंगे, या सुप्रीम कोर्ट में पेटीशन डालकर इस मामले को सुलझाने का प्रयास करेंगे.
मौजूदा वक्त में कफील कई सामाजिक-राजनीतिक मंचों पर दिखने लगे हैं. जमात-ए-इस्लामी हिन्द के सहयोग से चल रहे यूनाइटेड अगेंस्ट हेट से जुड़े कफील कई मौकों पर अब बातचीत करते हुए और फिरकापरस्ती के खिलाफ भाषण देते देखे जा रहे हैं. कहीं-किसी समय पर फ्री हेल्थ कैम्प लगाकर दवाओं और दूसरी ज़रूरी चीज़ों का वितरण करते हैं. लेकिन नौकरी नहीं कर रहे हैं.
इस मामले पर शुरुआत से नज़र रखे हुए गोरखपुर के स्वतंत्र पत्रकार मनोज कुमार सिंह हमसे कहते हैं –
“कफील कई तरह के काम कर रहे हैं. लेकिन निलंबन की बहाली के लिए कैम्पेन की बात करके उन्होंने ज़रूरी मुद्दा उठाया है. अगर आपको अदालत ने दोषमुक्त कर दिया है तो स्वास्थ्य मंत्रालय किसलिए बहाली नहीं कर रहा? ये जवाब सामने तो आना चाहिए.”
इसके लिए हमने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल गणेश कुमार से बात की. गणेश कुमार ने हमें फ़ोन पर बताया -
"इस बारे में जो भी निर्णय होगा, वह स्वास्थ्य मंत्रालय लेगा. इसके बारे में मैं कुछ भी नहीं कह सकता हूं."
उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय यानी डीजीएमई में इस मामले को लेकर जब संपर्क करने की कोशिश की गयी तो कोई उत्तर नहीं मिल सका. इस मामले को लेकर हमने चिकित्सा शिक्षा विभाग में तैनात मुख्य सचिव रजनीश दूबे से बात करने की कोशिश की, लेकिन मुख्य सचिव ने हमारे फोन कॉल्स और मैसेजों का उत्तर नहीं दिया.


 
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