एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से बेटा हुआ, SC ने 'पिता' का DNA टेस्ट कराने के आदेश को खारिज किया
मामला 23 साल के एक लड़के से जुड़ा है जिसने अपने बॉयोलॉजिकल पिता से गुजारे भत्ते की मांग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उसकी दलील थी कि कोर्ट उसके पिता के DNA टेस्ट कराने का आदेश दे. कोर्ट ने उसकी मांग ठुकरा दी.

सुप्रीम कोर्ट ने बॉयोलॉजिकल पिता और प्राइवेसी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. मामला 23 साल के एक लड़के से जुड़ा है जिसने अपने बॉयोलॉजिकल पिता से गुजारे भत्ते की मांग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उसकी दलील थी कि कोर्ट उसके पिता का DNA टेस्ट कराने का आदेश दे. कोर्ट ने उसकी मांग ठुकरा दी. इस मामले से निजता के अधिकार को लेकर एक बहस छिड़ गई है.
पूरा मामला क्या है?यह मामला केरल का है जहां एक महिला की अप्रैल 1989 में शादी हुई थी. 1991 में उन्हें एक बेटी हुई और 2001 में महिला ने एक बेटे को जन्म दिया. महिला साल 2003 से अपने पति से अलग रहने लगी और उसने कोर्ट में तलाक की अर्जी डाल दी. इसके बाद साल 2006 में फैमिली कोर्ट ने दंपति की तलाक की अर्जी मंजूर कर दी.
तलाक की अर्जी मंजूर होने के बाद महिला ने कोचिन नगर निगम से बच्चे के पिता का नाम बदलवाने के लिए संपर्क किया. महिला की दलील थी कि वे एक्सट्रा मैरिटल रिलेशनशिप में थी और उसका बेटा इसी रिश्ते से जन्मा था.
लेकिन अधिकारियों ने कहा कि बिना कोर्ट के आदेश के यह बदलाव नहीं कर सकते. इसके बाद शुरू हुई कोर्ट में कानूनी लड़ाई. मां-बेटे केरल के एर्नाकुलम की जिला अदालत गए. उसने बेटे के कथित बॉयोलॉजिकल पिता को DNA टेस्ट से गुजरने का आदेश दे दिया.
लेकिन कथित पिता ने 2008 में हाई कोर्ट में निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी और कोर्ट ने DNA टेस्ट के आर्डर को नामंजूर कर दिया. कोर्ट ने कहा कि DNA टेस्ट के लिए तभी कहा जा सकता है जब यह साबित हो जाए कि बच्चे के जन्म के समय पति-पत्नी में कोई संपर्क नहीं था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहाहाई कोर्ट के फैसले से निराश बेटा सुप्रीम कोर्ट गया. वहां उसने दलील दी कि उसे कई बीमारियों से जूझना पड़ रहा है. उसके पास इलाज कराने के लिए पैसे नहीं बचे हैं. ऐसे में उसने बॉयोलॉजिकल पिता से गुज़ारे भत्ते की मांग की. बेटे ने कहा कि उसे अपने वैध पिता से कोई भी गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है.
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुईयां की बेंच ने 28 जनवरी को इस मामले में फैसला सुनाया. उन्होंने बेटे की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने बेटे के कथित बायोलॉजिकल पिता से DNA टेस्ट कराने की मांग को ठुकरा दिया. कोर्ट ने बेटे को उसकी मां के पूर्व पति की वैध संतान माना है.
अदालत ने कहा कि ये व्यक्ति की निजता के अधिकार का उल्लंघन है. इस तरह अदालत ने दो दशक से चल रहे मामले को बंद कर दिया.
निजता के अधिकार का उल्लंघनकोर्ट ने कहा कि DNA टेस्ट कराना व्यक्ति की प्राइवेसी का उल्लंघन है. NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,
“बेटे के अपने असली पिता के बारे में जानने के अधिकार और जिस व्यक्ति के DNA टेस्ट की मांग की जा रही है उसके निजता के अधिकार के बीच बैलेंस बनाने की जरूरत है.”
बेंच ने कहा कि किसी व्यक्ति का जबरन DNA टेस्ट करवाने से उसके निजी जीवन पर गहरा असर पड़ सकता है. यह व्यक्ति के मेंटल हेल्थ के अलावा उसके सामाजिक जीवन को भी प्रभावित कर सकता है.
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