भारत ने आसमान में बड़ी खोज की है, नाम है सरस्वती
आपको मालूम चला?
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लाल डॉट हमारी गैलेक्सी मिल्की वे है. (ग्राफिक)
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गंगा-जमुना-सरस्वती. कहते हैं कि तीन पवित्र नदियां थीं. संगम पर आकर मिलती थीं. वहीं जाकर नहाया जाए तो पुण्य मिलता है. लेकिन संगम पर जाओ तो गंगा और जमुना ही दिखती हैं. तो सरस्वती ढूंढने की लाख कोशिशें हुईं. पर वो नहीं मिली. अब एक सरस्वती मिल गई है. लेकिन वो धरती पर नहीं है, आसमान में है.
सूपरक्लस्टर बहुत-बहुत-बहुत होते हैं. इतने कि एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में रोशनी को भी करोड़ों साल लग जाते हैं. अपना सोलर सिस्टम जिस सुपरक्लस्टर में पड़ता है, उसे हवाई के वैज्ञानिकों ने खोजा था. उन्होंने उसे नाम दिया - लैनियाकेया (Laniakea.) हवाईयन भाषा में इसका मतलब होता है ऐसा स्वर्ग जिसे नापा नहीं जा सके.
इंसान अंतरिक्ष के बारे में जितना जानता है, उसमें गैलेक्सी के सूपरक्लस्टर सबसे बड़े स्ट्रक्चर होते हैं. 1980 से पहले हम इनके बारे में नहीं जानते थे. अब भी कम ही के बारे में पता है. इसलिए सरस्वती की खोज काफी मायने रखती है. सरस्वती को ढूंढने वाली टीम में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एडुकेशन एंड रिसर्च (IISER), इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिज़िक्स (IUCAA), न्यूमैन कॉलेज और एनआईटी जमशेदपुर से लोग थे. IUCAA के डायरेक्टर सौमक रायचौधरी ने 1989 में भी एक सुपरक्लस्टर खोजने में मदद की थी.
सरस्वती की जो तस्वीर आज हम देख रहे हैं, वो लाखों-करोड़ों साल पुरानी है. वो ऐसी कि आज जो रोशनी हम तक पहुंची थी, वो इतने ही साल पहले वहां से चली थी. तो एक तरह से हम अतीत को देख रहे हैं. है न मस्त ख्याल? हम हमेशा से अतीत को देखना चाहते हैं, उसे जीना चाहते हैं. आज हमें मालूम चला कि इसके लिए टाइम मशीन नहीं चाहिए. बस एक दमदार दूरबीन की दरकार है.
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हिंदुस्तानी वैज्ञानिकों ने एक बहुब्बड़े गैलेक्सी क्लस्टर का पता लगाया है. और उसका नाम रखा है सरस्वती.
इसी सवाल के जवाब में आप सुपरक्लस्टर पहुंचते हैं. स्पेस में ढेर सारी खाली जगह है. बीच-बीच में गैलेक्सी पड़ती हैं. और जैसे गृहों का एक सोलर सिस्टम होता है जिसमें वो एक तारे के चक्कर लगाते हैं, वैसे ही गैलेक्सी भी अपने आस-पास की गैलेक्सी के साथ एक सिस्टम का हिस्सा होती हैं. ग्रैविटी के चलते गैलेक्सी भी अपनी जगह से खिसकती रहती हैं. इसी के सिस्टम को सुपरक्लस्टर कहते हैं.अब आप पूछेंगे कि ये क्या होता है? तो इसके लिए आपको स्टेप बाई स्टेप जाना पड़ेगा. आप एक जगह पर खड़े हो जाइए. आसमान की ओर देखकर सोचिए कि ये जगह कहां है. तो जानेंगे कि आप पृथ्वी पर हैं. अब पृथ्वी कहां हैं? सोलर सिस्टम में. सूरज से तीसरी. और ये सोलर सिस्टम कहां हैं? एक गैलेक्सी में. नाम है मिल्की वे. अब ये मिल्की वे कहां है?
सूपरक्लस्टर बहुत-बहुत-बहुत होते हैं. इतने कि एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में रोशनी को भी करोड़ों साल लग जाते हैं. अपना सोलर सिस्टम जिस सुपरक्लस्टर में पड़ता है, उसे हवाई के वैज्ञानिकों ने खोजा था. उन्होंने उसे नाम दिया - लैनियाकेया (Laniakea.) हवाईयन भाषा में इसका मतलब होता है ऐसा स्वर्ग जिसे नापा नहीं जा सके.
इंसान अंतरिक्ष के बारे में जितना जानता है, उसमें गैलेक्सी के सूपरक्लस्टर सबसे बड़े स्ट्रक्चर होते हैं. 1980 से पहले हम इनके बारे में नहीं जानते थे. अब भी कम ही के बारे में पता है. इसलिए सरस्वती की खोज काफी मायने रखती है. सरस्वती को ढूंढने वाली टीम में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एडुकेशन एंड रिसर्च (IISER), इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिज़िक्स (IUCAA), न्यूमैन कॉलेज और एनआईटी जमशेदपुर से लोग थे. IUCAA के डायरेक्टर सौमक रायचौधरी ने 1989 में भी एक सुपरक्लस्टर खोजने में मदद की थी.
सरस्वती की जो तस्वीर आज हम देख रहे हैं, वो लाखों-करोड़ों साल पुरानी है. वो ऐसी कि आज जो रोशनी हम तक पहुंची थी, वो इतने ही साल पहले वहां से चली थी. तो एक तरह से हम अतीत को देख रहे हैं. है न मस्त ख्याल? हम हमेशा से अतीत को देखना चाहते हैं, उसे जीना चाहते हैं. आज हमें मालूम चला कि इसके लिए टाइम मशीन नहीं चाहिए. बस एक दमदार दूरबीन की दरकार है.
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