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मोदी-पुतिन के मिलने से बुरी तरह किलसा अमेरिका, राजदूत के बयान के बाद इस रिपोर्ट की चर्चा

NATO समिट के बीच पीएम मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात से बाइडन प्रशासन के कई अधिकारी खफा हैं. और इस नाराजगी को नई दिल्ली तक पहुंचाया भी गया है.

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12 जुलाई 2024 (अपडेटेड: 12 जुलाई 2024, 08:32 PM IST)
Modi Putin meeting
रूस के राष्ट्रपति कार्यालय में मोदी और पुतिन. (फोटो- X/Narendra Modi)
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जैसी उम्मीद थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूस दौर को लेकर अमेरिका नाराज हो गया है. रिपोर्ट आई है कि NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन) समिट के बीच पीएम मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात से बाइडन प्रशासन के कई अधिकारी खफा हैं. और इस नाराजगी को नई दिल्ली तक पहुंचाया भी गया है. इस हफ्ते 8 और 9 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के दौरे पर थे. उन्होंने भारत-रूस के बीच 22वें सालाना समिट में हिस्सा लिया था.

दो दिन के दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस को भारत का "सदाबहार और भरोसेमंद दोस्त" बताया था. और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत के बाद पीएम मोदी को रूस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ सेंट ऐंड्रयू द अपॉसल: द फर्स्ट कॉल्ड’ से सम्मानित किया गया था. पीएम मोदी ने इस बार अपने कार्यकाल के पहले द्विपक्षीय दौरे पर रूस को चुना था. इसके बाद वे ऑस्ट्रिया गए थे.

अब अमेरिका की नाराजगी को लेकर ब्लूमबर्ग ने एक रिपोर्ट छापी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन में रूस के हमले के बाद पीएम मोदी के पहले रूस दौरे को लेकर अमेरिकी अधिकारियों ने चिंता जताई है. अधिकारियों ने इस दौरे को बाइडन प्रशासन के लिए "मुश्किल और असहज" करने वाला बताया है. इसकी टाइमिंग ने अमेरिका के लिए उलझाने वाली है. रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने भारत को ये मैसेज भी भेजा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई की शुरुआत में अमेरिका के उप-विदेश मंत्री कर्ट कैंपवेल ने भारत के विदेश सचिव विनय मोहन क्वार्टा से बात की थी. ये बातचीत इस मकसद से की गई थी कि NATO समिट के बीच मोदी और पुतिन की मुलाकात रीशेड्यूल हो सकती है या नहीं.

अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने भी इस मसले पर रिपोर्ट की है. रिपोर्ट के अनुसार, कैंपवेल ने विनय क्वार्टा से कहा था कि अमेरिका दिल्ली और मॉस्को के पुराने संबंधों को समझता है. लेकिन वो रूस और चीन के नजदीकी संबंधों को रोकना चाहता है. अमेरिका की प्रमुख चिंता थी कि इस मीटिंग से NATO की तरफ से पुतिन को अलग-थलग करने की कोशिश और पेचीदा हो जाएगी. और इससे भारत-अमेरिका के रिश्तों को मजबूत करने की कोशिशों पर भी सवाल उठेंगे.

"हल्के में नहीं लेनी चाहिए दोस्ती"

इससे पहले 11 जुलाई को भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने भी पीएम मोदी के दौरे की आलोचना की थी. दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गार्सेटी ने कहा कि भारत को अमेरिका के साथ दोस्ती "हल्के में नहीं लेनी" चाहिए. यूक्रेन के खिलाफ रूस की जंग का नाम लिए बिना गार्सेटी ने कहा था कि देशों को न सिर्फ शांति के लिए खड़ा होना चाहिए बल्कि ठोस कदम भी उठाने चाहिए. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि भारत अपना भविष्य अमेरिका के साथ देखता है और अमेरिका अपना भविष्य भारत के साथ देखता है.

ये भी पढ़ें- पीएम मोदी का रुस दौरा किन मायनों में खास है?

अमेरिकी अधिकारियों की इस तरह की चिंताओं पर अब तक भारत की तरफ से कोई बयान नहीं आया है.

मॉस्को में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए भी पीएम मोदी ने भारत और रूस की पुरानी दोस्ती का जिक्र किया था. प्रधानमंत्री ने कहा था, 

"मैं दशकों से भारत और रूस के बीच जो अनोखा रिश्ता है, उसका कायल रहा हूं. रूस शब्द सुनते ही... हर भारतीय के मन में पहला शब्द आता है... भारत के सुख-दुख का साथी... भारत का भरोसेमंद दोस्त. हमारे Russian Friends इसे द्रुजबा कहते हैं, और हम हिंदी में इसे दोस्ती कहते हैं. रूस में सर्दी के मौसम में टेंपरेचर कितना ही माइनस में नीचे क्यों न चला जाए...भारत-रूस की दोस्ती हमेशा प्लस में रही है, गर्मजोशी भरी रही है."

भारत और रूस की इस दोस्ती के लिए उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन की भी तारीफ की थी. कहा था कि पुतिन ने दो दशक से भी ज्यादा समय तक इस पार्टनरशिप को मजबूत देने का शानदार काम किया है.

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