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8 लाख से कम कमाई वालों को ही गरीब क्यों मानती है सरकार, सुप्रीम कोर्ट में बताया है

मामला NEET के लिए EWS कोटे से जुड़ा है.

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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने बताया है कि उसने NEET में आर्थिक आरक्षण के लिए पैमाना किस आधार पर तय किया है.
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सिद्धांत मोहन
27 अक्तूबर 2021 (Updated: 27 अक्तूबर 2021, 08:57 AM IST)
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मेडिकल कॉलेज में भर्ती के लिए होने वाली परीक्षा NEET में आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है. मंगलवार 26 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाख़िल किया. कहा कि अगर कोई 8 लाख रुपए सालाना या उससे कम कमाता है, तो वो आर्थिक रूप से कमज़ोर श्रेणी यानी EWS में गिना जाएगा. केंद्र ने ये भी बताया कि 8 लाख रुपए की लिमिट सेट करने वाला फ़ैसला सिंहो कमीशन की रिपोर्ट पर आधारित है. क्या है पूरा मामला? मामला नीट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट से जुड़ा हुआ है. सबसे पहले साल 2019 की बात करते हैं. इस साल केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी. फिर केंद्र सरकार ने 29 जुलाई 2021 को नीट परीक्षा में आरक्षण को लेकर एक ज़रूरी फ़ैसला लिया. केंद्र सरकार ने कहा कि अंडरग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट मेडिकल कॉलेज में OBC समुदाय को 27 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमज़ोर यानी EWS वर्ग के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. अब इस फ़ैसले के सामने आने के बाद नीट की तैयारी कर रहे छात्र सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. याचिका लगा दी. कहा कि केंद्र सरकार द्वारा आरक्षण देने का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के खिलाफ़ है, जिसमें कहा गया है कि किसी स्थिति में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं होनी चाहिए. ये भी कहा गया कि सरकार ओबीसी वाला क्राइटेरिया EWS पर लागू कैसे कर सकती है? याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हो गयी. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा सवाल 21 अक्टूबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने केंद्र सरकार से कुछ सवाल पूछे. पूछा कि क्या EWS कोटा निर्धारित करने के पहले कुछ मानदंड निर्धारित किए गए? क्या शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के बीच के अंतर को इस EWS कोटा के निर्धारण में ध्यान में रखा गया? अब केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाख़िल किया है. सरकार ने EWS के लिए भी 8 लाख का क्राइटेरिया तय करने को सही ठहराया. कहा कि सिंहो कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर ये निर्णय लिया गया है. 8 लाख की सीमा बांधना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अनुरूप है. ओबीसी की क्रीमी लेयर लिमिट तय करने के लिए जो पैरामीटर तय किए गए थे, वो EWS पर भी उसी तरह लागू होते हैं. इसका मूल यही है कि अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत है तो उसे दूसरों की कीमत पर आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. केंद्र ने ये भी कहा कि केवल ज़रूरतमंद लोगों को ही इस स्कीम का लाभ मिले, इसलिए कुछ अपवाद भी जोड़े गए हैं. क्या हैं अपवाद? BBC में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, किसी परिवार को EWS कोटे का लाभ नहीं मिलेगा, अगर उसके पास - # 5 एकड़ या उससे ज़्यादा कृषि ज़मीन हो # 1000 वर्गफ़ीट या उससे बड़ा फ़्लैट हो # 100 गज या उससे बड़ा प्लॉट अधिसूचित नगरपालिका में हो # 200 गज या उससे बड़ा प्लॉट ग़ैर अधिसूचित नगरपालिका में हो सिंहो कमीशन क्या है? साल 2006. UPA की सरकार थी. सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों पर रिसर्च के लिए एक कमीशन का गठन किया था. इस कमीशन के अध्यक्ष रिटायर्ड मेजर जनरल एसआर सिंहो थे. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी 2010 में. सरकार का कहना है कि सिंहो कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार ही उसने नीट में आरक्षण की पात्रता और आधार तय किया है. अब इंडियन एक्सप्रेस की एक ख़बर का रूख करते हैं. 12 जनवरी 2019 को प्रकाशित इस ख़बर में कहा गया था कि सिंहो कमीशन ने कभी EWS लोगों को आरक्षण देने की बात ही नहीं की थी. अलबत्ता सिंहो कमीशन ने कहा था कि सरकार की सभी कल्याणकारी स्कीमों का लाभ EWS वर्ग के लोगों को भी मिलना चाहिए. इस रिपोर्ट में एक चैप्टर है, जिसमें EWS को आरक्षण का लाभ देने के इतिहास की समीक्षा की गयी है. उस चैप्टर में कमीशन का कहना है,
“कमीशन की संवैधानिक और कानूनी समझ ये है कि ‘पिछड़ी जातियों’ की पहचान आर्थिक आधार पर रोजगार और शिक्षा में आरक्षण देने के लिए नहीं की जा सकती. ‘आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों’ की पहचान राज्‍य केवल जनकल्‍याण उपायों का लाभ देने के लिए कर सकता है.”
यानी कमीशन ने कहा था कि आरक्षण देने के लिए नहीं, बल्कि वेलफ़ेयर स्कीमों का लाभ पहुंचाने के लिए आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों को चिन्हित किया जा सकता है. इसके अलावा कमीशन ने ये भी कहा कि आरक्षण देने के लिए दो बातों का ध्यान रखना चाहिए. 1 - आर्थिक पिछड़ेपन को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से जोड़कर देखा जाए 2 - जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई आदेश नहीं जारी करता या संविधान संशोधन नहीं होता तो राज्य की 50 प्रतिशत आरक्षण की लिमिट को क्रॉस नहीं कर सकता अब केंद्र ने अपना फ़ैसला दुहरा दिया है. आधार भी गिना दिया है. ये भी कहा है कि जब तक आरक्षण का ये मुद्दा तय नहीं हो जाता, तब तक NEET-PG नहीं होगी. देखना होगा कि केंद्र सरकार की इन दलील पर सुप्रीम कोर्ट आगे रुख अपनाता है. मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को है.

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