ईद के दिन 'चांद' न दिखने पर मनीष सिसोदिया का ये ट्वीट पढ़ने लायक है
इसे कहते हैं क्लास.
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अरविंद केजरीवाल हर जतन कर रहे हैं. लेकिन ईद नहीं मना पा रहे हैं. क्योंकि 'चांद' नहीं दिखा. मनीष इस दुख में उनके साथी हैं. (सच: ये फोटो हमने इसलिए लगाई क्योंकि हमें मनीष की स्कल कैप वाली फोटो मिली नहीं)
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तन्हाई में फरियाद तो कर सकता हूं वीराने को आबाद तो कर सकता हूं
जब चाहूं तुम्हें तो मिल नहीं सकता लेकिन जब चाहूं तुम्हें याद तो कर सकता हूं
मनीष सिसोदिया. दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री. साथ ही में पर्यटन, शिक्षा, वित्त, योजना (प्लानिंग), भूमि एवं निर्माण, सतर्कता, सेवाएं (सर्विसेज़), महिला एवं बाल विकास, कला, संस्कृति और भाषा मंत्री. इसके अलावा मनीष के पास उन सभी विभागों की ज़िम्मेदारी भी है जो किसी मंत्री को अलॉट नहीं हुए हैं. माने मनीष व्यस्त आदमी हैं. रोज़ उनके पास पचास (लिटरली) काम होते हैं. लेकिन 11 जून, 2018 के शाम साढ़े पांच बजे से वो सारे काम छोड़कर दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर माने उपराज्यबाल अनिल बैजल के दफ्तर के वेटिंग रूम में बैठे हुए हैं. साथ में अरविंद केजरीवाल, गोपाल राय और सत्येंद्र जैन भी हैं. 16 जून. ईद का मुबारक दिन. जिस-जिस को चांद दिखा, वो खुशियां मना रहा है. लेकिन मनीष और उनके साथियों को 'चांद' नहीं दिखा है. लेकिन उनके 'चांद' ने ट्वीट ज़रूर किया.
तो चाहकर मिल नहीं सकने वाले मनीष ने याद तो कर सकता हूं के अंदाज़ में एलजी साहब के ट्वीट का रिप्लाई कर दिया. एकदम क्लास के साथ.
मनीष और उनके साथी एलजी से तीन मांगें मनवाना चाहते हैं:
– एलजी खुद IAS अधिकारियों की ‘गैरकानूनी’ हड़ताल तुरंत खत्म कराएं, क्योंकि वो सर्विस विभाग के मुखिया हैं – राशन की डोर-स्टेप-डिलीवरी की योजना को मंजूर किया जाए – मोहल्ला क्लीनिक, सरकारी स्कूलों में पुताई व अन्य रुके हुए काम जल्दी शुरू करवाए जाएंखबर लिखे जाने तक एलजी साहब ने मनीष के ट्वीट का जवाब नहीं दिया था. 15 तारीख को जब राजभवन में एक के बाद एक चार एंबुलेंस पहुंची तो 'आप' नेताओं को लगा कि उन्हें जबरन एलजी के यहां से ले जाने की तैयारी की जा रही है (क्योंकि एक एंबुलेंस तो हर वक्त एलजी के यहां तैनात रहती ही है). मनीष ने धमकी दे दी कि अगर उन्हें हटाने की कोशिश हुई तो वो भूख हड़ताल के साथ-साथ पानी भी त्याग देंगे. एंबुलेंस वापस चली गईं. भाजपा अपना नैरेटिव बिल्ड करने में लगी हुई है. भाजपा कार्यकर्ता ने एक दिन केजरीवाल के दफ्तर पर धरना दिया था. भारत में राज्यपालों (और उप-राज्यपालों के भी) 'विवेक' की खूब बात होती है. जब-जब केंद्र का सत्ताधारी दल किसी राज्य में दखल देने की कोशिश करते हैं, ये 'विवेक' तुरंत हरकत में आ जाता है. बैजल का विवेक इस तरह का नहीं है, ऐसा मानने की कोई वजह उन्होंने अभी तक नहीं दी है. लेकिन उन्हें सोचना चाहिए. क्योंकि आस लगाए महबूब की बददुआ से बुरा कुछ नहीं होता. जिस शेर से हमने खबर शुरू की थी, वो कुछ यूं खत्म होता है -
कोई हंसे तो तुझे गम लगे, हंसी न लगे कि दिल्लगी भी तेरे दिल को दिल्लगी न लगे
तू रोज़ रोया करे उठके चांद रातों को खुदा करे तेरा मेरे बगैर दिल न लगे
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