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मणिपुर के सबसे बड़े उग्रवादी गुट UNLF का केंद्र सरकार से शांति समझौता, अमित शाह ने क्या बताया?

UNLF मणिपुर के घाटी वाले इलाके - यानी जिस इलाके में इंफाल मौजूद है - उसका सबसे बड़ा और सबसे पुराना उग्रवादी गुट है. स्थापित हुआ था साल 1964 में. एजेंडा भी साफ था- अलग समाजवादी मणिपुर की स्थापना करना.

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29 नवंबर 2023 (अपडेटेड: 29 नवंबर 2023, 09:00 PM IST)
manipur separatist unlf reaches on agreement with central government
उग्रवादी गुट United National Liberation Front के साथ एक शांति समझौता स्थापित कर लिया है. (फोटो-एक्स)
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हिंसाग्रस्त मणिपुर से एक जरूरी खबर. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 29 नवंबर को ट्वीट करके दावा किया है कि मोदी सरकार ने मणिपुर में सक्रिय उग्रवादी गुट United National Liberation Front यानी UNLF के साथ एक शांति समझौता स्थापित कर लिया है. अमित शाह ने लिखा,

"UNLF ने आज दिल्ली में एक शांति समझौते पर दस्तखत किए हैं. उन्होंने हिंसा छोड़ने और मुख्यधारा में जुड़ने की राह चुनी है. इस शांति और विकास की राह पर हम उनका स्वागत करते हैं."

अमित शाह ने इस समझौते को मील का पत्थर बताया. उन्होंने लिखा कि ये पीएम मोदी के पूर्वोत्तर भारत के युवाओं को बेहतर भविष्य देने और समावेशी विकास करने के सपने के लिहाज से बड़ी उपलब्धि है.

क्या है ये UNLF?

UNLF मणिपुर के घाटी वाले इलाके - यानी जिस इलाके में इंफाल मौजूद है - उसका सबसे बड़ा और सबसे पुराना उग्रवादी गुट है. स्थापित हुआ था साल 1964 में. एजेंडा भी साफ - अलग समाजवादी मणिपुर की स्थापना करना.

साउथ एशिया टेररिज़म पोर्टल के मुताबिक, साल 1975 में UNLF के नेता एन बिशेश्वर सिंह और 16 अन्य मैतेई उग्रवादियों ने तिब्बत में मौजूद ल्हासा की यात्रा की थी, ताकि उन्हें चीन की मदद मिल सके. मई 1990 में UNLF ने दूसरे उग्रवादी ग्रुप्स, जैसे National Socialist Council of Nagaland – Khaplang (NSCN-K), United Liberation Front of Asom (ULFA), और Kuki National Army (KNA) के साथ मिलकर एक Indo-Burma Revolutionary Front (IBRF) का निर्माण किया था. इसका मकसद था ‘भारत-बर्मा की आजादी के लिए एक संगठित संघर्ष करना.’

आपके मन में सवाल उठेगा कि भारत-बर्मा की आजादी कैसी डिमांड है? 

दरअसल म्यांमार द्वारा समर्थित हरेक किस्म के उग्रवादी गुट कमोबेश ये डिमांड उठाते रहते हैं कि भारत और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग क्षेत्रफल को खाली कराया जाए. अमूमन इस तरह की डिमांड के पीछे म्यांमार-लाओस-थाईलैंड के वो ड्रग माफिया होते हैं, जो भारत में अपनी बनाई ड्रग्स बेचने के लिए एक सेफ पैसेज चाहते हैं. इन तीन देशों के ड्रग माफिया मिलकर एक त्रिकोण बनाते हैं, जिसे ‘गोल्डन ट्राइऐंगल’ कहते हैं. ये पूरी दुनिया में नशे के सामान पैदा करने का सबसे बड़ा अड्डा है. और इसी वजह से इस इलाके में बड़ी मात्रा में होती है अफीम की खेती. गोल्डन ट्राइऐंगल के ड्रग माफिया इस पैसेज से पूरे भारत में ड्रग्स घुसाना और बेचना चाहते हैं.

तो अगर UNLF के बनाए समूह IBRF को सफलता मिल गई होती, तो भारत के मणिपुर और मिजोरम के एक बड़े हिस्से पर इन उग्रवादियों और आखिर में ड्रग माफियाओं का कब्जा होता.

इसके अलावा UNLF के म्यांमार और बांग्लादेश से कनेक्शन में एक और बात सामने आती है कि इस गुट के ट्रेनिंग कैंप भी इन दोनों देशों में मौजूद रहे हैं. साल 2012 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने UNLF के खिलाफ भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का केस दर्ज किया था. और अब है साल 2023 की ये बढ़त. एक उग्रवादी ग्रुप अब देश की मुख्यधारा में शामिल होगा.

क्या UNLF का हथियार त्यागना एक बड़ा कदम है?

इसको एक बड़े कदम की तरह देखा जाना चाहिए. पहला कारण है कि ये उग्रवादी ग्रुप घाटी में बेस्ड है. इसमें मैतेई लोग सबसे अधिक मात्रा में शामिल हैं. और दूसरा कारण ये कि इतिहास में ये पहला मौका है कि घाटी में मौजूद मैतेई समूह शांति समझौते में शामिल हुआ है. वरना इसके पहले मैतेई उग्रवादी समूह शांति समझौते में शामिल होने की बात तो दूर, शांति वार्ता में शामिल तक नहीं होते थे.

इसके पहले कुकी उग्रवादी ग्रुप भारत सरकार और मणिपुर सरकार के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन (SoO) में शामिल थे. इस SoO के तहत ये उग्रवादी ग्रुप किसी भी सुरक्षा बल पर हमला नहीं कर सकते हैं. साथ ही इस समझौते के तहत ये उग्रवादी अपने स्थापित कैंपों में बने रहेंगे. साल 2023 की शुरुआत में मणिपुर की बीरेन सिंह सरकार ने SoO से अपने हाथ खींच लिए. और इसके कुछ ही हफ्तों बाद मई 2023 के महीने में शुरू हुई हिंसा, जो आज भी बदस्तूर जारी है.

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