माओवादियों ने डराया तो गांववालों ने पत्थर और तीर चलाकर माओवादी को ही मार डाला
और बदले में जलाए गए गांववालों के घर
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माओवादियों को पीटने के बाद गांववालों ने बंधक बनाए रखा. बाद में एक लाख के इनामी गंगा मढ़ी (बाएं) को डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.
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ओडिशा का मलकानगिरी जिला. यहां के स्वाभिमान अंचल एरिया का जंतुरई गांव. गणतंत्र दिवस के पहले की रात. शनिवार 25 जनवरी. गांव में माओवादी आये. गांववालों से लड़ाई हुई तो गांववालों ने एक माओवादी गंगा मढ़ी को पीट-पीटकर मार डाला.
सूत्र बताते हैं कि जन्तुरई गांव में दो हथियारबंद माओवादी बाइक पर सवार होकर आये. उन्होंने गांववालों से कहा कि कल गणतंत्र दिवस नहीं मनाना है. कहा कि काला दिवस मनाओ. गांव में सड़क निर्माण का कार्य भी हो रहा था. माओवादियों ने इस काम में बाधा पहुंचाने की कोशिश की. डराने के लिए हवाई फायरिंग भी की.
गांववालों ने मानने से इंकार कर दिया. गांववालों ने माओवादियों पर पत्थर और तीर चलाना शुरू कर दिया. 1 लाख के इनामी माओवादी गंगा मढ़ी की मौके पर ही मौत हो गयी. वहीं दूसरा 4 लाख का इनामी माओवादी जिप्रा हत्रिका घायल हो गया. गांववालों ने उसे पकड़कर सुरक्षाबलों को सौंप दिया. दोनों ही प्रतिबंधित गुमा एरिया कमिटी के सदस्य बताये जा रहे हैं.
मलकानगिरी में माओवादी और ग्रामीणों में लड़ाई हुई. गांववालों ने लाख रूपए के इनामी माओवादी को मार गिराया. बदले में माओवादियों ने जडोम्बा गांव के दर्जनभर घरों में आग लगा दी.
माओवादियों ने बाद में इस कार्रवाई का बदला भी लिया. 26 जनवरी की शाम उन्होंने पास के ही जडोम्बा गांव के लगभग एक दर्जन घरों में आग लगा दी. अब जन्तुरई और जडोम्बा गांव के लोगों ने डरकर गांव छोड़ दिया है, और पास के ही BSF कैम्प में शरण ली है.
मलकानगिरी के एसपी आरडी खिलारी ने मीडिया से बातचीत में बताया,
माओवादियों के बदले की कार्रवाई के बाद गांववालों ने पास के बीएसएफ कैंप में शरण ली है.
बकौल एसपी, गांववालों को लगता है कि माओवादियों की वजह से उन्हें विकास कार्यक्रमों का लाभ नहीं मिल पा रहा है. गांववालों की सुरक्षा के सवाल पर कहा कि भरसक प्रयास कर रहे हैं कि लोगों को सुरक्षित रख सकें, और विकास कार्य भी जारी रह सकें.
स्वाभिमान अंचल क्षेत्र में 9 ग्राम पंचायतें हैं, और इन ग्राम पंचायतों में 151 गांव आते हैं. लगभग दो दशक से यहां माओवादियों का राज रहा है. आंध्र प्रदेश-ओडिशा बॉर्डर की स्पेशल जोनल कमिटी के माओवादी सदस्य इन इलाकों में ऑपरेट करते रहते हैं. कहते हैं कि एक तरफ बालीमेला झील और दूसरी तरफ पहाड़ियों के होने से ये इलाका लम्बे समय तक सरकार की पहुंच से दूर था. हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर की मानें तो जुलाई 2019 में एक पुल के निर्माण के बाद यहां के लगभग 37 हज़ार लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचा था.
और अब है ये एपिसोड, जहां गांववाले खुद ही माओवादियों से मोर्चा ले रहे हैं. हालांकि पुलिस का ये भी कहना है कि ग्रामीणों को क़ानून यूं हाथ में लेने से बचना चाहिए.
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सूत्र बताते हैं कि जन्तुरई गांव में दो हथियारबंद माओवादी बाइक पर सवार होकर आये. उन्होंने गांववालों से कहा कि कल गणतंत्र दिवस नहीं मनाना है. कहा कि काला दिवस मनाओ. गांव में सड़क निर्माण का कार्य भी हो रहा था. माओवादियों ने इस काम में बाधा पहुंचाने की कोशिश की. डराने के लिए हवाई फायरिंग भी की.
गांववालों ने मानने से इंकार कर दिया. गांववालों ने माओवादियों पर पत्थर और तीर चलाना शुरू कर दिया. 1 लाख के इनामी माओवादी गंगा मढ़ी की मौके पर ही मौत हो गयी. वहीं दूसरा 4 लाख का इनामी माओवादी जिप्रा हत्रिका घायल हो गया. गांववालों ने उसे पकड़कर सुरक्षाबलों को सौंप दिया. दोनों ही प्रतिबंधित गुमा एरिया कमिटी के सदस्य बताये जा रहे हैं.
मलकानगिरी में माओवादी और ग्रामीणों में लड़ाई हुई. गांववालों ने लाख रूपए के इनामी माओवादी को मार गिराया. बदले में माओवादियों ने जडोम्बा गांव के दर्जनभर घरों में आग लगा दी.माओवादियों ने बाद में इस कार्रवाई का बदला भी लिया. 26 जनवरी की शाम उन्होंने पास के ही जडोम्बा गांव के लगभग एक दर्जन घरों में आग लगा दी. अब जन्तुरई और जडोम्बा गांव के लोगों ने डरकर गांव छोड़ दिया है, और पास के ही BSF कैम्प में शरण ली है.
मलकानगिरी के एसपी आरडी खिलारी ने मीडिया से बातचीत में बताया,
“सूचना मिलने पर सुरक्षाकर्मी घटनास्थल पर पहुंचे. वहां हमने देखा कि दो माओवादी बेहोश पड़े हुए हैं. वे गंभीर रूप से घायल थे.”एसपी खिलारी ने बताया कि जडोम्बा, जन्तुरई, पेपरमेत्तला गांव के लोग अमूमन डर से माओवादियों का समर्थन करते थे. अब गांववाले मुख्यधारा से जुड़ने का मतलब समझने लगे हैं. और उन्होंने फैसला लिया है कि माओवादियों का विरोध किया जाए.
माओवादियों के बदले की कार्रवाई के बाद गांववालों ने पास के बीएसएफ कैंप में शरण ली है.बकौल एसपी, गांववालों को लगता है कि माओवादियों की वजह से उन्हें विकास कार्यक्रमों का लाभ नहीं मिल पा रहा है. गांववालों की सुरक्षा के सवाल पर कहा कि भरसक प्रयास कर रहे हैं कि लोगों को सुरक्षित रख सकें, और विकास कार्य भी जारी रह सकें.
स्वाभिमान अंचल क्षेत्र में 9 ग्राम पंचायतें हैं, और इन ग्राम पंचायतों में 151 गांव आते हैं. लगभग दो दशक से यहां माओवादियों का राज रहा है. आंध्र प्रदेश-ओडिशा बॉर्डर की स्पेशल जोनल कमिटी के माओवादी सदस्य इन इलाकों में ऑपरेट करते रहते हैं. कहते हैं कि एक तरफ बालीमेला झील और दूसरी तरफ पहाड़ियों के होने से ये इलाका लम्बे समय तक सरकार की पहुंच से दूर था. हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी खबर की मानें तो जुलाई 2019 में एक पुल के निर्माण के बाद यहां के लगभग 37 हज़ार लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचा था.
और अब है ये एपिसोड, जहां गांववाले खुद ही माओवादियों से मोर्चा ले रहे हैं. हालांकि पुलिस का ये भी कहना है कि ग्रामीणों को क़ानून यूं हाथ में लेने से बचना चाहिए.
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