क्या शिवराज के कहने पर कलेक्टरों ने परिणाम लेट किए?
सोशल मीडिया का दावा है. जानिए कि परिणामों में देरी किस तरह हो जाती है.
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ये कांग्रेस के नेता राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के आगे सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हैं. मध्य प्रदेश विधानसभा का नतीजा आने में काफी लंबा समय लगा. इसे लेकर सोशल मीडिया पर काफी हंसी भी उड़ाई गई चुनाव आयोग की.
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11 दिसंबर, 2018. सुबह के ठीक आठ बजे काउंटिंग शुरू हुई. दिन बदला, तारीख बदली. 12 दिसंबर आ गई. सुबह 8-सवा 8 बजे तक मध्य प्रदेश का इलेक्शन रिज़ल्ट साफ़ नहीं हुआ था.
सारी सीटें साफ़ हो गईं, तो भी एक सीट थी जहां वोटों की गिनती पूरी नहीं हुई थी. इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर लिखा था. कि कांग्रेस 113 सीटें जीत गई है और एक पर आगे चल रही है. ये जो एक सीट अटकी हुई थी, उसका नाम है मेहगांव. ये भिंड जिले में पड़ती है. वहां कांग्रेस के उम्मीदवार थे ओ पी एस भदौरिया. उनके सामने थे बीजेपी के राकेश शुक्ला. दोनों के बीच 24 हज़ार से ज़्यादा वोटों का अंतर दिखा रहा था. मगर काउंटिंग पूरी नहीं हुई थी. साढ़े आठ बजे के करीब जाकर चुनाव आयोग ने वेबसाइट अपडेट की. बताया कि भदौरिया जीत गए हैं. ठीक 25,814 वोटों से. भिंड की सबसे बड़ी विधानसभा सीट है मेहगांव. 290 के करीब पोलिंग बूथ थे यहां पर. वैसे चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट अपडेट करने से तकरीबन डेढ़ घंटे पहले, सुबह सात बजे के आसपास भदौरिया को जीत का सर्टिफिकेट दे दिया था.

ये मेहगांव सीट के रिज़ल्ट का पेज है. सुबह तकरीबन साढ़े आठ बजे रिज़ल्ट क्लियर हुआ है. उसके पहले तक काउंटिंग चालू है ही लिखा आ रहा था.
इस सीट पर काउंटिंग इतनी क्यों खिंची? ये जानने के लिए हमने ग्वालियर में 'आज तक' से जुड़े पत्रकार सर्वेश पुरोहित से बात की. उन्होंने बताया कि इस सीट पर 23 राउंड की गिनती हुई. एक गड़बड़ी ये हुई कि वोटिंग शुरू होने से पहले EVM मशीन पर जो मॉक पोल होता है, उसमें दर्ज वोट डिलीट नहीं हुए थे. मतदान से पहले राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों, उम्मीदवारों के सामने EVM मशीन की टेस्टिंग की जाती है. ताकि उन्हें ये भरोसा हो कि EVM ठीक काम कर रही है. इसमें झूठमूठ की वोटिंग होती है. इसी को मॉक पोल कहते हैं. फिर असली मतदान शुरू होने से पहले पोलिंग ऑफिसर उस मॉक पोल का डेटा डिलीट कर देता है. जब ऐसा नहीं होता, तो असली वोटिंग और EVM में दर्ज वोटों के बीच अंतर आ जाता है. जिन मशीनों में भी ये दिक्कत आई, उन्हें आखिरी राउंड में VVPAT की पर्चियों के साथ मैच किया गया.

इलेक्शन कमिशन की वेबसाइट पर ये फाइनल रिज़ल्ट 12 दिसंबर की सुबह आया.
फिर बाकी मध्य प्रदेश में क्यों धीमी हुई काउंटिंग? ये वाला कारण छोड़ दें, तब भी मध्य प्रदेश में काउंटिंग काफी धीमी थी इस बार. आधी रात तक चुनाव आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर बस 170 सीटों के रिज़ल्ट का ही ऐलान किया था. 60 सीटों का नतीज़ा आना बाकी था. इसकी एक बड़ी वज़ह ये थी इस बार चुनाव आयोग ने नतीजों के ऐलान में ज़्यादा सावधानी बरती. कोशिश थी कि विवाद और कन्फ्यूजन का स्कोप ही न रहे. और कोई ग़लती भी न हो, ताकि किरकिरी से बचा जा सके. इसी वजह से रिज़ल्ट ऐलान करने में भी अतिरिक्त सावधानी बरती गई.
क्या शिवराज के कहने पर कलेक्टरों ने परिणाम लेट किए?
सोशल मीडिया पर इस बात के खूब चर्चे हैं कि मध्यप्रदेश में चुनाव परिणाम इसलिए लेट आए क्योंकि प्रदेश की भाजपा सरकार (जो अब भूतपूर्व हो गई है), का दबाव ज़िला कलेक्टरों पर था. कि 'सेटिंग' कर लें. ये एक गंभीर आरोप है. लेकिन ऐसा होने की संभावना बेहद कम है. देरी की वजह ज़्यादातर जगह यही रही कि मध्य प्रदेश में कई सीटों पर बड़ा करीबी मुकाबला था. जैसे ग्वालियर दक्षिण सीट कांग्रेस के प्रवीण पाठक ने मात्र 121 वोटों से बीजेपी के नारायण सिंह कुशवाह को हराया. जबलपुर नॉर्थ में कांग्रेस के विनय सक्सेना 578 वोट से जीते. जाओरा में बीजेपी के राजेंद्र पाण्डेय बस 511 वोटों से जीते. बीना में बीजेपी के महेश राय 632 वोट से जीते.
इसी तरह दामोह में कांग्रेस के राहुल सिंह ने बस 798 वोट से बीजेपी के जयंत मलैया को हराया. ऐसा ही कोलारस में हुआ जहां 720 वोटों ने बीजेपी के बीरेंद्र रघुवंशी को जिताया. ऐसा होने पर जीतने और हारने वाले दोनों प्रत्याशी ढेर सारी आपत्तियां लेते हैं. प्रशासन भी कम मार्जिन के कारण और भी ज़्यादा सावधानी बरतता है.
और ऐसा भी नहीं है कि रात 12 तक सिर्फ मध्यप्रदेश के नतीजे रुके थे. छत्तीसगढ़ की पाटन सीट के नतीजे भी चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर देर रात तक नहीं थे. 'काउंटिंग इन प्रोग्रेस' लिखा आ रहा था. जबकि पाटन में कांग्रेस के भूपेश बघेल बहुत आगे चल रहे थे. और ये साफ भी हो गया था कि छत्तीसगढ़ में सरकार कांग्रेस की ही बननी है. तो इसी तरह के कई कारण होते हैं जिनसे नतीजे लेट हो जाया करते हैं.
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सारी सीटें साफ़ हो गईं, तो भी एक सीट थी जहां वोटों की गिनती पूरी नहीं हुई थी. इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर लिखा था. कि कांग्रेस 113 सीटें जीत गई है और एक पर आगे चल रही है. ये जो एक सीट अटकी हुई थी, उसका नाम है मेहगांव. ये भिंड जिले में पड़ती है. वहां कांग्रेस के उम्मीदवार थे ओ पी एस भदौरिया. उनके सामने थे बीजेपी के राकेश शुक्ला. दोनों के बीच 24 हज़ार से ज़्यादा वोटों का अंतर दिखा रहा था. मगर काउंटिंग पूरी नहीं हुई थी. साढ़े आठ बजे के करीब जाकर चुनाव आयोग ने वेबसाइट अपडेट की. बताया कि भदौरिया जीत गए हैं. ठीक 25,814 वोटों से. भिंड की सबसे बड़ी विधानसभा सीट है मेहगांव. 290 के करीब पोलिंग बूथ थे यहां पर. वैसे चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट अपडेट करने से तकरीबन डेढ़ घंटे पहले, सुबह सात बजे के आसपास भदौरिया को जीत का सर्टिफिकेट दे दिया था.

ये मेहगांव सीट के रिज़ल्ट का पेज है. सुबह तकरीबन साढ़े आठ बजे रिज़ल्ट क्लियर हुआ है. उसके पहले तक काउंटिंग चालू है ही लिखा आ रहा था.
इस सीट पर काउंटिंग इतनी क्यों खिंची? ये जानने के लिए हमने ग्वालियर में 'आज तक' से जुड़े पत्रकार सर्वेश पुरोहित से बात की. उन्होंने बताया कि इस सीट पर 23 राउंड की गिनती हुई. एक गड़बड़ी ये हुई कि वोटिंग शुरू होने से पहले EVM मशीन पर जो मॉक पोल होता है, उसमें दर्ज वोट डिलीट नहीं हुए थे. मतदान से पहले राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों, उम्मीदवारों के सामने EVM मशीन की टेस्टिंग की जाती है. ताकि उन्हें ये भरोसा हो कि EVM ठीक काम कर रही है. इसमें झूठमूठ की वोटिंग होती है. इसी को मॉक पोल कहते हैं. फिर असली मतदान शुरू होने से पहले पोलिंग ऑफिसर उस मॉक पोल का डेटा डिलीट कर देता है. जब ऐसा नहीं होता, तो असली वोटिंग और EVM में दर्ज वोटों के बीच अंतर आ जाता है. जिन मशीनों में भी ये दिक्कत आई, उन्हें आखिरी राउंड में VVPAT की पर्चियों के साथ मैच किया गया.

इलेक्शन कमिशन की वेबसाइट पर ये फाइनल रिज़ल्ट 12 दिसंबर की सुबह आया.
फिर बाकी मध्य प्रदेश में क्यों धीमी हुई काउंटिंग? ये वाला कारण छोड़ दें, तब भी मध्य प्रदेश में काउंटिंग काफी धीमी थी इस बार. आधी रात तक चुनाव आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर बस 170 सीटों के रिज़ल्ट का ही ऐलान किया था. 60 सीटों का नतीज़ा आना बाकी था. इसकी एक बड़ी वज़ह ये थी इस बार चुनाव आयोग ने नतीजों के ऐलान में ज़्यादा सावधानी बरती. कोशिश थी कि विवाद और कन्फ्यूजन का स्कोप ही न रहे. और कोई ग़लती भी न हो, ताकि किरकिरी से बचा जा सके. इसी वजह से रिज़ल्ट ऐलान करने में भी अतिरिक्त सावधानी बरती गई.
VVPAT ने भी टाइम बढ़ाया चुनाव आयोग ने नियम बनाया था कि हर विधानसभा सीट की कम से कम एक पोलिंग स्टेशन (जिसे रेंडम चुना जाएगा) पर VVPAT पर्चियों और EVM के वोटों का मिलान किया जाए. इस कारण भी थोड़ा लंबा समय खिंचा. VVPAT का सिस्टम ये होता है कि मान लीजिए वोटर से समाजवादी पार्टी को वोट दिया है. वो वोट देने के लिए EVM का बटन दबाएगा. वोट देने के साथ VVPAT मशीन से एक पर्ची निकलेगी. इसपर उस पार्टी का चुनाव चिह्न बना होगा, जिसे वोट दिया गया है. ये पर्ची एक बक्से में जाएगी. अब अगर मान लीजिए किसी को ये लगता है कि EVM खराब है या उससे कोई छेड़छाड़ हुई है, तो EVM में दर्ज़ वोट और VVPAT से निकली उस वोट की पर्ची को मैच करके चीजें साफ हो जाएंगी.We accept the people’s mandate with humility.
I thank the people of Chhattisgarh, Madhya Pradesh and Rajasthan for giving us the opportunity to serve these states. The BJP Governments in these states worked tirelessly for the welfare of the people.
— Narendra Modi (@narendramodi) December 11, 2018
हर राउंड की गिनती के बाद कैंडिडेट्स को सर्टिफिकेट दिया गया कुछ दिनों पहले कमनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्य चुनाव आयुक्त से मिला था. इन्होंने मांग की थी कि हर राउंड के बाद उस राउंड की गिनती का सर्टिफिकेट दिया जाए. चुनाव आयोग ने ये किया भी. हर राउंड की गिनती ख़त्म होने के बाद उस राउंड के नतीजों का ऐलान किया गया. फिर हाथ के हाथ सारे उम्मीदवारों से पूछा गया कि उनको कोई संदेह तो नहीं, कोई दिक्कत तो नहीं. सबकी सहमति लेकर फिर हर उम्मीदवार को उस राउंड की गिनती का सर्टिफिकेट दिया गया. इस प्रक्रिया में ज़्यादा समय तो लगा, मगर ये बात भी हुई कि दोबारा गिनती करवाने या बाद में जाकर किसी उम्मीदवार के नतीजों पर शुबहा जताने की नौबत नहीं आएगी. अब अगर किसी जगह से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े हुए हैं, तो ज़्यादा समय लगेगा वहां. मेहगांव में कुल 34 प्रत्याशी थे मुकाबले में. इसके अलावा एक नोटा का बटन. यानी कुल मिलाकर 35 विकल्प हुए.Madhya Pradesh: Congress delegation met Governor Anandiben Patel to stake claim to form the government, earlier today. #AssemblyResults2018
— ANI (@ANI) December 12, 2018
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एक राउंड की गिनती का मतलब क्या? एक राउंड की गिनती का मतलब होता है 14 टेबलों की गिनती. 14 टेबल माने 14 EVM. 16 उम्मीदवारों तक एक पोलिंग बूथ के ऊपर एक ही EVM मशीन इस्तेमाल होती है. क्योंकि एक EVM मशीन में 16 बटन (16 ऑप्शन्स की जगह) होते हैं. एक पोलिंग बूथ में ज्यादा से ज्यादा चार EVM ही हो सकती हैं. इससे ऊपर, यानी 64 से ज़्यादा कैंडिडेट्स हुए, तो फिर ठप्पे से मतदान करवाया जाएगा. हर राउंड के बाद सर्टिफिकेट देने की इस प्रक्रिया ने भी ज़्यादा समय लिया.Madhya Pradesh counting concludes, final ECI results - Congress 114, BJP 109, SP-1, BSP-2 and Independents-4 #MadhyaPradeshElections2018
— ANI (@ANI) December 12, 2018
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...जब कांग्रेस की शिकायत पर राजस्व अधिकारी को SHO बनाया गया EVM को लेकर मध्य प्रदेश में विवाद हो चुका है. 9 अप्रैल, 2017 को मेहगांव के पड़ोसी अटेर में उपचुनाव हुए थे. यहीं पर पहली बार पूरी तरह से VVPAT मशीनों का इस्तेमाल किया गया. इसपर भी विवाद हुआ. विवाद की शुरुआत यूं हुई कि यहां एक EVM का ट्रायल हो रहा था. खबर आई कि VVPAT मशीनों से बस बीजेपी की पर्ची निकल रही है. फिर चाहे वोट किसी भी पार्टी को दिया गया हो. उस प्रकरण का भी असर था कि इलेक्शन कमिशन ने हर राउंड के बाद सर्टिफिकेट देने वाली व्यवस्था की. 'आज तक' के पत्रकार सर्वेश पुरोहित ने बताया कि अटेर बाय पोल्स के समय एक और भी चीज हुई थी. कांग्रेस ने कहा था कि उसे वहां के पुलिस अधिकारियों पर भरोसा नहीं है. उसे शक़ था कि पुलिस से जुड़े लोग वोटिंग में गड़बड़ी करवा सकते हैं. अटेर विधानसभा क्षेत्र में चार थाने थे. चुनाव आयोग ने क्या किया कि एक दिन के लिए राजस्व अधिकारी को थाना प्रभारी बना दिया. वैसे ही, जैसे नायक में अनिल कपूर एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन गए थे.Mayawati: Even though we don't agree with many of Congress's policies we have agreed to support them in Madhya Pradesh and if need be in Rajasthan #AssemblyElections2018
— ANI (@ANI) December 12, 2018
pic.twitter.com/1EDRUwyNuU
क्या शिवराज के कहने पर कलेक्टरों ने परिणाम लेट किए?
सोशल मीडिया पर इस बात के खूब चर्चे हैं कि मध्यप्रदेश में चुनाव परिणाम इसलिए लेट आए क्योंकि प्रदेश की भाजपा सरकार (जो अब भूतपूर्व हो गई है), का दबाव ज़िला कलेक्टरों पर था. कि 'सेटिंग' कर लें. ये एक गंभीर आरोप है. लेकिन ऐसा होने की संभावना बेहद कम है. देरी की वजह ज़्यादातर जगह यही रही कि मध्य प्रदेश में कई सीटों पर बड़ा करीबी मुकाबला था. जैसे ग्वालियर दक्षिण सीट कांग्रेस के प्रवीण पाठक ने मात्र 121 वोटों से बीजेपी के नारायण सिंह कुशवाह को हराया. जबलपुर नॉर्थ में कांग्रेस के विनय सक्सेना 578 वोट से जीते. जाओरा में बीजेपी के राजेंद्र पाण्डेय बस 511 वोटों से जीते. बीना में बीजेपी के महेश राय 632 वोट से जीते.
इसी तरह दामोह में कांग्रेस के राहुल सिंह ने बस 798 वोट से बीजेपी के जयंत मलैया को हराया. ऐसा ही कोलारस में हुआ जहां 720 वोटों ने बीजेपी के बीरेंद्र रघुवंशी को जिताया. ऐसा होने पर जीतने और हारने वाले दोनों प्रत्याशी ढेर सारी आपत्तियां लेते हैं. प्रशासन भी कम मार्जिन के कारण और भी ज़्यादा सावधानी बरतता है.
और ऐसा भी नहीं है कि रात 12 तक सिर्फ मध्यप्रदेश के नतीजे रुके थे. छत्तीसगढ़ की पाटन सीट के नतीजे भी चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर देर रात तक नहीं थे. 'काउंटिंग इन प्रोग्रेस' लिखा आ रहा था. जबकि पाटन में कांग्रेस के भूपेश बघेल बहुत आगे चल रहे थे. और ये साफ भी हो गया था कि छत्तीसगढ़ में सरकार कांग्रेस की ही बननी है. तो इसी तरह के कई कारण होते हैं जिनसे नतीजे लेट हो जाया करते हैं.
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