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न्याय की देवी की पुरानी मूर्ति तो हट गई, लेकिन आंखों पर पट्टी का ये मतलब नहीं जानते होंगे आप!

Lady Justice: न्याय की देवी की नई मूर्ति में आंखों पर पट्टी नहीं बंधी है. CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि कानून अंधा नहीं है, ये सबको बराबरी की नजर से देखता है. वहीं पुरानी मूर्ति की आंखों पर पट्टी बंधी थी. आखिर ये बदलाव क्या दर्शाता है?

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17 अक्तूबर 2024 (अपडेटेड: 17 अक्तूबर 2024, 02:43 PM IST)
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Lady Justice की पुरानी और नई मूर्तियां. (फोटो: कॉमन सोर्स)
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फिल्मों में अदालत का सीन. एक कठघरे में आरोपी और दूसरे में गवाह. सामने ऊंची सी कुर्सी पर बैठे हुए जज. और इन सबके बीच एक मूर्ति. न्याय की देवी की मूर्ति. जिसके एक हाथ में तलवार होती है और दूसरे में तराजू. इस न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी (Lady Justice Blindgold) होती है. इसी के आधार पर फिल्मों में संवाद लिखे जाते हैं कि कानून अंधा होता है. फिलहाल न्याय की इस देवी का स्वरूप बदल गया है.

सुप्रीम कोर्ट में लेडी जस्टिस के एक नए स्वरूप का अनावरण किया गया है. अब इस देवी की आंखों पर पट्टी नहीं है. वहीं एक हाथ में तराजू तो है लेकिन दूसरे हाथ में अब तलवार की जगह भारत का संविधान है. न्याय की देवी की मूर्ति में ये बदलाव बस यूंही नहीं कर दिया गया है. इसके गहरे मायने हैं. जैसा कि CJI चंद्रचूड़ ने कहा,

"कानून अंधा नहीं है, ये सबको बराबरी की नजरों से देखता है."

कानूनी गलियारों में इस बदलाव को बहुत महत्वपूर्ण बताया जा रहा है. अब इसे महत्वपूर्ण क्यों कहा जा रहा है, इसे समझने के लिए हमें जानना होगा कि आखिर न्याय की देवी की पुरानी मूर्ति का इतिहास क्या रहा है और इससे क्या मेसेज निकलता है?

लेडी जस्टिस की पुरानी मूर्ति

लेडी जस्टिस का कॉनसेप्ट बहुत पुराना है. प्राचीन यूनान और प्रचीन मिस्र की सभ्यताओं में इसके सबूत मिलते हैं. यूनान की सभ्यता में थेमिस को कानून, व्यवस्था और न्याय की देवी कहा जाता था. वहीं मिस्र की सभ्यता में इस तरह की देवी का नाम मात था. रोम में भी ऐसी ही देवी का जिक्र मिलता है. नाम- जस्टिलिया.

जैसा कि हम ऊपर बता ही चुके हैं कि न्याय की देवी की पुरानी मूर्तियां कैसी दिखती रही हैं. हालांकि, पुरानी मूर्तियों में ऐसी भी मूर्तियां हैं जिनकी आंखों पर पट्टी नहीं बंधी है. ऐसा कहा जाता है कि न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी हमेशा से नहीं बंधी थी. 16वीं शताब्दी के बीच से ऐसा होना शुरू हुआ.

खैर, अब बात थोड़ी सी विस्तार से कर लेते हैं. न्याय की पुरानी देवी की मूर्ति क्या मेसेज देती है? एक हाथ में तराजू का मतलब है कि अदालत में हर पक्ष की तरफ से पेश किए गए सबूतों को तौला जाएगा. इसका मतलब है अदालत हर पक्ष की बात सुनेगी और उन्हें दलीलें रखने का मौका देगी.

Lady Justice Blindfold
Lady Justice की एक पुरानी मूर्ति. (फोटो: कॉमन सोर्स)

वहीं तलवार का मतलब है कानून का सम्मान. मतलब, अदालत अपने फैसले के साथ खड़ी रहेगी. अगर अदालत के फैसले को किसी ने बदलने की कोशिश की तो अदालत बल का इस्तेमाल करेगी. इसका मतलब है कि अदालत दोषी को सजा देगी और जरूरत पड़ने पर निर्दोष की रक्षा भी करेगी.

न्याय की देवी के हाथ में तलवार दिखती है, यानी वो म्यान में नहीं होती. इसका मतलब है कि न्याय पारदर्शी है और होता हुआ दिखेगा. अक्सर आपने अदालतों की टिप्पणियां पढ़ी होंगी, जिनमें जज कहते हैं- ‘न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए.’ वहीं दोधारी तलवार का मतलब है कि सबूतों और गवाहों के आधार पर फैसला किसी भी पक्ष में जा सकता है.

ये भी पढें- 'बदले की कार्रवाई में नहीं चल सकता बुलडोजर'- सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, और क्या कहा?

अब आते हैं आंखों पर बंधी पट्टी पर. आंखों पर बंधी पट्टी मुख्य तौर पर ये दिखाती है कि कानून निष्पक्ष है और केवल सबूतों के आधार पर अपना काम करता है. वो ये नहीं देखता कि सामने वाला व्यक्ति प्रभावशाली है या वंचित तबके से आता है. वो सबको बराबर मानता है.

अब फिर से नई मूर्ति पर आते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई मूर्ति में न्याय की देवी के हाथ में तलवार की जगह संविधान इसलिए थमाया गया है क्योंकि संविधान ही न्याय व्यवस्था के काम करने का आधार है. जहां तलवार सजा और अधिकार का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं संविधान न्याय के प्रति एक सैद्धांतिक सोच का प्रतीक है. संविधान बराबरी, न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांत पर चलता है. यह लोगों के अधिकारों की रक्षा करता है. न्यायपालिका का भी यही काम है.

वहीं आंखों से पट्टी हटाने से यह संदेश दिया गया है कि कानून अब सबकुछ देखेगा और इन बातों से प्रभावित हुए बिना कि कौन सा व्यक्ति किस बैकग्राउंड से आता है, न्याय करेगा.

वीडियो: SC ST आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, Review Petition को किया खारिज

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