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कौन हैं जस्टिस नागरत्ना, जिन्होंने नोटबंदी के फैसले को गैर-कानूनी बता दिया?

नोटबंदी पर पांच जजों की बेंच ने सुनवाई की. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने बाकी चार जजों से अलग राय रखी.

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2 जनवरी 2023 (अपडेटेड: 2 जनवरी 2023, 08:16 PM IST)
Know about Justice BV Nagarathna demonetization
जस्टिस बीवी नागरत्ना. (फोटो: ट्विटर)
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नोटबंदी (Demonetisation) को लेकर हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी 2023 को फैसला सुनाया. पांच जजों की बेंच ने कहा कि नोटबंदी की प्रक्रिया ग़लत नहीं थी. पांच जजों की बेंच में से चार जजों ने सरकार के फैसले को सही करार दिया है. वहीं जस्टिस बीवी नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) ने इन चार जजों से अलग अपना पक्ष रखा है. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जिस तरह से नोटबंदी की गई, वो ग़ैर-क़ानूनी है. उन्होंने कहा,

“8 नवंबर, 2016 की अधिसूचना के तहत केंद्र सरकार द्वारा की गई नोटबंदी की कार्रवाई गैरकानूनी है. लेकिन फैसले के छह साल बाद कुछ नहीं किया जा सकता.”

जस्टिस बीवी नागरत्ना की इन टिप्पणियों के बाद उनकी चर्चा हो रही है. 

‘पहली महिला चीफ जस्टिस हो सकती हैं’ 

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के फेकल्टी ऑफ लॉ से एलएलबी (LLB) की पढ़ाई करने के बाद जस्टिस नागरत्ना ने 28 अक्टूबर 1987 को वकील के रूप में दाखिला लिया था. बेंगलुरु से अपने वकालत करियर की शुरुआत करने वालीं जस्टिस नागरत्ना को पिछले साल (2021 में) सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया था. कुल नौ जजों में से तीन महिला जजों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति दी गई थी. जस्टिस नागरत्ना साल 2027 में भारत की पहली महिला चीफ जस्टिस बन सकती हैं. वो 25 सितंबर, 2027 को भारत की 54 वीं चीफ जस्टिस बन सकती हैं. इस पद पर वो 36 दिनों के लिए रहेंगी. 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले वो कर्नाटक हाईकोर्ट में जज थीं. जस्टिस नागरत्ना ने अलग-अलग क्षेत्रों के कानून की प्रैक्टिस की है. उन्हें साल 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट का एडिशनल जज नियुक्त किया गया था. और दो साल बाद उन्हें कर्नाटक हाई कोर्ट के परमानेंट जज के रूप में प्रमोट कर दिया गया था.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस नागरत्ना के पिता ईएस वेंकटरमैया साल 1989 में छह महीने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे थे.

जस्टिस नागरत्ना के प्रमुख फैसले

जस्टिस बीवी नागरत्ना के द्वारा दिए गए प्रमुख फैसलों में से एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संचालन से जुड़ा हुआ है. साल 2012 में दिए गए अपने एक फैसले में उन्होंने कहा,

“किसी भी मीडिया चैनल के लिए सच पर आधारित सूचना दिखाना एक प्रमुख काम है. लेकिन सनसनीखेज के रूप में दिखाई जाने वालीं ‘ब्रेकिंग न्यूज’, ‘फ्लैश न्यूज’, या किसी भी ऐसी खबर पर अंकुश लगाना चाहिए.”

अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस नागरत्ना ने केंद्र सरकार से एक स्वायत्त और वैधानिक तंत्र बनाने की बात कही थी.

2019 में दिए गए एक और फैसले में जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि मंदिर किसी भी तरह का व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं है. इसलिए इसके तहत कर्मचारी पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट के अंतर्गत ग्रेच्युटी के हकदार नहीं हैं. लेकिन जस्टिस ने ये कहा था कि कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थानों और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम के तहत ये फायदा उठाया जा सकता है.

‘कानून के तहत होनी चाहिए थी नोटबंदी’

नोटबंदी पर बाकी जजों से अलग राय रखते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा,

“500 रुपये और एक हजार रुपये की सीरीज वाले नोटों को कानून के जरिए चलन से बाहर किया जाना चाहिए था. न कि एक अधिसूचना जारी करके. संसद में बहस के बाद सभी की सहमति से इस पर कानून बनाने की चर्चा थी.”

जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि देश से जुड़े इतने अहम मुद्दे पर संसद को अलग नहीं रखा जा सकता. RBI और केंद्र सरकार ने जो जवाब दाखिल किए हैं, उनमें विरोधाभास है. नोटबंदी का फैसला 24 घंटे में ले लिया गया था. जबकि इस प्रस्ताव को एक विशेष कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए था.

नागरत्ना ने कहा कि नोटबंदी के फैसले को RBI ने स्वतंत्र रूप से नहीं लिया था. इस मामले में RBI से केवल राय मांगी गई थी. हालांकि, बीवी नागरत्ना के अलावा बेंच के सभी जजों ने माना कि नोटबंदी की प्रक्रिया सही थी.      

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