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आपके तमाम वादे, उनकी कोई अकाउंटेबिलिटी है?- इरफ़ान टू केजरीवाल

इरफ़ान हॉलीवुड की दानवी चुनौती को करीब से देख रहे हैं. 'मदारी' के साथ उनकी यूनीक प्रमोशनल टैक्टिक्स को इस रौशनी में भी देखा जाना चाहिए.

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20 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 20 जुलाई 2016, 08:34 AM IST)
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इरफ़ान, फिल्म ‘मदारी‘ में
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कुछ साल पुरानी बात है. जंतर मंतर के पास से निकल मेट्रो की अोर जा रहा था. वहां अफरा तफरी थी. दिल्ली पुलिस के बैरीकेड रास्ता रोके थे. पूरी रोड पर पैंफलेट बिखरे थे. कुछ दूर से माइक पर एक आदमी की आवाज़ आ रही थी, मैं सुनकर रुक गया. रैली राजनैतिक थी, लेकिन उसमें मेरी सबसे पसन्दीदा फिल्म का डॉयलॉग उद्धृत किया जा रहा था. तिग्मांशु धूलिया की फिल्म 'पान सिंह तोमर' का संवाद, "बीहड़ में तो बाग़ी होते हैं. डकैत तो पार्लियामेंट में मिलते हैं".

साल था 2014. अौर फिल्म में अभिनेता इरफ़ान का बोला गया यह विस्फोटक संवाद राजनैतिक रैली में इस्तेमाल करनेवाले इंसान थे अरविन्द केजरीवाल, जो उस समय अन्ना आन्दोलन से निकली 'आम आदमी पार्टी' के साथ राजनैतिक एस्टेब्लिशमेंट को हिलाने की कोशिश कर रहे थे.

कट टू 2016 की जुलाई. आज अरविन्द केजरीवाल खुद एस्टेब्लिशमेंट हैं. अौर इरफ़ान 'आम आदमी' की भूमिका में आ गए हैं.

इरफ़ान खान की नई फिल्म 'मदारी' फिल्म कैसी है ये तो हम शुक्रवार को जानेंगे, लेकिन फिल्म के पहले वे जिस तरह का कैम्पेन चला रहे हैं, वो बहुत मज़ेदार है. वो फिल्म के निर्माता भी हैं अौर इसलिए ये देखना अौर दिलचस्प है कि वो यहां 'सेफ़' नहीं खेल रहे. कई विवादित मुद्दों पर बोल रहे हैं, अपनी राय रख रहे हैं. जयपुर में उन्होंने इस्लाम धर्म के कठमुल्लापन पर हमला किया, अौर सही किया. अभी मीडिया की सेलिब्रिटी के पीछे भागने की आदत पर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं, "कई बार अफसोस होता है कि इतना समय ऐसी चीज़ पर ज़ाया किया जाता है. कितने जरुरी काम किए जा सकते हैं इस समय में, जिससे किसी का भला हो. देश में कुछ लोग हैं जो पत्रकारिता को जिंदा रखे हुए हैं, बाकी सब बेच के खा गए हैं."

पढ़ें: मुसलमानो, चुप न बैठो, मज़हब को बदनाम न होने दो

फिर इस हफ़्ते उन्होंने देश के तीन बड़े नेताअों को सीधे ट्वीट कर मिलने का समय मांगा. अौर इसी की अगली कड़ी में उनकी अरविन्द केजरीवाल से मुलाकात हुई है.

साफ़ है कि इरफ़ान 'मदारी' के साथ कुछ नया करने का मन बनाकर आए हैं. अौर उनके सामने ये साफ़ है कि आज लड़ाई सिर्फ़ अच्छी फिल्म बनाने से पूरी नहीं होती, वो उसके प्रमोशन अौर कैम्पेन पर लड़ी जाती है.

यहां एक अौर बात खास है. इरफ़ान हमारी इंडस्ट्री के उन चुनिंदा अभिनेताअों में से हैं जो हॉलीवुड को भीतर से देख रहे हैं. हॉलीवुड को भी अौर उससे हिन्दी सिनेमा इंडस्ट्री को मिल रही खतरनाक चुनौती को भी. पिछले दिनों उन्होंने साक्षात्कार में इस चुनौती की अोर साफ़ इशारा करते हुए बताया कि अगर हम सावधान ना हुए तो हॉलीवुड हमारे सिनेमा को निगल जाएगा. विश्व के कितने ही देशों की लोकल सिनेमा इंडस्ट्री को हॉलीवुड का सिनेमा निगल गया है अौर अब उसकी विशाल भारतीय मार्केट पर नज़र है. 'मदारी' के साथ उनकी यूनीक प्रमोशनल टैक्टिक्स को इस रौशनी में भी देखा जाना चाहिए.

सावधान! हॉलीवुड हमें निगलने के लिए आ रहा है

जब वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मिलने गए तो भी उनकी पूरी कोशिश थी कि इसे सिर्फ़ फिल्म प्रमोशन से जुड़ा कैम्पेन ना समझा जाए. मुलाकात के बाद उन्होंने बताया "पहले तो उनको लगा कि मैं नाटक नौटंकी करने आया हूं, फिल्म प्रमोट करने आया हूं. लेकिन हमारी फिल्म एक संजीदा मुद्दे पर है, जिससे जुड़े सवाल जब मैंने पूछे तब उनको लगा कि मैं सीरियस हूं." केजरीवाल से उनकी बातचीत के कुछ हिस्से को फिल्म के फेसबुक पेज पर जारी किया गया, नीचे आप उसे पढ़ सकते हैं −

इरफ़ान: सर, जैसे ये हो रहा है कि हमारा पूरा मुल्क कंज्यूमरिज़्म की तरफ बढ़ रहा है. कंज्यूमरिज़्म मतलब भोगवाद. कि आप भोगो भोगो भोगो अौर वापस प्रकृति को ना दो. अपने लिए इस्तेमाल करो अौर फेंक दो. ऐसी प्रवृत्ति से इंसान वायरस बन जाता है.

ये प्रवृत्ति धीरे धीरे पॉलिटिक्स में भी बढ़ी है. पहले इलेक्शन के पहले शराब बांटी जाती थी, उसमें लोग आ जाते थे. फिर साड़ियां बंटी कहीं, कंप्यूटर बंटे कहीं. अब सीधा सीधा जो लेनदेन का मामला है वो यहां तक आ गया है कि भई, अगर आप मुझे वोट दोगे तो आपका इतना खर्चा बच जाएगा, आप मुझे वोट दोगे तो आपकी जेब में इतना आ जाएगा..

केजरीवाल: कैसे बच जाएगा मैं समझा नहीं?

इरफ़ान: मतलब आप कोई वादे करते हैं ना, जब बहुत सारे वादे होते हैं..

केजरीवाल: कि मैं साइकिल दूंगा, मैं ये दूंगा..

इरफ़ान: जैसे आपका वादा है ना, कि मैं ये कटौती करूंगा तो उनका पैसा बचेगा ना, ऐसे सबके वादे होते हैं. तो अब वो सीधा सीधा पॉकेट पर हो रहा है ये वार. लालच की प्रवृत्ति को एक्सप्लाइट किया जा रहा है. तो ये वादों की कोई अकाउंटेबिलिटी होती है क्या? होनी चाहिए क्या? देखिए अब मैंने किया वादा कि ये पांच साल में हो जाएगा. तो उसकी डेडलाइन होनी चाहिए कि वो नहीं हुआ तो धारा 420 लगनी चाहिए क्या उसपे?

केजरीवाल: आपका ऐतराज़ वादों के पूरा ना होने पे है या वादों की क्वालिटी पे है?

इरफ़ान: दोनों पे हैं. आप बताइये होनी चाहिए कि नहीं? ये लालच की प्रवृत्ति को एक्सप्लॉइट करना..

केजरीवाल: डेमोक्रेसी क्या है? डेमोक्रेसी 'बाई दि पीपल, फॉर दि पीपल, अॉफ दि पीपल'. उस डेमोक्रेसी में इरफ़ान खान को राइट नहीं होना चाहिए कहने का कि वादे की पॉलिटिक्स कैसी है. आप एक वोटर के बतौर कह सकते हैं. बाइ एंड लार्ज तो जनता तय करती है. जनता तय करती है कि मुझे अच्छा स्कूल चाहिए, कि एक लैपटॉप चाहिए. मुझे अच्छे अस्पताल चाहियें, कि मुझे साइकिल चाहिए. 'बाई दि पीपल, फॉर दि पीपल, अॉफ दि पीपल' में ये जितना भी पैसा कट रहा है ये है तो आप ही का पैसा ना, आपकी ही जेब से जाता है, टैक्स से जाता है. तभी सरकार चलती है. तो जब आप टैक्स देते हैं तब आप तय करते हैं कि मेरे को स्कूल चाहिए, सड़क चाहिए, बिजली चाहिए कि मुझे लैपटॉप चाहिए, साइकिल चाहिए.. तो हर पार्टी अपने अपने किसम के वादे करती है. अौर वोटर तय करता है कि मुझे किस चीज़ की तरफ़ जाना है. आपकी बात बिल्कुल ठीक है लेकिन प्रॉब्लम दो तरह की आ रही है. आपके सवाल को मैं थोड़ा सा रीडिफाइन कर रहा हूं..

इरफ़ान: हां..

केजरीवाल: प्रॉब्लम ये हो रही है कि कोई भी पार्टी आपको अच्छे स्कूल अॉफर ही नहीं कर रही है.  कोई कहता है मैं तेरे को साइकिल दे दूंगा, कोई कहता है मैं तेरे को लैपटॉप दे दूंगा. कोई ये नहीं कह रहा है कि मैं तुझे अच्छे स्कूल दे दूंगा, मैं तुझे अच्छे अस्पताल दे दूंगा, अच्छी सड़कें दे दूंगा..

'मदारी' के बारे में पहले खबरें आई थीं कि यह 'आम आदमी पार्टी' अौर खुद अरविन्द केजरीवाल से जुड़ी कहानी पर बेस्ड है. लेकिन अब इसका प्रमोशन पिता-पुत्र के संबंधों से बुनी इमोशनल थ्रिलर की तरह किया जा रहा है. लेकिन कैम्पेन में राजनैतिक पहलू भी प्रमुखता से शामिल है अौर मुख्य किरदार की 'आम आदमी' की छवि को प्रमोट किया जा रहा है.

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