हल्द्वानी: मामला हिंदू-मुस्लिम या सच्चाई कुछ और है?
लोगों की शिकायत है कि वो मुसलमान हैं, इसलिए हटाए जा रहे हैं.

1 जनवरी के रोज़ आप अखबार में क्या पढ़ना चाहते हैं? ज़ाहिर है, कोई अच्छी खबर. जो देर से सोकर उठते हैं, वो उस दिन अखबार स्किप ही कर जाते हैं. लेकिन उत्तराखंड के हलद्वानी में 1 जनवरी 2023 का अखबार नज़र गड़ाकर पढ़ा गया. हज़ारों लोगों का डर सच साबित हो गया था. रेलवे ने एक सार्वजनिक नोटिस में ऐलान कर दिया था कि उसकी ज़मीन पर बने घरों को एक हफ्ते के भीतर खाली कर दें. यदि ऐसा नहीं होता है, तो अतिक्रमण रोधी कार्रवाई की जाएगी और इसका खर्च भी लोगों से ही वसूला जाएगा. क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश की तामील की जानी है. जो अखबारों में छपवाया गया, उसकी लाउड स्पीकर से मुनादी भी करवाई गई.
रेलवे ने ''घर'' शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है, न ही ''लोगों'' शब्द का इस्तेमाल किया है. रेलवे का नोटिस अनाधिकृत कब्ज़ा और कब्ज़ेदारों की बात करता है. हम जानते हैं कि रेलवे की ज़मीन पूरे देश में भयंकर अतिक्रमण का शिकार है और रेलवे समय समय पर कब्ज़े हटाता भी है. कुछ कब्ज़े राजनैतिक दखल के चलते हट नहीं पाते.
क्योंकि 2,190 मीटर लंबे और तकरीबन 850 मीटर चौड़े जिस पट्टे को भारतीय रेल खाली करवाना चाहता है, उसपर सिर्फ आम लोगों द्वारा किए ''कब्ज़े'' ही नहीं हैं. वहां कम से कम तीन सरकारी स्कूल भी हैं और एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र भी. फिर जिन घरों को कब्ज़ा बताया गया है, वो सब एक वक्त में नहीं बने. उनमें से कई का इतिहास हलद्वानी शहर जितना ही पुराना है. इसीलिए हलद्वानी के बनभूलपुरा में रोज़ प्रदर्शन हो रहे हैं. लोगों की शिकायत है कि वो मुसलमान हैं, इसलिए हटाए जा रहे हैं. वहीं रेलवे का कहना है कि उसके पास ज़मीन का मालिकाना हक साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज़ हैं और ये विषय रेलगाड़ियों के सुरक्षित संचालन और यात्रियों की जान की सुरक्षा से जुड़ा है. फिर उच्च न्यायालय का आदेश है, जो उसपर बाध्यकारी है. तो आज दी लल्लनटॉप शो में हम इसी पर बात करेंगे कि हलद्वानी में गौला नदी के किनारे जो ज़मीन का पट्टा है, उसपर किसका दावा मज़बूत है? रेलवे का? वहां रह रहे लोगों का? या फिर एक तीसरा दावेदार भी है, जिसकी भूमिक को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं.
2022 के आखिरी हफ्ते में ईयर एंडर्स की सीरीज़ में हमने इस बात को बार बार रेखांकित किया था, कि हम हर विषय को दो खेमों में बंटकर देखने के आदी होते जा रहे हैं. हलद्वानी मामले पर भी यही बात लागू होती है. दो टीमें बन गई हैं - एक टीम मानती है कि हलद्वानी के बनभूलपुरा में मुसलमान रहते हैं, इसीलिए रेलवे को उस ज़मीन की अचानक याद आ गई है. और दूसरी टीम मानती है कि ये अतिक्रमण का एक ओपन एंड शट केस है, जिसे बेवजह तूल दिया जा रहा है. हम शुरुआत में ही बता दें, ये दोनों बातें पूरी तरह सही नहीं हैं. आज जो नज़र आ रहा है, आइए उसे इतिहास के संदर्भ के साथ समझने की कोशिश करें. इतिहास - हलद्वानी में रेल लाइन के निर्माण और रेलवे के किनारे हुई बसाहट का.
इसके लिए हमने काफल ट्री के सह संपादक सुधीर कुमार से बात की. काफल ट्री, एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है, जो उत्तराखंड के सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों पर काम करता है. सुधीर ने हमें बताया कि आज जिस जगह हलद्वानी बसा है, वो तराई का इलाका है. वहां एक वक्त घने जंगल होते थे और मलेरिया का ऐसा प्रकोप था कि पहाड़ी लोग तक यहां आने से बचते थे. तब मलेरिया का इलाज मौजूद नहीं था और ये जान ले लेता था. इसीलिए उत्तराखंड की तमाम भाषाओं के लोकगीतों में इस तरह की नसीहतें मिलती हैं कि मैदान की तरफ मत जाना. तब हलद्वानी में इतनी सघन बसाहट कहां से आई?
जब हलद्वानी एक मंडी के रूप में सफल होने लगा, तो 1880 के आसपास यहां रेलवे लाइन डाली गई और हलद्वानी ने एक स्थायी बसाहट का स्वरूप लेना शुरू किया. पहाड़ से कुछ लोग हलद्वानी की ओर आए. इसी तरह आधुनिक उत्तर प्रदेश के रामपुर, बिजनौर, धामपुर, मुरादाबाद आदि से भी लोग हलद्वानी आकर बसने लगे. इसका मतलब हलद्वानी का कोई इलाका नहीं, लगभग पूरा ही शहर बीते 150-200 सालों में यहां आकर बसा. इंडिया टुडे हिंदी के संवाददाता विनय सुल्तान इस स्टोरी को कवर करने हलद्वानी गए थे. उन्होंने हमें बताया कि न सिर्फ यहां लोग बसे, उन्हें लाकर बसाया भी गया.
रामपुर जंक्शन से काठगोदाम तक जाने वाली रेल लाइन आज भी हलद्वानी शहर के लगभग पूरे हिस्से के लिए एक सीमा की तरह काम करती है. रेलवे लाइन के एक तरफ शहर है, दूसरी तरफ गौला नदी. कुछ ही इलाके रेलवे लाइन की दूसरी तरफ हैं. जहां हलद्वानी का रेलवे स्टेशन है, वहां पटरी गौला नदी के ठीक किनारे पर है. और यहीं बसे हुए हैं बनभूलपुरा के गफूर बस्ती और ढोलक बस्ती इलाके. माने वो बसाहट, जहां रेलवे ने कब्ज़ेदारों को हटाने के लिये सार्वजनिक नोटिस जारी किया है. यहां बसाहट कब और कैसे पनपी?
विनय ने हमें बताया कि रेलवे लाइन के किनारे बसे लोगों में हर तरह के लोग हैं. सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, और निम्न आय वर्ग के मज़दूर. बनभूलपुरा की आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लाम को मानता है. यहां कुछ हिंदू भी बसते हैं और इलाके में कम से कम एक मंदिर भी है.
तो हमने जान लिया कि हलद्वानी में रेल की पटरी कहां से आई और उसके इर्द गिर्द बसाहट कैसे तैयार हुई. इन्हीं दो पक्षों में ज़मीन का विवाद चल रहा है. लेकिन जैसा कि हमने शुरुआत में संकेत किया था, ज़मीन का कम से कम एक और दावेदार भी था. दरअसल आधुनिक काठगोदाम और हलद्वानी जहां बसा है, उस ज़मीन का काफी हिस्सा अंग्रेज़ों के राज में दानसिंह बिष्ट नाम के एक व्यापारी को दिया गया था. इन्हें लोग दान सिंह मालदार के नाम से भी जानते हैं. उन दिनों लगातार रेल विस्तार चल रहा था, जिसके लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ रही थी. ''टिंबर किंग'' बिष्ट यही लकड़ी सप्लाई करते थे, जो पाकिस्तान से लेकर बर्मा तक जाती थी. और इसी कारोबार के चलते हलद्वानी के आगे पड़ने वाले आखिरी स्टेशन का नाम काठगोदाम पड़ गया. बिष्ट को जो ज़मीन दी गई, वो रेलवे लाइन से करीब ही थी. इसीलिए एक दावा ये भी है, कि जितनी ज़मीन रेलवे की बताई जा रही है, उसमें एक हिस्सा दरअसल नजूल की वो ज़मीन है, जो एक वक्त बिष्ट को दी गई थी. नजूल को सादी भाषा में आप सरकारी ज़मीन कह सकते हैं. सरकार कौनसी - उत्तराखंड सरकार. ज़मीन रेलवे की है, या सरकार की, इसपर दस्तावेज़ क्या कहते हैं.
यहां से कहानी दिलचस्प हो जाती है. कि बनभूलपुरा में ऐसी ज़मीनें भी हैं, जिन्हें क्रमशः सरकारों ने बेचा है. माने इस ज़मीन के कानूनी रूप से वैध मालिक मौजूद हैं. इन्हीं दस्तावेज़ों के आधार पर लोग अतिक्रमण रोधी नोटिस को गलत बता रहे हैं.
यहां एक बात साफ करना ज़रूरी है. जो लोग नजूल की ज़मीन पर बसे हैं. अगर उनके पास वैध पट्टे नहीं है, तो वो रेलवे की अतिक्रमण रोधी कार्रवाई का विरोध ज़रूर कर सकते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं होगा, कि उनका निर्माण वैध हो गया.
हमने आपको लोगों का पक्ष बता दिया. अब रेलवे के पक्ष पर आते हैं. जैसा कि विनय ने कुछ देर पहले बताया, हलद्वानी में रेल लाइन के करीब सघन बसाहट है. यहां ऐसे निर्माण हैं, जिन्हें लेकर ये संशय नहीं है कि वो रेलवे की ज़मीन पर बने हुए हैं. इससे रेल संचालन में कैसी समस्याएं आ सकती हैं, हमने जाना मध्य रेल के नागपुर मंडल में तैनात एक पर्मानेंट वे इंस्पेक्टर माने PWI से. PWI रेलवे में उस अधिकारी को कहते हैं, जो ट्रैक के रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार होता है. ट्रैक गाड़ियों के चलने के लिए सुरक्षित रहे, ये PWI को ही सुनिश्चित करना होता है. नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने दी लल्लनटॉप को बताया,
‘’रेल भूमि पर अतिक्रमण पूरे देश में है. ज़्यादातर अतिक्रमण शहरों के भीतर स्टेशन के पास होता है. इससे सबसे बड़ी समस्या आती है यार्ड एक्सटेंशन में. माने मेन लाइन से स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर आने और जाने वाले रास्ते के विस्तार में. इसके चलते स्टेशन की क्षमता बढ़ नहीं पाती. रेलवे लगातार दूसरी और तीसरी लाइन डालने के प्रयास में है. अतिक्रमण के चलते ये काम ऐन स्टेशन के मुहाने पर आकर रुक जाता है. भारतीय रेल के नियम कहते हैं कि ट्रैक के दोनों तरफ कम से कम साढ़े पांच मीटर जगह बिलकुल खाली होनी चाहिए. तभी गाड़ी अपनी पूरी रफ्तार पर चलाई जा सकती है. सामान्यतः अतिक्रमणकारी इतने करीब नहीं बसते. लेकिन जब वो ऐसा करते हैं, तब ओवर डाइमेंशन कंसाइनमेंट माने ODC ले जाने में दिक्कत आती है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है - सेना के लिए चलाई जाने वाली विशेष गाड़ियां जिनपर टैंक और गोला-बारूद लादा जाता है. ट्रैक के करीब अतिक्रमण से रेलवे को सिग्नल और बिजली की लाइन डालने में समस्या आती है. सघन बस्तियों में प्रायः लोग और जानवर ट्रैक के सामने आ जाते हैं. जब ये अचानक होता है, लोको पायलट माने ट्रेन के डाइवर गाड़ी नहीं रोक पाते और हादसा हो जाता है. इसमें बेगुनाह व्यक्ति की जान तो जाती ही है, ड्राइवर के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है. इसीलिए जब एक - दो हादसे हो जाते हैं, रेल विभाग ऐसे इलाकों में स्पीड रिस्ट्रिक्शन लगा देता है. और गाड़ियां 20 किलोमीटर की रफ्तार पर चलाई जाती हैं. जिसके चलते यात्रियों को देर होती है, रेलवे को माली नुकसान होता है.''
हमने ये जान लिया कि ज़मीन पर रेल लाइन कहां से आई. ये जान लिया कि बसाहट कहां से आई. और उसे लेकर लोगों के दावे भी जान लिए. अब आते हैं इस विषय पर, कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई वास्तव में कब शुरू हुई. अतिक्रमण रोधी नोटिस एक बहुत लंबी कानूनी कार्यवाही का नतीजा है, जो 10 साल से भी ज़्यादा चली है. और इसकी शुरुआत होती है, एक पुल के गिरने से. हलद्वानी से लगकर बहने वाली गौला नदी पर 1998 में एक पुल बनना शुरू हुआ. ताकि गौला-पार नाम की बस्ती को हलद्वानी से जोड़ा जा सके. 2004 में ये पुल बनकर तैयार हुआ और 2008 में ही ढह गया. और तब सामने आए एक सामाजिक कार्यकर्ता.
विनय ने एक महत्वपूर्ण बिंदू उठाया है. वो बता रहे हैं कि अतिक्रमण रोधी कार्रवाई का विस्तार रेलवे की 29 एकड़ की पैमाइश से बढ़कर 70 एकड़ के पार कैसे गया. नजूल भूमी की कई लीज़ ऐसी थीं, जिनका नवीनीकरण नहीं हुआ. इसपर नैनीताल के ज़िला मैजिस्ट्रेट ने ये आरोप लगाया जा रहा है कि उत्तराखंड सरकार ने उच्च न्यायालय में केस पूरी ताकत से नहीं लड़ा.
फिलहाल ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है. जहां 5 जनवरी के रोज़ सुनवाई होगी. अतिक्रमण भारत में एक बहुत बड़ी समस्या है. रेलवे और सेना तक की हज़ारों एकड़ ज़मीन अतिक्रमणकारियों के कब्ज़े में है. इसीलिए हम कभी अतिक्रमण या अतिक्रमणकारियों के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते. हम बस ये कह सकते हैं कि कार्रवाई से पहले लोगों के दावों और आपत्तियों का ठीक तरीके से निवारण कर लिया जाए. और अतिक्रमण रोधी कार्रवाई के वक्त देश की तमाम अदालतों की दी गाइडलाइन का पालन हो. मिसाल के लिए 2015 में कांग्रेस नेता अजय माकन की याचिका पर फैसला देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि झुग्गियों से लोगों को तभी हटाया जा सकता है, जब ये साबित हो जाए कि ज़मीन पर उनका कब्ज़ा अवैध है. अतिक्रमण रोधी कार्यवाही से पहले एक विस्तृत सर्वे करना होगा. और एक पुनर्वास योजना भी बनानी होगी, जिसके तहत उन्हें फौरन शरण मिले. हम उम्मीद करते हैं कि हलद्वानी में अगर अतिक्रमण रोधी मुहिम चलाई गई, तो उसमें सरकार इन बिंदुओं का भी ध्यान रखेगी.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: हल्द्वानी में अतिक्रमण पर रेलवे की कार्रवाई और हिंदू-मुस्लिम में भेदभाव के आरोप का पूरा सच ये रहा!

