गुजरात दंगों में 69 आरोपी बरी, पीड़ित बोले- 'जो लोग मरे वो आत्महत्या करके मरे?'
गवाह सन्न कर देने वाली बातें बोले. वकील ने कहा- 21 साल और लग जाएं मगर...
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20 अप्रैल को गुजरात के अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने नरोदा गाम दंगा मामले (Naroda Gam Riot) में सभी 69 आरोपियों को बरी कर दिया. अहमदाबाद के नरोदा गांव में 28 फरवरी, 2002 को दंगे हुए थे. दंगों में 11 लोगों को जिंदा जला दिया गया था. इस मामले में गुजरात सरकार की पूर्व मंत्री माया कोडनानी के अलावा बजरंग दल के पूर्व नेता बाबू बजरंगी को भी बरी कर दिया गया. अदालत के फैसले के बाद पीड़ितों के बयान सामने आए हैं. साथ ही पीड़ित पक्ष के वकील का पक्ष की सामने आया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़ित पक्ष के वकील शमशाद पठान ने कहा कि आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को वो गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती देंगे. पठान ने बताया,
“ये फैसला सिर्फ पीड़ितों के खिलाफ नहीं है. बल्कि SIT के खिलाफ भी है. वो SIT जिसने अपना काम ठीक से किया और 86 आरोपियों को दोषी ठहराया. ये फैसला सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ है. भले ही 20 साल से ज्यादा बीत गए हों, पीड़ितों को न्याय मिलेगा, चाहे और 20 साल क्यों ना लग जाएं.”
पठान ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि अदालत ने किस आधार पर सभी आरोपियों को बरी किया. उन्होंने बताया कि वो अदालत की कॉपी का इंतजार कर रहे हैं. पठान ने कहा,
“हमारे पास आरोपियों के खिलाफ सभी सबूत थे. FSL से लेकर सेल टावर की लोकेशन और चश्मदीदों के बयान तक, सभी हमारे पास मौजूद थे.”
नरोदा गाम दंगों पर अदालत के फैसले को गवाहों ने पीड़ितों के लिए ‘काला दिन’ बता दिया. इंडियन एक्सप्रेस में छपी सोहिनी घोष की रिपोर्ट के मुताबिक मामले में गवाह इम्तियाज अहमद हुसैन कुरैशी ने बताया कि उन्होंने 17 आरोपियों की पहचान की थी. इसमें विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नेता जयदीप पटेल, प्रद्युम्न पटेल, तत्कालीन पार्षद वल्लभ पटेल और अशोक पटेल शामिल थे. कुरैशी ने कहा,
“मैंने इन लोगों को भीड़ को उकसाते और मस्जिद को जलाने व खास जगहों पर हमला करने का इशारा करते देखा था. मैंने उन लोगों को परिवारों को जलाते हुए देखा, पांच लोगों को मेरी आंखों के सामने जलाकर मार डाला गया. यहां तक मुझे इन लोगों के कपड़ों के रंग भी याद हैं. मैंने सभी साक्ष्य दिए थे.”
कुरैशी ने कहा कि आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए थी. कुरैशी ने बताया,
“आरोपियों का बरी होना न्याय व्यवस्था पर हमारे विश्वास को कम करता है. पीड़ितों के लिए ये काला दिन है. यानी, जो लोग मरे वो आत्महत्या करके मरे? क्या उन लोगों ने खुद को जलाकर आत्महत्या कर ली थी?”
इस मामले में एक और गवाह शरीफ मालेक ने अदालत में माया कोडनानी और जयदीप पटेल सहित 13 आरोपियों की पहचान की थी. मालेक ने इन लोगों खिलाफ गवाही भी दी थी. मालेक ने कहा,
“ये फैसला दिखाता है कि जो लोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा करते हैं उन्हें मुक्त कर दिया जाता है. ये लोगों के लिए एक अप्रत्यक्ष संदेश है. ये फैसला न्यायिक व्यवस्था पर हमारे विश्वास को कम करता है और इस व्यवस्था पर कई सवाल भी खड़े करता है.”
मालेक ने आगे कहा कि हम इस फैसले से निराश हैं, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे. हम लड़ते रहेंगे और इस फैसले के खिलाफ अपील भी करेंगे.
नरोदा हिंसा28 फरवरी 2002 की सुबह अहमदाबाद के नरोदा गांव में भीड़ ने कई घरों को आग के हवाले कर दिया था, जिसमें मुस्लिम समुदाय के 11 लोगों की मौत हुई थी. इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. लेकिन बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने कोडनानी को बरी कर दिया. वहीं बजरंगी की सजा बरकरार रही थी. कोर्ट के फैसले के बाद माया कोडनानी ने मीडिया से कहा कि आज उनका न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास बढ़ गया है. 67 साल की कोडनानी ने भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि आज सही मायने में सत्य की जीत हुई है.
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