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पीएम मोदी ने अगर इस कांग्रेसी सांसद की बात नहीं मानी, तो असम में डूब सकती है बीजेपी

कांग्रेस के इस लोकसभा सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी है.

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13 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 22 अक्तूबर 2017, 08:02 AM IST)
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देश के अन्य हिस्सों के साथ ही राजधानी दिल्ली में भी बारिश ने दस्तक दे दी है. हमने भी अपने सोशल मीडिया अकाउंट को बारिश और चाय-पकौड़ों वाली फोटो से भर दिया है. बारिश की ख़ुशी में हमें बाढ़ तब तक दूर की बात नज़र आती है, जब तक हमारी नालियां ओवरफ्लो न होने लगें या दिल्ली के आश्रम फ्लाईओवर पर गाड़ियों की लंबी कतार न लग जाए.

असम और अरुणाचल प्रदेश में बाढ़ की समस्या गंभीर है. उन क्षेत्रों में बाढ़ से मरने वालों की संख्या हर बीतते दिन के साथ बढ़ रही है. बुधवार (12 जुलाई) को ही नागालैंड के दीमापुर में पुल गिरने से 4 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए. धंसारी नदी के ऊपर बना ये पुल दीमापुर के ईसाई संस्थान के स्वास्थ्य विज्ञान और अनुसंधान (रेफरल) अस्पताल के पास गिर गया. स्थानीय लोगों के अनुसार वो पुल इस दुर्घटना के पहले से ही बुरी हालत में था. मामले की गंभीरता को भांपते हुए कांग्रेस से लोकसभा सांसद गौरव गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मसले से अवगत कराने के लिए उन्हें पत्र लिखा है.


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गौरव गोगोई द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए ख़त का पहला पन्ना

कौन हैं गौरव गोगोई?

जब गौरव ने मई 2013 में कांग्रेस जॉइन की थी, तब लोगों में उनकी पहचान असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे की थी. लेकिन आज लोगों में उनकी छवि कलियाबोर लोकसभा सीट से चुने गए सांसद की है. उन्होंने इस विपदा की घड़ी में केंद्र सरकार से मदद न मिलने की शिकायत के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है. असम में कांग्रेस के 15 साल लंबे कार्यकाल के दौरान भी इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिसकी वजह से हर साल लोगों की जानें जा रही हैं.

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2014 में फर्स्टपोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में जब गौरव से पूछा गया कि असम में बाढ़ और इससे जुड़ी समस्याएं कब तक चुनावी मुद्दा बनती रहेंगी, तो उन्होंने जवाब दिया था, "बाढ़ और क्षरण असम की सबसे बड़ी समस्याओं में से है. पिछली यूपीए सरकार ने ये सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएं शुरू की थीं कि क्षेत्र बाढ़ और क्षरण से अच्छी तरह से सुरक्षित रहे. इसके लिए असम में बाढ़ प्रबंधन प्रोग्राम शुरू किए गए और मजुली नदी के किनारे और अन्य इलाकों की सुरक्षा के लिए यूपीए सरकार द्वारा ब्रह्मपुत्र बोर्ड को अच्छी खासी फंडिंग भी दी गई थी. लेकिन दुर्भाग्यवश, आज के समय में केंद्र सरकार ने इस समस्या को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है."

क्या कहते हैं आंकड़े

अरुणाचल प्रदेश के पापम पारे जिले में भूस्खलन से 14 लोगों की मौत हो गई है. लापताप गांव में कई लोग अभी भी भूस्खलन की चपेट में आई घरों के मलबे में दबे हुए हैं.

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पड़ोसी राज्य असम में भी बाढ़ का कहर ज़ारी है, जिससे 23 जिलों में तक़रीबन 15 लाख लोग प्रभावित हुए हैं. असम आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एडीएमए) के मुताबिक, इस बाढ़ में अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है. डिब्रूगढ़, तेजपुर, गोलपारा और धुबरी में ब्रह्मपुत्र अभी भी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है, जिसके कारण अब तक 48,483 लोगों ने राज्य के 208 राहत शिविरों में शरण ली है.

और ये हैं फैक्ट्स

बाढ़ के कारण 2016 असम के लिए तबाही वाला साल रहा. अगर सरकारी आंकड़ों की मानें, तो इस साल असम में बाढ़ की वजह से राज्य के 21 जिलों के तक़रीबन 1.3 लाख लोग प्रभावित हो चुके हैं.

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असम के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष डॉ न्यायमूर्ति आफताब हुसैन सैकिया ने 2012 में कहा कि "2005 से 2011 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बाढ़ पीड़ित इस राज्य को इसकी बेहतरी और सुधार के लिए बड़ी राशि प्रदान की गई, लेकिन असम की जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक इस राशि का दुरुपयोग किया गया है, जिसके कारण राज्य के लोग आज भी पीड़ित हैं."

साल 2013 में बाढ़ राहत कोष में 11,000 करोड़ रुपए मिलने के बावजूद राज्य में अब भी 2011 की बाढ़ जैसी स्थिति बनी हुई है. न ही बाढ़ से प्रभावित लोगों के जीवन में कोई अंतर आया, न ही बाढ़ से राहत के लिए उपायों में. मानवाधिकार आयोग ने 2012 में बाढ़ राहत के लिए दिए गए राशि के कथित दुरुपयोग के खिलाफ जांच के भी आदेश दिए थे. RTI के एक जवाब के मुताबिक़ 2005 से 2011 के बीच राहत और रखरखाव पर 11 हज़ार करोड़ रूपए से कम खर्च नहीं हुए हैं.

हर साल होने वाले इस आपदा के समाधान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भ्रष्टाचार है. बाढ़ की वजह से होने वाली तबाही से बचाव और रखरखाव के लिए आने वाली राशि का इस्तेमाल कभी भी सही जगह नहीं होता, जिसकी वजह से इस समस्या का समाधान आज तक नहीं हो पाया है और आज भी ये असम में चुनावी मुद्दा बना हुआ है.




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