इस मॉडल की जांघ पर स्ट्रेच मार्क्स दिखे तो लोग वाहवाही क्यों करने लगे?
जानिए स्ट्रेच मार्क्स क्या होते हैं, क्यों होते हैं और क्या सचमुच इनका इलाज कराने की 'ज़रूरत' होती है?
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सामान्य तौर पर फैशन शूट के बाद मॉडल्स के शरीर पर कोई 'खामी' नज़र आए तो उसे हटा दिया जाता है. लेकिन बूहू के इश्तेहार में ऐसा नहीं किया गया है.
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कॉस्मेटिक और फैशन इंडस्ट्री के मुताबिक दुनिया में किसी का शरीर 'सुंदर' नहीं है. उसे सुंदर 'बनाना' पड़ता है. इसके लिए खरीदने पड़ते हैं इनके कपड़े, इनके लोशन, इनके परफ्यूम. लंबी लिस्ट है. इन कंपनियों के इश्तेहार में हमेशा एक ऐसा शरीर दिखाया जाता है जो सच्चाई से दूर होता है, लेकिन मन ललचाता है. यही लालच इनके धंधे को चलाता है. लेकिन एक ऑनलाइन फैशन स्टोर ने इस खेल से ऊपर उठने की हिम्मत की है. ब्रिटिश फैशन स्टोर बूहू (Boohoo)ने स्विमसूट के अपने एक ऐड में मॉडल को स्ट्रेच मार्क्स के साथ दिखाया है. और इस बात की खूब तारीफ हो रही है.
Boohoo के इस इश्तेहार पर पब्लिक का ध्यान तब गया जब शेरिल एडेले नाम की एक फेसबुक यूज़र ने इसे अपनी वॉल पर पोस्ट किया और लिखा -

बूहू का वो स्विमसूट ऐड जो चर्चा का कारण बना.
शेरिल के पोस्ट को खबर लिखे जाने तक 69,084 बार शेयर किया जा चुका है. एक लाख दस हज़ार बार लाइक किया जा चुका है.
अमूमन जो मॉडल फैशन इंडस्ट्री के लिए ऐड करती हैं, वो खुद पर तमाम अत्याचार करके अपने शरीर को रंग, आकार और वज़न के ऊटपटांग दायरे के अंदर रखती हैं. फिर भी अगर कुछ 'खामी' रह जाए तो तस्वीरों और वीडियो को एडिट किया जाता है. रंग गोरा किया जाता है, झुर्रियां हटाई जाती हैं, पेट पर ऐब्स बना दिए जाते हैं. तो Boohoo के इश्तेहार में स्ट्रेच मार्क्स नज़र आने का इकलौता कारण यही हो सकता है कि कंपनी ने सोच-समझकर ऐसा किया हो.
एक बात ये भी है कि कंपनियां समय-समय पर ऐसे ऐड कैंपेन चलाती रहती हैं, जो उन्हें माली फायदा भले न दे, लेकिन ब्रैंड की इमेज बेहतर करे. बूहू से पहले भी फैशन ब्रॉन्ड एक परफेक्ट शरीर की अवधारणा को तोड़ते इश्तेहार बना चुके हैं. पिछले साल मिसगाइडेड (Missguided) के एक इश्तेहार में एक मॉडल के शरीर पर स्ट्रेच मार्क्स दिखाए गए थे. तब मिसगाइडेड की भी खूब तारीफ हुई थी. ये इश्तेहार बनाए ही इस तरह जाते हैं कि नई ज़मीन तोड़ते लगें. तो है ये भी विशुद्ध मार्केटिंग स्ट्रैटेजी ही. लेकिन इस वजह से इन्हें खारिज नहीं किया जा सकता. अच्छा संदेश देने वाली मार्केटिंग प्रोपेगैंडा मार्केटिंग से बेहतर ही कही जाएगी.

पिछले साल चर्चा का कारण बना मिसगाइडेड का इश्तेहार.
Boohoo और Missguided ने अपनी मॉडल्स के शरीर पर स्ट्रेच मार्क्स दिखाए. वो भी वहां, जहां वो ज़्यादातर औरतों को होते हैं. माने नितंबों (हिप्स) और जांघों (थाई) पर. इसीलिए ये दोनों उदाहरण मार्केटिंग के बावजूद ज़िक्र के लायक हैं.
कैसे बनते हैं ये निशान?
बायोलॉजी की क्लास में आपने ध्यान दिया होगा तो जानते होंगे कि त्वचा तीन मुख्य परतों से बनी होती हैं. इसमें से बीच वाली को कहते हैं डर्मिस. स्ट्रेच मार्क डर्मिस पर ही बनते हैं. शरीर सामान्य रूप से बढ़े तो डर्मिस की कोशिकाएं (टिशू) भी साथ-साथ बढ़ती रहती हैं. लेकिन अगर शरीर अचानक बढ़े तो डर्मिस की कोशिकाएं खिंचने लगते हैं, और आखिर फट जाती हैं. और तब त्वचा की सामान्य बनावट की जगह उसके नीचे की परतें दिखने लगती हैं जिनमें फैट (वसा) होता है. ये परत हल्के सफेद रंग की होती है जो त्वचा के रंग से कॉन्ट्रास्ट पैदा करता है. इसीलिए स्ट्रेच मार्क्स त्वचा के टेक्शचर (बनावट) को तोड़ते नज़र आते हैं. जैसे ये कोई 'खामी' हो. स्ट्रेच मार्क कोशिका के अपनी सीमा से ज़्यादा खिंचने पर ही नहीं बनते. जब त्वचा लगातार खिंच और सिकुड़ रही हो, तब भी ये निशान बन जाते हैं. स्ट्रेच मार्क्स लगभग 50 % औरतों के शरीर पर होते हैं (हो ये आदमियों के शरीर पर भी सकते हैं लेकिन ज़्यादातर औरतों के शरीर पर होते हैं).

घुटनों पर बने स्ट्रेच मार्क्स. फोटो क्रेडिटः टंबलर
कब-कब और कहां-कहां बनते हैं स्ट्रेच मार्क्स?
प्रेगनेंसी के दौरान औरतों के पेट पर स्ट्रेच मार्क्स बनते हैं. क्योंकि उनका पेट तेज़ी से बढ़ता है. इसके अलावा प्यूबर्टी (किशोरावस्था) शुरू होने पर लड़कियों के स्तन और नितंब बढ़ते हैं. तब भी ये निशान बन जाते हैं. ये निशान लड़कों के शरीर पर भी हो सकते हैं. कई मामलों में स्ट्रेच मार्क्स की वजह कोई मेडिकल कंडीशन होती है. जैसे मारफैन सिंड्रोम. इसमें त्वचा में लचक कम हो जाती है. तो खिंचने के निशान पड़ने लगते हैं. इसके अलावा कुशिंग सिड्रोम या थॉयरॉइड की समस्या होने पर शरीर में हॉर्मोन्स का स्तर गड़बड़ हो जाता है और शरीर का वज़न तेज़ी से बढ़ता है लेकिन त्वचा उसी तेज़ी से नहीं बढ़ पाती. कभी-कभार ऐसा भी होता है कि त्वचा पर अलर्जी वगैरह के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली क्रीम से ही निशान पड़ जाए. ऐसा तब होता है जब आप कोर्टिकोस्टेरॉइड (corticosteroid) क्रीम का इस्तेमाल करें. इससे त्वचा में कोलैजन की मात्रा कम होने लगती है और उसका लचीलापन कम हो जाता है. नतीजे में वो दरकने लगती है.
क्या स्ट्रेच मार्क्स का 'इलाज' ज़रूरी है?
मेडिकल साइंस स्ट्रेच मार्कस को शरीर में घटने वाली एक बेहद सामान्य घटना मानता है. इनसे कोई नुकसान नहीं होता. इसीलिए इनके इलाज की कोई खास ज़रूरत नहीं होती. कुछ दुर्लभ मामलों में स्ट्रेच मार्क्स शरीर में किसी दूसरी बीमारी का इशारा हो सकते हैं. लेकिन ऐसा बेहद कम होता है.

इंग्लैंड में रहने वाली एमिली हॉल्स्टन की तरह कई औरतों ने प्रेगनेंसी के वक्त हुए स्ट्रेच मार्क्स को खुलकर अपनाने की शुरुआत की है. (फोटोः एमिली हॉल्स्टन, इंस्टाग्राम)
लेकिन बावजूद पूरी तरह सामान्य होने के, स्ट्रेच मार्क्स लोगों की बॉडी इमेज पर प्रतिकूल असर डालते हैं. खासकर औरतों के मामलों में. उनके दिमाग में ये ग्रंथी बन जाती है कि उनका शरीर 'परफेक्ट' नहीं रहा. कभी-कभी वो एंग्ज़ाइटी (घबराहट, चिंता) की शिकार तक हो जाती हैं. लेकिन स्ट्रेच मार्क्स का कोई निश्चित इलाज है ही नहीं. जो कुछ है, वो बेहद महंगा है. और उसमें भी निशान हटने की गारंटी नहीं होती. इसीलिए लोग क्रीम और लोशन की ओर मुड़ते हैं (जो कतई सस्ते नहीं होते). स्ट्रेच मार्क्स समय के साथ हल्के पड़ते जाते हैं. लेकिन ऐसा होने में सालों लगते हैं.
स्ट्रेच मार्क्स को लेकर चिंता कॉस्मैटिक और फैशन इंडस्ट्री के हक में काम करती है. फिर भी बूहू ने स्ट्रेच मार्क्स को नॉर्मल दिखाने की हिम्मत की. ये वाकई तारीफ लायक है.
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Boohoo के इस इश्तेहार पर पब्लिक का ध्यान तब गया जब शेरिल एडेले नाम की एक फेसबुक यूज़र ने इसे अपनी वॉल पर पोस्ट किया और लिखा -
'I find this so amazing! That even on a massive clothing brand like Boohoo they haven't photoshopped away the models stretch marks! This is what girl power is all about! And every woman has imperfections. It shouldn't be photoshopped away to give unrealistic expectations! Its what makes us who we are! Its reality #womenpositvitey boohoo.com'.
(मुझे ये देखकर हैरानी हुई कि बूहू जितने बड़े क्लोदिंग ब्रांड ने अपनी मॉडल के स्ट्रेच मार्क्स को फोटोशॉप से हटाया नहीं. यही नारी शक्ति है. किसी का शरीर परफेक्ट नहीं होता. उसमें कमियां होती हैं. उन्हें छुपाकर लोगों के मन में बेकार की अपेक्षाएं पैदा नहीं करनी चाहिए. इन्हीं कमियों से हमारा अस्तित्व बना हुआ है. यही सच है.)

बूहू का वो स्विमसूट ऐड जो चर्चा का कारण बना.
शेरिल के पोस्ट को खबर लिखे जाने तक 69,084 बार शेयर किया जा चुका है. एक लाख दस हज़ार बार लाइक किया जा चुका है.
अमूमन जो मॉडल फैशन इंडस्ट्री के लिए ऐड करती हैं, वो खुद पर तमाम अत्याचार करके अपने शरीर को रंग, आकार और वज़न के ऊटपटांग दायरे के अंदर रखती हैं. फिर भी अगर कुछ 'खामी' रह जाए तो तस्वीरों और वीडियो को एडिट किया जाता है. रंग गोरा किया जाता है, झुर्रियां हटाई जाती हैं, पेट पर ऐब्स बना दिए जाते हैं. तो Boohoo के इश्तेहार में स्ट्रेच मार्क्स नज़र आने का इकलौता कारण यही हो सकता है कि कंपनी ने सोच-समझकर ऐसा किया हो.
एक बात ये भी है कि कंपनियां समय-समय पर ऐसे ऐड कैंपेन चलाती रहती हैं, जो उन्हें माली फायदा भले न दे, लेकिन ब्रैंड की इमेज बेहतर करे. बूहू से पहले भी फैशन ब्रॉन्ड एक परफेक्ट शरीर की अवधारणा को तोड़ते इश्तेहार बना चुके हैं. पिछले साल मिसगाइडेड (Missguided) के एक इश्तेहार में एक मॉडल के शरीर पर स्ट्रेच मार्क्स दिखाए गए थे. तब मिसगाइडेड की भी खूब तारीफ हुई थी. ये इश्तेहार बनाए ही इस तरह जाते हैं कि नई ज़मीन तोड़ते लगें. तो है ये भी विशुद्ध मार्केटिंग स्ट्रैटेजी ही. लेकिन इस वजह से इन्हें खारिज नहीं किया जा सकता. अच्छा संदेश देने वाली मार्केटिंग प्रोपेगैंडा मार्केटिंग से बेहतर ही कही जाएगी.

पिछले साल चर्चा का कारण बना मिसगाइडेड का इश्तेहार.
Boohoo और Missguided ने अपनी मॉडल्स के शरीर पर स्ट्रेच मार्क्स दिखाए. वो भी वहां, जहां वो ज़्यादातर औरतों को होते हैं. माने नितंबों (हिप्स) और जांघों (थाई) पर. इसीलिए ये दोनों उदाहरण मार्केटिंग के बावजूद ज़िक्र के लायक हैं.
कैसे बनते हैं ये निशान?
बायोलॉजी की क्लास में आपने ध्यान दिया होगा तो जानते होंगे कि त्वचा तीन मुख्य परतों से बनी होती हैं. इसमें से बीच वाली को कहते हैं डर्मिस. स्ट्रेच मार्क डर्मिस पर ही बनते हैं. शरीर सामान्य रूप से बढ़े तो डर्मिस की कोशिकाएं (टिशू) भी साथ-साथ बढ़ती रहती हैं. लेकिन अगर शरीर अचानक बढ़े तो डर्मिस की कोशिकाएं खिंचने लगते हैं, और आखिर फट जाती हैं. और तब त्वचा की सामान्य बनावट की जगह उसके नीचे की परतें दिखने लगती हैं जिनमें फैट (वसा) होता है. ये परत हल्के सफेद रंग की होती है जो त्वचा के रंग से कॉन्ट्रास्ट पैदा करता है. इसीलिए स्ट्रेच मार्क्स त्वचा के टेक्शचर (बनावट) को तोड़ते नज़र आते हैं. जैसे ये कोई 'खामी' हो. स्ट्रेच मार्क कोशिका के अपनी सीमा से ज़्यादा खिंचने पर ही नहीं बनते. जब त्वचा लगातार खिंच और सिकुड़ रही हो, तब भी ये निशान बन जाते हैं. स्ट्रेच मार्क्स लगभग 50 % औरतों के शरीर पर होते हैं (हो ये आदमियों के शरीर पर भी सकते हैं लेकिन ज़्यादातर औरतों के शरीर पर होते हैं).

घुटनों पर बने स्ट्रेच मार्क्स. फोटो क्रेडिटः टंबलर
कब-कब और कहां-कहां बनते हैं स्ट्रेच मार्क्स?
प्रेगनेंसी के दौरान औरतों के पेट पर स्ट्रेच मार्क्स बनते हैं. क्योंकि उनका पेट तेज़ी से बढ़ता है. इसके अलावा प्यूबर्टी (किशोरावस्था) शुरू होने पर लड़कियों के स्तन और नितंब बढ़ते हैं. तब भी ये निशान बन जाते हैं. ये निशान लड़कों के शरीर पर भी हो सकते हैं. कई मामलों में स्ट्रेच मार्क्स की वजह कोई मेडिकल कंडीशन होती है. जैसे मारफैन सिंड्रोम. इसमें त्वचा में लचक कम हो जाती है. तो खिंचने के निशान पड़ने लगते हैं. इसके अलावा कुशिंग सिड्रोम या थॉयरॉइड की समस्या होने पर शरीर में हॉर्मोन्स का स्तर गड़बड़ हो जाता है और शरीर का वज़न तेज़ी से बढ़ता है लेकिन त्वचा उसी तेज़ी से नहीं बढ़ पाती. कभी-कभार ऐसा भी होता है कि त्वचा पर अलर्जी वगैरह के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली क्रीम से ही निशान पड़ जाए. ऐसा तब होता है जब आप कोर्टिकोस्टेरॉइड (corticosteroid) क्रीम का इस्तेमाल करें. इससे त्वचा में कोलैजन की मात्रा कम होने लगती है और उसका लचीलापन कम हो जाता है. नतीजे में वो दरकने लगती है.
क्या स्ट्रेच मार्क्स का 'इलाज' ज़रूरी है?
मेडिकल साइंस स्ट्रेच मार्कस को शरीर में घटने वाली एक बेहद सामान्य घटना मानता है. इनसे कोई नुकसान नहीं होता. इसीलिए इनके इलाज की कोई खास ज़रूरत नहीं होती. कुछ दुर्लभ मामलों में स्ट्रेच मार्क्स शरीर में किसी दूसरी बीमारी का इशारा हो सकते हैं. लेकिन ऐसा बेहद कम होता है.

इंग्लैंड में रहने वाली एमिली हॉल्स्टन की तरह कई औरतों ने प्रेगनेंसी के वक्त हुए स्ट्रेच मार्क्स को खुलकर अपनाने की शुरुआत की है. (फोटोः एमिली हॉल्स्टन, इंस्टाग्राम)
लेकिन बावजूद पूरी तरह सामान्य होने के, स्ट्रेच मार्क्स लोगों की बॉडी इमेज पर प्रतिकूल असर डालते हैं. खासकर औरतों के मामलों में. उनके दिमाग में ये ग्रंथी बन जाती है कि उनका शरीर 'परफेक्ट' नहीं रहा. कभी-कभी वो एंग्ज़ाइटी (घबराहट, चिंता) की शिकार तक हो जाती हैं. लेकिन स्ट्रेच मार्क्स का कोई निश्चित इलाज है ही नहीं. जो कुछ है, वो बेहद महंगा है. और उसमें भी निशान हटने की गारंटी नहीं होती. इसीलिए लोग क्रीम और लोशन की ओर मुड़ते हैं (जो कतई सस्ते नहीं होते). स्ट्रेच मार्क्स समय के साथ हल्के पड़ते जाते हैं. लेकिन ऐसा होने में सालों लगते हैं.
स्ट्रेच मार्क्स को लेकर चिंता कॉस्मैटिक और फैशन इंडस्ट्री के हक में काम करती है. फिर भी बूहू ने स्ट्रेच मार्क्स को नॉर्मल दिखाने की हिम्मत की. ये वाकई तारीफ लायक है.
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