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बिहार में महागठबंधन: क्या ये दिग्गज रोकेंगे NDA का चुनावी रथ?

बिहार में एक चौथाई सीटों पर महागठबंधन के ऐसे घटक लड़ रहे हैं, जो लम्बे समय तक भाजपा के साथ रहे हैं.

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20 मार्च 2019 (अपडेटेड: 20 मार्च 2019, 08:57 AM IST)
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बुधवार का दिन चढ़ते-चढ़ते बिहार में राजनीतिक समीकरण कुछ-कुछ पक्के होते दिखाई दे रहे हैं. प्रदेश में महागठबंधन ने अब आकार ले लिया है, जिसकी आधिकारिक घोषणा 22 मार्च को की जानी है. मंगलवार को दिन भर चले मंथन के बाद राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम और लोजद में सीटों का बंटवारा लगभग तय हो चुका है. मीडिया की खबरों और राजनीतिक सूत्रों की मानें तो सीटों के इस बंटवारे में राजद के पास 20, कांग्रेस के पास 9, रालोसपा के पास 4, हम के पास 3 और शरद यादव की पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल को 2 सीटें मिली हैं. इसके अलावा मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी को भी लड़ने के लिए 2 सीटें मिली हैं. अगर यह गठबंधन स्थायी और पक्का साबित होता है, तो कुछ बातें साफ़ हो जाती हैं. इस गठबंधन को स्टीयर करने का काम राजद कर रहा है. वैसे भी बिहार की राजनीति में जद(यू)-भाजपा के सामने राजद हमेशा एक बड़ा प्रतिपक्ष है. शायद इसीलिए बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से आधी सीटें राजद के पास हैं. बिहार की सीट शेयरिंग को ध्यान से देखें तो एक और बात साफ़ होती है कि कांग्रेस ने लम्बे समय तक चल रहा गतिरोध ख़त्म किया है. कांग्रेस पर यूपी-बिहार समेत कई राज्यों की कई क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन न करने का आरोप लगाया है. पार्टियों ने यह भी कहा कि समर्थन न करके कांग्रेस ने भाजपा को जीतने में मदद की है. बिहार में तेजस्वी यादव से लेकर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती ने कांग्रेस को लेकर तीखे बयान दिए थे. अब शायद कांग्रेस एक समझदारी की ओर बढ़ रही है. इस गठबंधन में लेफ्ट पार्टियों की गैरमौजूदगी एक रोचक समीकरण है. बिहार की कई विधानसभा सीटों से लेकर लोकसभा क्षेत्रों में वामपंथी दलों की स्थिति मजबूत है. बीते कुछ महीनों पहले बिहार के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव हुए थे. भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के खिलाफ छात्र राजद और वामपंथी छात्रगुट आइसा और एआईएसएफ ने मिलकर चुनाव लड़ा था. लेकिन लोकसभा चुनावों के पहले लेफ्ट किसी स्थिति में मौजूद नहीं है. घटकों की बात करें. राजद और कांग्रेस के अलावा इसमें भाजपा से हाल-फिलहाल अलग हुए उपेन्द्र कुशवाहा का नाम सबसे रोचक है. कुशवाहा एनडीए के सदस्य थे और पिछड़ों की राजनीति में उनकी अच्छी पकड़ थी. लेकिन महागठबंधन का हिस्सा होने के बाद रालोसपा को मिली सीटों पर उपेन्द्र कुशवाहा संभवतः रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा और भाजपा का सीधा-सीधा सामना करेंगे. इसके अलावा गठबंधन में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और महादलितों की राजनीति को मुख्यधारा में लाने वाले जीतनराम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम पार्टी (हम) का नाम भी शामिल हैं. एक समय तक जीतनराम मांझी भाजपा के साथ थे, लेकिन दो सालों पहले एनडीए से टूटकर कुछ दिनों तक अकेले घूमते रहे, और आखिर में राजद के साथ महागठबंधन का हिस्सा बने. फिर शरद यादव आते हैं, जो नीतिश कुमार के साथ थे लेकिन उनके भाजपा के साथ जाने के फैसले को लेकर खफा हुए और अलग हो गए. आगे चलकर उन्होंने लोकतांत्रिक जनता दल बनाया और अब महागठबंधन के साथ हैं. "सन ऑफ़ मल्लाह" के नाम से मशहूर मुकेश सहनी भी अपनी पार्टी विकासशील इंसान पार्टी को महागठबंधन में शामिल करवा पाने में सफल हो चुके हैं. वैसे भी सहनी एक समय "माछ-भात खाएंगे, महागठबंधन को जिताएंगे" का नारा दे चुके हैं. ऐसे देखें तो बिहार में लोकसभा की एक चौथाई सीटों पर महागठबंधन के ऐसे घटक लड़ रहे हैं, जो एक लम्बे समय तक भाजपा के सहयोगी रह चुके हैं. बिहार में सीटों के बंटवारे का सारा हिसाब अभी तक सूत्रों के हवाले पर टिका है. आज शरद यादव ने बयान दिया है कि शुक्रवार 22 मार्च को वे महागठबंधन और सीट शेयरिंग का ऐलान करने वाले हैं. और अगर इन सभी समीकरणों पर आगामी दिनों में मुहर लग जाती है तो भाजपा का कम्फर्ट ज़ोन थोड़ा-सा चुक सकता है.
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