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इस साल भी बिहार बोर्ड की टॉपर पर विवाद क्यूं हो गया, जबकि वो तो नीट टॉपर भी थी?

तीन साल, तीन अजीबोगरीब विवाद - बोर्ड ने विवादों की हैट-ट्रिक पूरी कर ली.

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7 जून 2018 (अपडेटेड: 7 जून 2018, 06:44 AM IST)
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2016 के बिहार बोर्ड की टॉपर रूबी को जब मीडिया बधाई देने पहुंचा तो बातों-बातों में ही बड़ा मुद्दा बन गया. एक फॉर्मल से इंटरव्यू में जब पत्रकार ने रूबी से एकेडेमिक्स से रिलेटेड कुछ सवाल पूछे तो बड़े अटपटे से जवाब आने लगे – जैसे रूबी से जब पूछा गया कि उनके क्या-क्या सब्जेक्ट थे तो रूबी ने कहा – ‘प्रोडिकल साइंस’.
शायद वो पॉलिटिकल साइंस कहना चाह रही थीं. जो भी हो, इस इंटरव्यू के चलते पूरे भारत में बिहार बोर्ड की पोल खुल गई. जांच वगैरह करवाई गई और ढेरों अनियमितताएं सामने आईं.
रूबी राय
रूबी

लेकिन 2017 में भी टॉपर्स को लेकर बिहार बोर्ड फिर से विवादों में आ गया. आर्ट्स के टॉपर गणेश कुमार, जिसका एक सब्जेक्ट होम साइंस और दूसरा म्यूज़िक था, ने खुद माना कि उसे म्यूज़िक का ज्ञान नहीं. उसके स्कूल ने भी कहा कि हमारे यहां किसी को भी 60 से कम नंबर नहीं देते.
होने को गणेश कुमार ने आज तक को दिए एक इंटरव्यू में बाकी सब्जेक्ट के सारे सवाल सही दिए थे.
बात यहीं ख़त्म होती तो ठीक था. मगर इस सब के बाद गणेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया और उसका रिजल्ट भी रोक लिया गया. गणेश ने दरअसल फर्जी तरीके से प्रवेश लिया था. पड़ताल में पता चला कि गणेश कुमार 1990 में मैट्रिक की और 1992 में 12वीं की परीक्षा दे चुके थे. 12वीं में वो द्वितीय श्रेणी पास हुए थे.
गणेश और उनकी मार्कशीट
गणेश कुमार और उसकी मार्कशीट

और अगर अब 2018 की बात करें तो लोग कह रहे हैं कि –
बिहार बोर्ड की पिछले दो सालों से जो फजीहत हुई उसी के चलते उन्होंने अबकी बार सेफ खेला है और उसे टॉपर घोषित कर दिया जो पिछले ही दिन ‘नीट’ की टॉपर निकलीं थीं. उसके बाद बिहार बोर्ड ने ये भी कह दिया कि अबकी कोई उन पर उंगली नहीं उठा सकता.
दरअसल बिहार बोर्ड के रिजल्ट से एक दिन पहले ही मेडिकल इंट्रेंस – 'नीट' का रिज़ल्ट आया था, जिसमें कल्पना ने टॉप किया था.
कल्पना की काबिलियत पर तो यकीनन कोई उंगली उठा भी नहीं सकता, और उन्हें अपनी दोनों सफलताओं के ढेरों बधाई. साथ ही हम उनके उज्ज्वल भविष्य की भी कामना करते हैं.
अब आती है बारी बिहार बोर्ड की. तो चलिए माना कि लोग ऐसे ही बकवास कर रहे हैं, जोक मार रहे हैं या बहुत से बहुत बिहार बोर्ड का ट्रैक रिकॉर्ड देखकर अनुमान लगा रहे हैं.
लेकिन विवाद एक दूसरा भी है, और ये वाला विवाद ‘माउथ पब्लिसिटी’ वाला नहीं लॉजिकल है.
विवाद बताने से पहले ये फोटो देखिए, इससे विवाद कुछ और क्लियर हो जाएगा –
5 जून, 2018 के अख़बारों के फ्रंट पेज में आया आकाश इंस्टिट्यूट का एड
5 जून, 2018 के अख़बारों के फ्रंट पेज में आया आकाश इंस्टिट्यूट का एड.

इसमें जो फर्स्ट स्थान पर हैं वो हैं नीट टॉप करने वालीं कल्पना. और यही बिहार बोर्ड में टॉप (विज्ञान संकाय) करने वालीं कल्पना भी हैं. इस फोटो में, जो 'आकाश इंस्टिट्यूट' का एड है, फर्स्ट और सेकेंड स्थान प्राप्त करने वाले के बीच कई अंतरों के साथ साथ एक और अंतर है. वो ये कि जहां द्वितीय स्थान प्राप्त रोहन ने 'आकाश इंस्टिट्यूट' से डिस्टेंस कोर्स किया है, वहीं कल्पना ने क्लासरूम या रेगुलर कोर्स.
अब आते हैं बिहार बोर्ड के रिज़ल्ट पर. वहां पर जो ‘साइंस स्ट्रीम’ में सेकेंड आए हैं उनका नाम है – अभिनव आदर्श. और अभिनव आदर्श के स्कूल के प्रिंसिपल, राजीव रंजन का कहना है कि ‘टेक्निकली’ अभिनव सेकेंड नहीं फर्स्ट आए हैं.
आइए अब ‘टेक्निकली’ शब्द से राजीव रंजन का क्या मतलब है उसे समझते हैं –
देखिए अगर आप 10वीं या 12वीं के बोर्ड की ‘रेगुलर’ परीक्षा में बैठते हैं तो आपकी कक्षा में न्यूनतम उपस्थिति होना ज़रूरी है. कई जगहों पर ये न्यूनतम उपस्थिति 75 फीसदी है. तो राजीव रंजन के कहने का मतलब ये है कि बिना 75 फीसदी उपस्थिति के कल्पना को एग्जाम में बैठने कैसे दिया?
2018 में बिहार बोर्ड के विज्ञान विभाग की टॉपर कल्पना कुमारी इस पूरे विवाद में पूरी तरह साफ़ हैं.
2018 में बिहार बोर्ड के विज्ञान विभाग की टॉपर कल्पना कुमारी इस पूरे विवाद में पूरी तरह साफ़ हैं.

अब आप पूछेंगे कि राजीव रंजन को कैसे पता कि कल्पना की अटेंडेस शॉर्ट है?
उसका उत्तर है ऊपर शेयर की गई आकाश इंस्टिट्यूट के एड की फोटो जिसमें साफ़ साफ़ लिखा है कि कल्पना ने इस इंस्टिट्यूट की रेगुलर क्लासेज़ ली हैं. और ये रेगुलर कोर्स या क्लासेज़ उन्होंने दिल्ली में रहकर ली हैं. ये बात कल्पना भी मीडिया में दिए अपने इंटरव्यू में कह चुकी हैं कि उन्होंने दिल्ली में रहकर नीट की तैयारी की.
अब इस सवाल के जवाब में कि ‘बिहार बोर्ड ने बिना पूरी एटेंडेंस से किसी को परीक्षा में बैठने की अनुमति कैसे दे दी?’, बिहार स्कूल परीक्षा समिति के चेयरमैन आनंद किशोर ने कहा कि –
"बिहार के स्कूलों में किसी भी छात्र के लिए न्यूनतम उपस्थिति का कोई प्रावधान नहीं है."
आनंद के इस बयान और 2017 में टॉप किए गणेश कुमार के स्कूल के बयान में बराबर की इग्नोरेंस झलकती है.
तस्वीर साभार - blog.stickytickets.com.au
तस्वीर साभार - blog.stickytickets.com.au

मतलब लॉजिकल तरीके से अगर जोड़ तोड़ के कल्पना का बिहार बोर्ड टॉप करना सही भी ठहरा दिया जाए तो भी नैतिक तरीके से क्या इसे सही ठहराया जा सकता है? क्या बिहार बोर्ड कल्पना के टॉप करने का क्रेडिट ले सकता है?
फिलोसॉफी में जब इथिक्स पढ़ते थे तो वहां पर ऐसे ‘धर्मसंकट’ वाले सवालों से जूझना पड़ता था कि नैतिक रूप से कौन सा रास्ता सही है.
तो अबकी बार बिहार बोर्ड से ये सवाल पूछा जाना चाहिए – कि क्या कल्पना कुमारी की सफलता, उसकी और केवल उसकी सफलता नहीं है? क्या कल्पना कुमारी की सफलता में बिहार बोर्ड को क्रेडिट दिया जाना चाहिए? क्यूं न बिहार के सारे स्कूलों को बंद करके हर जिले में एक कमरे का एक ऐसा ऑफिस खोल दिया जाए, जिसमें छात्र केवल एडमिशन, रिज़ल्ट, इग्ज़ाम जैसे ‘सरकारी’ कामों के लिए आएं और फिर पढ़ाई फिर चाहे दिल्ली से करें या सिडनी से, क्रेडिट सदा बिहार बोर्ड ही ले?


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