पढ़िए MP के मुस्लिम, छत्तीसगढ़ के ईसाई, यूपी की हिन्दू औरत के ये काम जो उम्मीद जगाते हैं
इक्का-दुक्का साल, कितने ही बुरे हों, हमारे इवोल्यूशन का एक पैरा या पन्ना बनकर रह जाएंगे.
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कोरोना महामारी के बीच से आई उम्मीद की ये 5 कहानियां, जो आपका दिल जीत लेंगी. फोटो - आजतक/ इंडिया टूडे फाइल
…लेकिन हम जहां तक पहुंचे हैं वहां तक करोड़ों सालों का सफ़र तय करके पहुंचे हैं. ये इक्का-दुक्का साल, कितने ही बुरे हों, हमारे इवोल्यूशन का एक पैरा या ज़्यादा से ज़्यादा एक पन्ना बनकर रह जाएंगे. एंड्योरेंस, स्टेमिना और होप बनाए रखनी है. फिर एक बार आपके लिए उम्मीद की खबरें ढूंढ लाए हैं. जो ऐसी विशम परिस्थिति में हिम्मत देंगी. सबक देंगी.
#1. पहली कहानी, आजतक के जगदलपुर संवाददाता करीमुद्दीन की तरफ़ से. जगदलपुर मेडिकल कॉलेज, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल्य इलाक़े में मौजूद है. यहां लगातार कोरोना से मौतें हो रही हैं. इन मृतकों का कोरोना संक्रमण से भय के चलते अंतिम संस्कार नहीं हो पा रहा था. या मृत्यु के बाद जो हो रहा था उसे अंतिम संस्कार नहीं कहा जा सकता था. ऐसे में सामने आए रेडक्रॉस सोसाइटी के उपाध्यक्ष एलेक्जेंडर चेरियन.
एलेक्जेंडर चेरियन जो कर रहे हैं उसे सिर्फ मानवता के चश्मे से ही देखा जा सकता है.
एलेक्जेंडर हर धर्म की आस्था को बरकरार रखते हुए अभी तक कुल 253 लोगों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. जो दूर-दराज परिवार के लोग है उन्हें वीडियो के जरिये अंतिम संस्कार कर दर्शन करवा रहे हैं. कफन-दफन का इंतज़ाम करने, अंतिम संस्कार करने, परिजनों को सूचना देने, एंबुलेंस की व्यवस्था करने, प्रशासन से संपर्क कर अन्य राज्यों के मृतकों के शवों को उनके घर तक भिजवाने में चेरियन ने दिन-रात एक कर दिया है.
#2. दूसरी कहानी, अतुल वैद्य की तरफ़ से, बालापुर से. कुछ-कुछ पिछली कहानी सरीखी, बस देश, काल, परिस्थितियां और हां, धर्म भी अलहदा. बालाघाट का एक मोक्ष धाम. यहां कोरोना से मृत व्यक्तियों का अंतिम संस्कार पूरे हिंदू रीति रिवाज के साथ मुस्लिम युवकों की एक टीम कर रही है. हालांकि इस टीम को नगर पालिका की तरफ़ से मामूली सा भत्ता भी मिल जाता है, लेकिन पत्रकार अतुल वैद्य बताते हैं कि पगार से कहीं ऊपर सेवा की भावना और मन में सांप्रदायिक सद्भाव इनके काम में झलकती है.
बालाघाट का मोक्ष धाम.
#3. तीसरी उम्मीद की बात करेंगे लखनऊ की एक महिला वर्षा की. वर्षा क्या करती हैं? जिनका निधन कोरोना वायरस से हो रहा है, उनकी मृत देह को वो श्मशान घाट और कब्रिस्तान तक पहुंचाती हैं. निःशुल्क. आपको पता ही होगा कि जब किसी की मौत कोरोना वायरस से हो रही है, तो मृतक के परिजनों और रिश्तेदारों को डेड बॉडीज ले जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. साथ ही गरीब या मध्यम वर्ग के लोगों के लिए एंबुलेंस का खर्च एफ़ोर्ड करना मुश्किल हो रहा है. एंबुलेंस अब दस-पंद्रह हज़ार रुपए चार्ज कर रही हैं.
लखनऊ की वर्षा कोरोना से मृत लोगों का अंतिम संस्कार कर रही हैं.
इस काम के लिए पहले दिन उन्होंने एक प्राइवेट गाड़ी हायर की थी लेकिन अब उनके पास दो और गाड़ियां हैं, जिन्हें उन्होंने लोगों द्वारा मिली आर्थिक मदद से हायर किया हुआ है. वर्षा को अमेरिका, कनाडा, न्यूयॉर्क और सऊदी अरब जैसी जगहों से भी अंतिम संस्कार करवाने के लिए कॉल्स आती हैं. क्योंकि कुछ लोगों के परिजन विदेशों में रहते हैं और वो भारत आने में सक्षम नहीं हैं.
#4. चौथी उम्मीद की बात हमें भेजी है हमारे यूट्यूब चैनल के दर्शक अब्दुल बासित ने. महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर से. यहां का सिटी हॉस्पिटल, पूरे मराठवाड़ा इलाक़े का सबसे बड़ा अस्पताल है. ज़ाहिर है यहां इलाज करवाने लोग दूर-दूर से लोग आते होंगे. अब होता क्या है कि हॉस्पिटल का पूरा फ़ोकस कोविड मरीज़ों पर रहता है. ऐसे में मरीज़ों के परिवारवालों, उनके तीमारदारों की कौन ही सुध ले? उनके लिए खाने पीने की कौन ही व्यवस्था करे?
लोगों की मदद कैसे की जाए, इस सवाल पर नहीं रुके. इसका जवाब खुद ही ढूंढा.
शायद यही सवाल ‘ग्लोबल मेडिकल फ़ाउंडेश’ के मन में भी रहे होंगे. मग़र एक अफ़सोस की तरह नहीं, उसका उत्तर ढूंढ़ने के उद्देश्य से. और उत्तर के तौर पर ये फ़ाउंडेश लग गई अपने काम में. किस काम में? मासिह उद्दीन सिद्दीकी द्वारा स्थापित ये फ़ाउंडेशन ग़रीब और दैनिक वेतन भोगी श्रमिक मरीज़ों के परिवारों को भोजन, फल, बेकरी आइटम और राशन किट प्रदान करके उनकी देखभाल कर रही है. ‘ग्लोबल मेडिकल फ़ाउंडेशन’ मुख्यतः सरकारी अस्पताल के रोगियों की आर्थिक सहायता करती आई है. उन्हें खाना, दवाई, ब्लड वग़ैरह उपलब्ध करवाती आई है. ये लोग स्लम एरिया के लोगों की भी मदद करते हैं, भोजन वग़ैरह पहुंचाते हैं. आप इन संस्था को कोई सहायता पहुंचाना चाहते हैं तो नीचे दिए गये नम्बर्स पर संपर्क कर सकते हैं.
# दैनिक भास्कर की एक ख़बर के अनुसार, स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के आईनॉक्स प्लांट में 25 अधिकारी और 145 मज़दूर बिना रुके काम कर रहे हैं. दिन-रात. ताकि रोज़ 150 टन ऑक्सीजन का उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके. न्यूज़पेपर के अनुसार, मजदूरों का लंच बॉक्स सामने रखा था मग़र वो खा नहीं रहे थे. पूछने पर बोले, ‘अभी 50 टन ऑक्सीजन और बनानी है, जब तक नहीं बन जाती, नहीं खाएंगे.’
# नवभारत टाइम्स की एक ख़बर के अनुसार पिक्चर टाइम डिजिप्लेक्स नाम की कंपनी ने अपने संसाधनों का प्रयोग बड़े ही इनोवेटिव तरीके से किया है. ये कंपनी मोबाइल डिजिटल मूवी थिएटर के क्षेत्र में काम करती है. इन दिनों ये विभिन्न प्रकार के पोर्टेबल शैल्टर और मोबाइल हॉस्पिटल प्रदान कर रही है जिससे बड़े स्तर पर और जल्दी से जल्दी लोगों को स्वास्थ्य सेवा और आपातकालीन शेल्टर प्रदान किये जा सकें. दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल ने इस वास्ते ‘पिक्चर टाइम’ से सम्पर्क साधा. इसके बाद बाद ‘पिक्चर टाइम’ ने इनफ्लैटेबल, एक्सपेंडेबल और फोल्डेबल टेंट के कॉम्बिनेशन का उपयोग करते हुए, 72 घंटों के भीतर अपोलो अस्पताल में ऑक्सीजन सुविधा के साथ चालीस बेड तैयार कर डाले.
# तीसरी ख़बर दैनिक जागरण के जानिब से, जो बताती है कि ऑक्सीजन की कमी दूर करने के लिए भारतीय वायुसेना ने विदेशों से विशेष ऑक्सीजन टैंकर जुटाने के अपने प्रयास तेज़ कर दिए हैं. वायुसेना का मालवाहक विमान सी-17 ग्लोबमास्टर दुबई से छह विशेष क्रायोजिनक ऑक्सीजन टैंकर लेकर सोमवार रात बंगाल के पानागढ स्थित एयरबेस पर पहुंच गया. इससे पहले वायुसेना का ग्लोबमास्टर सिंगापुर से चार क्रायोजनिक टैंकर लेकर भारत आया था.
# इंडिया टुडे में हमें ख़बर पढ़ने को मिली, आर एस सचदेवा और उनके भाई हरप्रीत सचदेवा के बारे में. ‘हाई-टेक इंडस्ट्रीज़’ के मालिक हैं. हाई-टेक इंडस्ट्रीज़, पंजाब के मोहाली इलाक़े में स्थित है. ये कंपनी, मुफ़्त में लोगों को ऑक्सीजन सिलेंडर भर के दे रही है. आर एस सचदेवा का मानना है कि इस मुश्किल वक्त में वो मानवता की सेवा कर रहे हैं.
# इस सेक्शन की अंतिम कहानी जिजीविषा की. छपी है टाइम्स ऑफ़ इंडिया में. मुंबई की शैलजा नकवे. घाटकोपर के ‘मेडिकल एंड सर्जिकल सेंटर’ में भर्ती थीं. कोविड के चलते. किताबी भाषा में कहें तो, ‘डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया था’. बोला था कि इसका 24 घंटे से ज़्यादा जीवित रहना मुश्किल है. लेकिन 13 दिन वो इस बीमारी से लड़ीं, और अंत में जीत भी गईं. उनके डिस्चार्ज के वक्त हॉस्पिटल में बाक़यदा केक काटा गया था. इसमें लिखा था 25/25 (पच्चीस बट्टा पच्चीस). उनका CT स्कोर. जो उनके स्वस्थ होने का सबूत था.
शहरों के अख़बार बेशक भरे पड़े हैं बदहवासी की खबरों से, लेकिन फिर भी उनमें भी हैं ढेरों उम्मीद की बातें. हमारा आग्रह है आपसे, थोड़ा, बस थोड़ा और इंतज़ार करें सवेरे का और इस दौरान पढ़ें, उम्मीद की बात. ठीक वैसे, जैसे भीषण युद्ध के दौरान, ठंडी रात में बच्चे घेर के सुनते हैं किसी अलाव तापते बूढ़े की कहानियां.
अंत में प्रार्थना. प्रार्थना वही, जो भारत से बाहर एक्सपोर्ट किए जा रहे कोविड वैक्सीन के डब्बों में लिखी हुई है. प्रार्थना जो वृहदारण्यक उपनिषद् से ली गई है. मतलब ये कि सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े.
#1. पहली कहानी, आजतक के जगदलपुर संवाददाता करीमुद्दीन की तरफ़ से. जगदलपुर मेडिकल कॉलेज, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल्य इलाक़े में मौजूद है. यहां लगातार कोरोना से मौतें हो रही हैं. इन मृतकों का कोरोना संक्रमण से भय के चलते अंतिम संस्कार नहीं हो पा रहा था. या मृत्यु के बाद जो हो रहा था उसे अंतिम संस्कार नहीं कहा जा सकता था. ऐसे में सामने आए रेडक्रॉस सोसाइटी के उपाध्यक्ष एलेक्जेंडर चेरियन.
एलेक्जेंडर चेरियन जो कर रहे हैं उसे सिर्फ मानवता के चश्मे से ही देखा जा सकता है.
एलेक्जेंडर हर धर्म की आस्था को बरकरार रखते हुए अभी तक कुल 253 लोगों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. जो दूर-दराज परिवार के लोग है उन्हें वीडियो के जरिये अंतिम संस्कार कर दर्शन करवा रहे हैं. कफन-दफन का इंतज़ाम करने, अंतिम संस्कार करने, परिजनों को सूचना देने, एंबुलेंस की व्यवस्था करने, प्रशासन से संपर्क कर अन्य राज्यों के मृतकों के शवों को उनके घर तक भिजवाने में चेरियन ने दिन-रात एक कर दिया है.
#2. दूसरी कहानी, अतुल वैद्य की तरफ़ से, बालापुर से. कुछ-कुछ पिछली कहानी सरीखी, बस देश, काल, परिस्थितियां और हां, धर्म भी अलहदा. बालाघाट का एक मोक्ष धाम. यहां कोरोना से मृत व्यक्तियों का अंतिम संस्कार पूरे हिंदू रीति रिवाज के साथ मुस्लिम युवकों की एक टीम कर रही है. हालांकि इस टीम को नगर पालिका की तरफ़ से मामूली सा भत्ता भी मिल जाता है, लेकिन पत्रकार अतुल वैद्य बताते हैं कि पगार से कहीं ऊपर सेवा की भावना और मन में सांप्रदायिक सद्भाव इनके काम में झलकती है.
बालाघाट का मोक्ष धाम.
#3. तीसरी उम्मीद की बात करेंगे लखनऊ की एक महिला वर्षा की. वर्षा क्या करती हैं? जिनका निधन कोरोना वायरस से हो रहा है, उनकी मृत देह को वो श्मशान घाट और कब्रिस्तान तक पहुंचाती हैं. निःशुल्क. आपको पता ही होगा कि जब किसी की मौत कोरोना वायरस से हो रही है, तो मृतक के परिजनों और रिश्तेदारों को डेड बॉडीज ले जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. साथ ही गरीब या मध्यम वर्ग के लोगों के लिए एंबुलेंस का खर्च एफ़ोर्ड करना मुश्किल हो रहा है. एंबुलेंस अब दस-पंद्रह हज़ार रुपए चार्ज कर रही हैं.
लखनऊ की वर्षा कोरोना से मृत लोगों का अंतिम संस्कार कर रही हैं.
इस काम के लिए पहले दिन उन्होंने एक प्राइवेट गाड़ी हायर की थी लेकिन अब उनके पास दो और गाड़ियां हैं, जिन्हें उन्होंने लोगों द्वारा मिली आर्थिक मदद से हायर किया हुआ है. वर्षा को अमेरिका, कनाडा, न्यूयॉर्क और सऊदी अरब जैसी जगहों से भी अंतिम संस्कार करवाने के लिए कॉल्स आती हैं. क्योंकि कुछ लोगों के परिजन विदेशों में रहते हैं और वो भारत आने में सक्षम नहीं हैं.
#4. चौथी उम्मीद की बात हमें भेजी है हमारे यूट्यूब चैनल के दर्शक अब्दुल बासित ने. महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर से. यहां का सिटी हॉस्पिटल, पूरे मराठवाड़ा इलाक़े का सबसे बड़ा अस्पताल है. ज़ाहिर है यहां इलाज करवाने लोग दूर-दूर से लोग आते होंगे. अब होता क्या है कि हॉस्पिटल का पूरा फ़ोकस कोविड मरीज़ों पर रहता है. ऐसे में मरीज़ों के परिवारवालों, उनके तीमारदारों की कौन ही सुध ले? उनके लिए खाने पीने की कौन ही व्यवस्था करे?
लोगों की मदद कैसे की जाए, इस सवाल पर नहीं रुके. इसका जवाब खुद ही ढूंढा.
शायद यही सवाल ‘ग्लोबल मेडिकल फ़ाउंडेश’ के मन में भी रहे होंगे. मग़र एक अफ़सोस की तरह नहीं, उसका उत्तर ढूंढ़ने के उद्देश्य से. और उत्तर के तौर पर ये फ़ाउंडेश लग गई अपने काम में. किस काम में? मासिह उद्दीन सिद्दीकी द्वारा स्थापित ये फ़ाउंडेशन ग़रीब और दैनिक वेतन भोगी श्रमिक मरीज़ों के परिवारों को भोजन, फल, बेकरी आइटम और राशन किट प्रदान करके उनकी देखभाल कर रही है. ‘ग्लोबल मेडिकल फ़ाउंडेशन’ मुख्यतः सरकारी अस्पताल के रोगियों की आर्थिक सहायता करती आई है. उन्हें खाना, दवाई, ब्लड वग़ैरह उपलब्ध करवाती आई है. ये लोग स्लम एरिया के लोगों की भी मदद करते हैं, भोजन वग़ैरह पहुंचाते हैं. आप इन संस्था को कोई सहायता पहुंचाना चाहते हैं तो नीचे दिए गये नम्बर्स पर संपर्क कर सकते हैं.
बैंक: HDFC बैंक अकाउंट नंबर: 07131450000877 RGTS/ NEFT/ IFSC Code: HDFC0000713 मोबाईल नंबर: 9960589100, 7030303055#5. इस अंतिम उम्मीद की बात में हमने देश भर के अख़बारों और अन्य न्यूज़ पोर्टल्स से कुछ उम्मीद की खबरों का कंपाइलेशन किया है.
# दैनिक भास्कर की एक ख़बर के अनुसार, स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के आईनॉक्स प्लांट में 25 अधिकारी और 145 मज़दूर बिना रुके काम कर रहे हैं. दिन-रात. ताकि रोज़ 150 टन ऑक्सीजन का उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके. न्यूज़पेपर के अनुसार, मजदूरों का लंच बॉक्स सामने रखा था मग़र वो खा नहीं रहे थे. पूछने पर बोले, ‘अभी 50 टन ऑक्सीजन और बनानी है, जब तक नहीं बन जाती, नहीं खाएंगे.’
# नवभारत टाइम्स की एक ख़बर के अनुसार पिक्चर टाइम डिजिप्लेक्स नाम की कंपनी ने अपने संसाधनों का प्रयोग बड़े ही इनोवेटिव तरीके से किया है. ये कंपनी मोबाइल डिजिटल मूवी थिएटर के क्षेत्र में काम करती है. इन दिनों ये विभिन्न प्रकार के पोर्टेबल शैल्टर और मोबाइल हॉस्पिटल प्रदान कर रही है जिससे बड़े स्तर पर और जल्दी से जल्दी लोगों को स्वास्थ्य सेवा और आपातकालीन शेल्टर प्रदान किये जा सकें. दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल ने इस वास्ते ‘पिक्चर टाइम’ से सम्पर्क साधा. इसके बाद बाद ‘पिक्चर टाइम’ ने इनफ्लैटेबल, एक्सपेंडेबल और फोल्डेबल टेंट के कॉम्बिनेशन का उपयोग करते हुए, 72 घंटों के भीतर अपोलो अस्पताल में ऑक्सीजन सुविधा के साथ चालीस बेड तैयार कर डाले.
# तीसरी ख़बर दैनिक जागरण के जानिब से, जो बताती है कि ऑक्सीजन की कमी दूर करने के लिए भारतीय वायुसेना ने विदेशों से विशेष ऑक्सीजन टैंकर जुटाने के अपने प्रयास तेज़ कर दिए हैं. वायुसेना का मालवाहक विमान सी-17 ग्लोबमास्टर दुबई से छह विशेष क्रायोजिनक ऑक्सीजन टैंकर लेकर सोमवार रात बंगाल के पानागढ स्थित एयरबेस पर पहुंच गया. इससे पहले वायुसेना का ग्लोबमास्टर सिंगापुर से चार क्रायोजनिक टैंकर लेकर भारत आया था.
# इंडिया टुडे में हमें ख़बर पढ़ने को मिली, आर एस सचदेवा और उनके भाई हरप्रीत सचदेवा के बारे में. ‘हाई-टेक इंडस्ट्रीज़’ के मालिक हैं. हाई-टेक इंडस्ट्रीज़, पंजाब के मोहाली इलाक़े में स्थित है. ये कंपनी, मुफ़्त में लोगों को ऑक्सीजन सिलेंडर भर के दे रही है. आर एस सचदेवा का मानना है कि इस मुश्किल वक्त में वो मानवता की सेवा कर रहे हैं.
# इस सेक्शन की अंतिम कहानी जिजीविषा की. छपी है टाइम्स ऑफ़ इंडिया में. मुंबई की शैलजा नकवे. घाटकोपर के ‘मेडिकल एंड सर्जिकल सेंटर’ में भर्ती थीं. कोविड के चलते. किताबी भाषा में कहें तो, ‘डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया था’. बोला था कि इसका 24 घंटे से ज़्यादा जीवित रहना मुश्किल है. लेकिन 13 दिन वो इस बीमारी से लड़ीं, और अंत में जीत भी गईं. उनके डिस्चार्ज के वक्त हॉस्पिटल में बाक़यदा केक काटा गया था. इसमें लिखा था 25/25 (पच्चीस बट्टा पच्चीस). उनका CT स्कोर. जो उनके स्वस्थ होने का सबूत था.
शहरों के अख़बार बेशक भरे पड़े हैं बदहवासी की खबरों से, लेकिन फिर भी उनमें भी हैं ढेरों उम्मीद की बातें. हमारा आग्रह है आपसे, थोड़ा, बस थोड़ा और इंतज़ार करें सवेरे का और इस दौरान पढ़ें, उम्मीद की बात. ठीक वैसे, जैसे भीषण युद्ध के दौरान, ठंडी रात में बच्चे घेर के सुनते हैं किसी अलाव तापते बूढ़े की कहानियां.
अंत में प्रार्थना. प्रार्थना वही, जो भारत से बाहर एक्सपोर्ट किए जा रहे कोविड वैक्सीन के डब्बों में लिखी हुई है. प्रार्थना जो वृहदारण्यक उपनिषद् से ली गई है. मतलब ये कि सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े.

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