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दुनिया बदल देने वाले पूंजीवाद की शुरुआत कैसे हुई? आज पूरा इतिहास जान लीजिए

एडम स्मिथ को पूंजीवाद का जन्मदाता माना जाता है. उन्होंने एक किताब लिखी- वेल्थ ऑफ नेशंस. इस पर पूंजीवाद को समझाया गया. वहीं, पूंजीवाद पर एक विचार कार्ल मार्क्स का भी है.

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history of capitalism
पूंजीवाद का इतिहास.
19 अप्रैल 2024 (पब्लिश्ड: 11:49 PM IST)
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ज़्यादातर लोग नौकरी करते हैं. महीने की आखिरी तारीख को फिक्स्ड तनख्वाह हाथ में मिल जाती है. लेकिन सोचिए नौकरी करते क्यों हैं? आप कहेंगे तनख्वाह के लिए… तनख्वाह से होगा क्या? खाना, पीना, परिवार बनाना. कुल मिलाकर कहें तो जिंदगी जीना. लेकिन जिंदगी क्या है? दिन के 12 घंटे तो उसके नौकरी की जद्दोजहद में निकल जाते हैं. यानी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा नौकरी में चला जाता है. यानी नौकरी ही उसकी जिंदगी है.

अब भी सवाल वही, नौकरी क्यों करते हैं? जिंदगी जीने के लिए. और वो जिंदगी क्या है? नौकरी करते जाना. यानी क्या नौकरी इसलिए की जाती है कि नौकरी करते रहा जाए? मूल रूप से ये विचार-मंथन पश्चिम के दार्शनिक एलन वाट्स ने दिया था. हालांकि ये सभी सवाल वर्तमान अर्थव्यवस्था पर बिल्कुल सटीक बैठते हैं. जहां अधिकतर लोग नौकरियों में खटते रहते हैं. जबकि मुट्ठी भर के हाथ में पूरी दुनिया की दौलत होती है. पैसा उनके लिए काम करता है. वो पैसे के लिए नहीं. अब इससे पहले कि आप हमें मार्क्सवादी ठहरा दें, रुकिए. हम ये नहीं कह रहे ये सिस्टम गलत है. डेढ़ सौ साल का इतिहास बताता है कि अर्थव्यवस्था शायद इसी तरीके से चल सकती है. जिसे हम कहते हैं कैपिटलिज्म या पूंजीवाद.

सवाल ये नहीं है कि आप पूंजीवाद के समर्थक हैं या विरोधी. बड़ा और ज्यादा बेसिक सवाल ये है कि पूंजीवाद नामक इस सिस्टम ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में लिया कैसे? कहां से आया ये सिस्टम? इससे पहले क्या था? क्या आगे कुछ और हो सकता है? इन सब सवालों के जवाबों पर चर्चा करेंगे. जानेंगे कथा कैपिटलिज्म की.

#पूंजीवाद से पहले

कहानी तब से शुरू होती है, जब हम जंगल में रहते थे. फिर खेतों में काम करने लगे. इसी बीच इंसानों के बीच एक नया विचार पैदा हुआ प्राइवेट प्रॉपर्टी का. ईसा से 1800 साल पहले किसी ने कहा, आज से ये जमीन मेरी. यहां से शुरुआत हुई उस कॉन्सेप्ट की जिसे कहा जाता है, प्राइवेट प्रॉपर्टी. लेकिन ये कैसे सुनिश्चित हुआ कि प्रॉपर्टी एक की ही रहेगी, कोई दूसरा उसे बेदखल नहीं कर देगा? ये संभव हुआ राजशाही से. राजा के हाथ में सारी ताकत थी. जो कानून तय करता था. इस तरह प्राइवेट प्रॉपर्टी एक तरह का कानून बन गया. यानी जिसकी जमीन उसी की जमीन. चाहे तो आप खरीद बेच सकते हैं. लेकिन लूट नहीं सकते. 

ये सिस्टम लम्बे समय तक चला. इसके बाद शुरुआत हुई सामंतवाद की. यानी सामंतों की सत्ता. सामंत जमीन के मालिक थे. मजदूर क्लास खेतों में काम करती थी. और उपज का एक हिस्सा उन्हें अपने मेहनताने के रूप में मिल जाता था. यूरोप की बात करें तो 15वीं सदी तक सामंतवाद का प्रभुत्व रहा. इसके बाद शुरू हुआ मर्केन्टलिज्म का दौर. जिसे एक तरह का प्री कैपिटलिज्म भी कहा जा सकता है. मर्केन्टलिज्म क्या था और इससे कैपिटलिज्म की नींव कैसे पड़ी, ये समझने के लिए 16वीं सदी के यूरोप को जानना पड़ेगा.

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#मर्केन्टलिज्म

साल 1517 में जर्मनी के विटनबर्ग शहर में एक पादरी उठा और चर्च की तरफ चल दिया. चर्च के अंदर जाने के बजाय उसने चर्च की दीवारों पर कुछ कागज़ चिपका दिए. इस एक घटना से शुरुआत हुई उस प्रोसेस की, जिसे ईसाई धर्म का रिफॉर्मशन या सुधारवाद कहा जाता है. इन पादरी का नाम था मार्टिन लूथर. एक धर्म सुधारक, जिनका रोमन कैथोलिक चर्च ने बहिष्कार कर दिया था. मार्टिन लूथर की बातें इतनी फैलीं कि ईसाई धर्म में दरार पड़ गई और कैथोलिक से अलग एक बिलकुल नई शाखा प्रोटेस्टेंट ईसाइयत की शुरुआत हो गई.

यूरोप के कुछ राजा जो चर्च की मोनोपॉली से परेशान थे, उन्होंने धीरे-धीरे प्रोटेस्टेंट शाखा को अपनाना शुरू किया. इसके बाद यूरोप में धर्म की ताकत कम हुई और लोग धर्म से हटकर बाकी चीजों की तरफ बढ़े. इसके अलावा यूरोप एक और बदलाव से गुजर रहा था. 14वीं शताब्दी में यूरोप में प्लेग फैला. इसने यूरोप की लगभग आधी आबादी को मार डाला. लिहाजा लेबर की कमी होने लगी. इन दो कारणों के चलते यूरोप के समाज में बड़े बदलाव हुए.

- पहला, जो पैसा सामंत और राजा चर्च में खर्च करते थे, वो अब व्यापार को बढ़ाने में इस्तेमाल किया जाने लगा. 
- दूसरा लोगों ने ‘सेक्युलर’ सब्जेक्ट्स या यूं कहें ऐसे विषय जिनका धर्म से कोई लेना देना नहीं था, जैसे फिजिक्स , बायोलॉजी, जियोग्राफी, की पढ़ाई शुरू कर दी. इसकी वजह से स्किल्ड लेबर में इजाफा हुआ और लोग शहरों की तरफ मूव होने लगे.

कुल मिलाकर कहें, तो खेती अब पहले जितना फायदेमंद व्यवसाय नहीं रह गया था. क्योंकि लेबर कम थी और जमीन भी लिमिटेड थी. लिहाजा अर्थव्यवस्था को लेकर एक नया विचार उपजा जिसे मर्केन्टलिज्म कहा गया.

मर्केन्टलिज़्म से पहले लोग खेती के जरिये धन पैदा करते थे. मतलब आपके पास जमीन है. आप अनाज उगाओ. पैसा कमाओ. या दो बकरियों से चार बकरी बनाओ. दो को बेचो. पैसा कमाओ. लेकिन चाहे खेती हो या पशुधन. दोनों के लिए जमीन की जरूरत होती है. और जमीन होती है लिमिटेड. इसलिए सवाल उठा कि नया पैसा कहां से आएगा? यहीं से शुरुआत हुई मर्केन्टलिज्म की. मर्केन्टलिज़्म कहता था दुनिया में जमीन लिमिटेड है इसलिए पैसा भी लिमिटेड है. अगर एक को अमीर होना है, तो उसे दूसरे की जमीन छीननी पड़ेगी. और यूरोप में जमीन लिमिटेड थी. इसलिए उन्होंने सोचा, क्यों न दुनिया के दूसरे देशों की तरफ बढ़ा जाए. 

मर्केन्टलिज़्म की शुरुआत में दो चीजों ने बड़ा असर डाला. हुआ यूं कि ऑटोमन अंपायर ने Constantinople (वर्तमान में इस्तांबुल) पर कब्जा कर लिया. दूसरी तरफ मेडिटेरेनियन सागर के रास्ते पर वेनिस ने अपनी मोनोपॉली बना ली. इन दोनों कारणों से यूरोप और एशिया के बीच होने वाला ट्रेड काफी प्रभावित हो गया था. इस दिक्कत से पार पाने के लिए एक पुर्तगाली, जिसका नाम वास्को ड गामा था, भारत पहुंचा. इसके बाद पुर्तगाली ईस्ट इंडिया कम्पनी बनी. ऐसे ही डच, फ्रेंच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी बनी. इन सबके बीच एक ही लड़ाई थी. व्यापार की लड़ाई. इस लड़ाई में यूरोप के देशों ने अफ्रीका और एशिया में अपनी कई कॉलोनीज बना लीं. भारत के कई हिस्सों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया था. ब्रिटेन की सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी को एक आदेश दिया. क्या था इस आदेश में?

साढ़े तीन लाख पाउंड के कपड़े इंग्लैंड से खरीद कर भारत में कम दामों पर डंप किए जाएं. मतलब कम दामों पर बेचा जाए. इससे भारत में बनने वाले हाई क्वालिटी कपड़े की मार्केट में सेंध लगे. दूसरा आदेश इससे भी ज्यादा इंट्रेस्टिंग है. क्योंकि यही बात मर्केन्टलिज़्म का मूल है. 

मर्केन्टलिज्म माने एक ऐसी पॉलिसी, जिसमें एक तरफा फ्री ट्रेड हो. मान लीजिए दो देश हैं. A और B. अब A ने B पर कब्जा कर लिया है. इन दोनों देशों में कपड़े के व्यापार का कंपटीशन है. ऐसी सिचुएशन में A अपने यहां बनने वाले कपड़ो को B के मार्केट में फ्री एक्सेस दे. कैसे? A से B जाने वाले कपड़ों पर कोई टैक्स न लगे. लेकिन B देश में बनने वाले कपड़ों को बराबरी का मार्केट एक्सेस न दिया जाए. B से A आने वाले कपड़ों पर इंपोर्ट ड्यूटी लगाई जाए.

ऐसा ही अंग्रेजों ने भारत के साथ भी किया. ब्रिटेन से भारत आने वाले कपड़ों पर भारत में जीरो टैक्स था. क्योंकि अंग्रेजों ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था. लेकिन भारत में बनने वाले कपड़े अगर इंग्लैंड जाएंगे तो उस पर बहुत टैक्स लगता था. और ऐसा सिर्फ कपड़ों के मामले में नहीं बल्कि समुद्री जहाजों, हैंडीक्राफ्ट्स जैसे और भी सेक्टर्स में किया गया. एक तरफ इंग्लैंड से आया मटेरियल भारत में डंप किया गया और दूसरी तरफ भारत के एक्सपोर्ट्स को कम करने के लिए इंपोर्ट ड्यूटी लगाई गई. इस पूरी प्रक्रिया की वजह से भारत की कई इंडस्ट्री पूरी तरह टूट गईं. इंग्लैंड के कैपिटलिस्ट क्लास को बहुत फायदा हुआ. उन्हें नया मार्केट मिला. प्रॉफिट को टेक्नोलॉजी में इन्वेस्ट किया गया. कई नई टेक्नोलॉजीज का विकास हुआ जैसे कार, एयरक्राफ्ट वगैरह-वगैरह.

अब देखिए मर्केन्टलिज़्म ने यूरोप पर क्या असर डाला. इससे यूरोप में तीन बड़े बदलाव हुए…
पॉलिटिकल 
फाइनेंशियल 
और सोशल 

तीनों को बारी-बारी समझते हैं.

#पॉलिटिकल

यूरोप के राज्यों को भारत और चीन से व्यापार करने के लिए चाहिए था पैसा. क्योंकि उस वक़्त इन देशों के पास भारत और चीन को बेचने लायक ऐसा कोई ख़ास प्रोडक्ट नहीं था. तो बैलेंस ऑफ़ पेमेंट हमेशा उनके ख़िलाफ़ रहता था. माने व्यापार से घाटा उन्हें ही होता था. वो बहुत सारे सोने के बदले भारत से प्रोडक्ट्स खरीद कर ले जाते थे. 

अब इतना सोना कहां से आएगा, इसके लिए उन्होंने एक रेवेन्यू मॉडल बनाया. उन्होंने अफ्रीका और अमेरिका को अपनी कॉलोनी बनाया. अफ्रीका से लोगों को स्लेव या बंदी बना कर अमेरिका ले जाते थे. अमेरिका में कैश क्रॉप की खेती करवाते थे. जैसे कॉटन, तंबाकू. उसको यूरोप के बाज़ारों में बेचते थे. इसके अलावा तंबाकू और ओपियम जैसे प्रोडक्ट्स के लिए भारत और चीन अच्छे बाजार थे. इनसे भी उनको पैसा मिलता था. इस पैसे से वो भारत और चीन से मसाले, सिल्क जैसी चीज़ें खरीदते थे. इसे यूरोप के बाज़ारों में बेचते थे.

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#फाइनेंशियल

जब इस लेवल पर बिज़नेस होगा, तो पैसे का लेन-देन कॉम्प्लेक्स बनेगा. इस वजह से जन्म हुआ बैंकिंग सिस्टम और बिज़नेस कंपनियों का. नतीजा ये कि कर्ज का सिस्टम बना. सोने और चांदी के सिक्कों की जगह कागज के नोटों से पेमेंट का सिस्टम बना. वहीं दूसरी तरफ मॉडर्न कंपनी बनाने का रास्ता खुला. जैसे जॉइंट स्टॉक कंपनी, चार्टर कंपनी, इनमें प्रोफेशनल तरीके से काम शुरू हुआ. जैसे बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स का होना. इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी ऐसी ही एक कंपनी थी.

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#सामाजिक बदलाव

यूरोप में एक नए क्लास का उदय हुआ. हमने आपको पहले बताया कि आम तौर पर तीन क्लास थे. चर्च जिसे क्लर्जी कहते थे. राजा और उसके सामंत जिसे नोबिलिटी कहते थे. और थी प्रजा. लेकिन इसके बाद मिडिल क्लास का उदय हुआ. इसमें व्यापारी, बैंकर, शिप के मालिक और इन्वेस्टर शामिल थे. जो 17वीं सदी तक ताकतवर बन चुके थे. वहीं दूसरी तरफ, protestant रिफॉर्म के बाद नए पॉलिटिकल और सामाजिक विचारों का जन्म हुआ. जैसे डेमोक्रेसी, लिबरलिज्म. कई सेक्युलर विषयों में रिसर्च और पढ़ाई भी बढ़ी. जैसे मेडिसिन, फिजिक्स.

एक बार मार्केन्टलिज्म और कमर्शियल रेवोल्यूशन की वजह यूरोप में बदलाव का जो पहिया घूमना शुरू हुआ, वो घूमता ही चला गया. लेकिन इसी के चलते काफी दिक्कतें भी हुईं. मसलन 18वीं सदी में आप देखोगे कि फ़्रांस में क्रान्ति के बीज बोये जा रहे थे. अमेरिका, जो ब्रिटिश कॉलोनी हुआ करता था, उसने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ बिगुल बजा दिया था. लोकतंत्र, उदारवाद जैसे विचार जड़ें पकड़ने लगे थे. ऐसे माहौल में 18वीं सदी में स्कॉटलैंड के एक दार्शनिक एडम स्मिथ ने एक सवाल पूछा- राजनीति में लोकतंत्र हो सकता है तो क्या अर्थव्यस्था में भी लोकतंत्र आ सकता है? इस एक सवाल से शुरुआत हुई पूंजीवाद की.

ये भी पढ़ें - बैठकी: समाजवाद और पूंजीवाद के बीच फंसा भारत कैसे चीन और अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है?

#पूंजीवाद का जन्म

एडम स्मिथ को पूंजीवाद का जन्मदाता माना जाता है. उन्होंने एक किताब लिखी- वेल्थ ऑफ नेशंस. क्या कहती थी ये किताब? एक सवाल से समझते हैं. धन क्या होता है. मने पशु धन एक प्रकार का धन है. धन उस चीज को कहते हैं जिससे हमें कुछ वैल्यू मिलती है. गाय-भैंस से दूध मिलता है. इसलिए पशु एक प्रकार का धन माना जाता है. अब आप इस धन को बढ़ा सकते हो. बीज से फसल पैदा कर सकते हो. पशु धन में बढ़ोतरी हो सकती है. पहले वैल्यू बढ़ाने का ये ही तरीका था. एडम स्मिथ ने कहा- नहीं. वैल्यू पैदा करने का एक और तरीका है. कपास लो. और उससे कपड़ा बना लो. अब कपड़े में है कपास ही. लेकिन कपड़े की वैल्यू कपास से ज्यादा है. यानी मैन्युफैक्चरिंग के जरिये आप वैल्यू क्रिएट कर सकते हो.

एडम ने कहा, बहुत से जमीन, बहुत सा समय लगाकर हम खेती से थोड़ी वैल्यू पैदा करते हैं. इसके बजाय क्यों न उद्योग लगाए जाएं. जिसमें जमीन कम लगेगी और वैल्यू ज्यादा क्रिएट होगी. ये विचार उस समय में क्रांतिकारी था. क्योंकि इसका मतलब, किसी देश को अमीर होने के लिए दूसरे की जमीन क़ब्ज़ाना जरूरी नहीं था. बस ज़रूरत थी, तो औद्योगिक क्रांति की. इत्तेफाक से इसी समय साइंस और टेक्नोलॉजी की जमकर तरक्की हो रही थी. लिहाजा एडम स्मिथ के आईडिया ने एक तरह से अर्थव्यवस्था में क्रांति के बीज बो दिए. हालांकि बीज को फूल बनने के लिए अभी एक कदम बाकी था.

#फ्री मार्केट

फैक्ट्री लगाने के लिए जमीन चाहिए थी. और चाहिए थे मजदूर. लेकिन ये तो खेती वाले सिस्टम में भी होता था. स्मिथ ने एक नया विचार इंट्रोड्यूस किया - कैपिटल. यानी पूंजी. पूंजी का मतलब सिर्फ पैसा नहीं. संसाधन, रॉ मटेरियल, मशीनें, फैक्ट्री ये सब कैपिटल हैं. पूंजी का निवेश कर आप प्रोडक्शन कर सकते थे. और इस तरह पैदा हो सकती थी और ज्यादा पूंजी. यानी एक प्रकार की मशीन जो पैसे से पैसा बनाती थी. हालांकि इस प्रक्रिया में एक और चीज की जरूरत थी- बाजार. स्मिथ ने बाजार को आजाद करते हुए उसे नाम दिया फ्री मार्केट.

एडम ने कहा देशों के लेवल पर भी हमें फ्री मार्केट को लागू करना चाहिए. हर देश वही चीज बनाए जिसमें वो माहिर है. और उसको दे दे, जिसे उस चीज की ज़रूरत है. ऐसे ही आप दूसरे देश से वो आयात कर लें जिसकी आपको ज़रूरत है. सबको सबकुछ बनाने की ज़रूरत नहीं है. एडम ने कहा, “इसमें सबका फायदा है.” अब आपने मर्केन्टलिज़्म वाले चैप्टर में जाना था कि पहले लोग आयात नहीं करते थे. निर्यात करना फायदेमंद माना जाता था. जबकि एडम स्मिथ ने कहा, फ्री मार्केट में दोनों को फायदा होगा. एडम ने इसे ‘इनविजिबल हैण्ड ऑफ फ्री मार्केट’ का नाम दिया. इनविजिबल हैण्ड के पीछे एडम स्मिथ एक उदाहरण देता है. वो कहता है,

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कहने का मतलब एक फ्री मार्केट में सब अपने स्वार्थ के लिए काम करते हैं. लेकिन फायदा सबका होता है.

एडम स्मिथ का ये विचार क्रांतिकारी था. इतना क्रांतिकारी की पूरी दुनिया आज स्मिथ के दिए आइडियाज के हिसाब से चलती है. कैपिटलिज्म में बदलाव हुए हैं लेकिन मूल आईडिया आज भी वही है.

अभी तक आप ज़रूर ये सोच रहे होंगे कि स्मिथ ने बढ़िया बात की थी. सही कह रहा था वो. लेकिन फिर सवाल वही. इस सिस्टम में लल्लन की पौ बारा है. जबकि आरव जैसे एम्प्लॉयी के लिए अक्सर मसला घिसटते रहने वाला हो जाता है. अब समझिए ऐसा क्यों होता है. यहां पर एंट्री होती है एक और जबरदस्त विचारक की. जिनके नाम से आप वाफिक होंगे- कार्ल मार्क्स

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#कार्ल मार्क्स और पूंजीवाद

कार्ल मार्क्स को अक्सर हम साम्यवाद के जनक के रूप में जानते हैं. लेकिन असल में साम्यवाद पैदा हुआ पूंजीवाद के एनालिसिस से. मार्क्स ने पूंजीवाद की जो विवेचना की, वो अपने आप में एक अलग चर्चा का सबजेक्ट है. लेकिन कुछ मोटी-मोटी बातें आपको बताते हैं. मार्क्स ने माना कि पूंजीवाद के चलते कई फायदे हुए हैं. मसलन नई टेक्नोलॉजी शुरू हुई. प्रोडक्शन में इजाफा हुआ. लोग खेती की जगह वाइट कॉलर जॉब्स करने लगे. जैसे मैनेजर्स, इनवेस्टमेंट बैंकर्स. एक प्रोफेशनल बैंकिंग सिस्टम बना. लेकिन पूंजीवाद से कई दिक्कतें पैदा हुईं. मसलन समाज दो तबकों में बंट गया. लेबल क्लास और कैपिटलिस्ट क्लास. मार्क्स ने पूंजीवाद की निंदा ये कहते हुए की कि इस सिस्टम में प्रॉफिट लेबर के शोषण से पैदा होता है. मार्क्स के अनुसार प्रॉफिट लेबर की चोरी है.

इसके अलावा मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी सिस्टम में माइग्रेशन की समस्या पैदा हुई. लोग गांवों से निकलकर शहरों में एक बेहतर काम की खोज में आए. इससे अचानक से यूरोप के शहरों में स्लम्स बने. वहां साफ सफाई, पीने पानी, और एक डिग्निटी ऑफ लाइफ जैसी चीजें उनको नहीं मिली. आज भी भारत में और दुनिया के कई देशों में ये समस्या बनी हुई है. इसके अलावा आर्थिक असमानता बढ़ी. एक तरफ फैक्टरी के मालिकों के पास अथाह पैसा था और दूसरी तरफ फैक्टरी में काम करने वाले लोगों के पास सिर्फ निश्चित वेतन. मेंटेनेंस, माल और वेतन काटकर जितना भी प्रॉफिट होता था उस पर पूरा हक कंपनी के मालिक का था. मार्क्स ने आगाह किया कि एक पूंजीवादी सिस्टम में गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ती जाएगी.

पूंजीवाद की एक और समस्या है, फैक्ट्री का मालिक ज्यादा पैसा कमा रहा या एम्प्लॉयी कम कमा रहा. ये एक बात है. लेकिन इससे भी बड़ी दिक्कत ये है कि एम्प्लॉयी एक दिन काम से निकल जाएगा. देखिए, आदमी काम करता है. तो अपने काम से जुड़ाव महसूस करता है. जूता बनाने वाला अगर जूता बना रहा है तो वो जूते से कुछ लगाव महसूस करेगा. अब एम्प्लॉयी की नौकरी कभी न कभी ख़त्म होगी, तो वो क्या अपने काम का मालिक होगा? जो उसने बनाया, क्या उस पर उसका कोई हक़ होगा? वहीं मालिक अपने काम से हमेशा कनेक्टेड महसूस करेगा क्योंकि वो उसका सपना है. उसकी अपनी बनाई चीज है जिसका वो मालिक है. जबकि एम्प्लॉयी एक तो सिर्फ एक काम कर सकता है. दूसरा, उसका अपनी बनाई चीज पर कोई हक़ नहीं है. इसलिए वो कभी अपने काम से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाएगा. इसे कार्ल मार्क्स ने alienation का नाम दिया था.

मार्क्स ने इसके बाद कहा कि एक दिन मजदूर क्लास खुद कैपिटलिज्म से परेशान होकर विद्रोह कर देगा. और उस दिन होगी साम्यवाद की शुरूआत. मार्क्स के लिए ये स्वाभाविक प्रक्रिया थी. लेकिन फिर उनके चेलों ने साम्यवाद का वो स्वरूप लागू किया कि सत्ता ने तानाशाही का रूप ले लिया. सोवियत संघ के पतन के साथ ही साम्यवाद एक तरफ़ नेपथ्य में चला गया. जहां तक कैपिटलिज़म की बात है, उसकी धूमधाम आज भी मची हुई है. 

हालांकि फिर चाहे वो अमीरी-ग़रीबी के बीच बढ़ता अंतर हो, माइग्रेशन की समस्या हो या क्लाइमेट चेंज, पूंजीवाद के आगे नई चुनौतियां हैं. चाहे पूंजीवाद का कोई अल्टेरनेटिव वर्तमान में दिखाई ना देता हो, लेकिन एम्प्लॉयी का ये सवाल भी जायज़ है कि क्या हम सिर्फ़ पैसे कमाने के लिए पैदा हुए हैं. जवाब हो सकता है कि एम्प्लॉयी को भी मालिक बनने की कोशिश करनी चाहिए. लेकिन क्या आरवों के बिना लल्लन हो सकता है. या अगर सब लल्लन हो गए, तो फिर आरव कहां से आएगा?

वीडियो: तारीख: कैसे काम करता है कैपिटलिज्म?

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