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ईरान का बढ़िया दोस्त चीन इस जंग में साइलेंट प्लेयर की भूमिका निभा रहा, पता है कैसे?

Iran War and China: चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है. दोनों पक्के दोस्त भी हैं. लेकिन चीन इस समय कोई बड़ा कदम क्यों नहीं उठा रहा. वह सिर्फ अमेरिका और इजरायल की आलोचना तक ही क्यों सीमित है? वह कैसे पर्दे के पीछे से ईरान को बड़ी मदद कर रहा है?

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ईरान, चीन का एक अहम राजीतिक और सामरिक साझेदार है. (फाइल फोटो: ITG)
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मौ. जिशान
9 मार्च 2026 (अपडेटेड: 9 मार्च 2026, 02:14 PM IST)
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ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जंग में ईरान का मजबूत दोस्त चीन खुलकर सामने नहीं आया है. सवाल उठ रहा है कि जब ईरान जोरदार पलटवार कर रहा है और वेस्ट एशिया से अमेरिका का प्रभाव खत्म करने का बढ़िया मौका है, तब चीन बड़ा कदम क्यों नहीं उठा रहा. वह सिर्फ अमेरिका और इजरायल की आलोचना तक ही क्यों सीमित है? क्या चीन ने ईरान को मुश्किल वक्त में अकेला छोड़ दिया है? आखिर चीन कर क्या रहा है? इसी पर बात करते हैं.

चीन एक ऐसा देश है, जो हर मोर्चे पर अमेरिका से मुकाबला कर रहा है. लेकिन चीन की स्ट्रेटेजी अमेरिका को सीधे नुकसान पहुंचाने की नजर नहीं आ रही है. इंडिया टुडे से जुड़े अविनाश कतील की रिपोर्ट के मुताबिक, कई जानकारों का मानना है कि चीन पर्दे के पीछे से ईरान की मदद कर रहा है. हालांकि, बीजिंग ने इस दावे की सार्वजनिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की है.

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बीते हफ्ते NBC News को दिए इंटरव्यू में कहा था, "चीन और रूस हमें राजनीतिक और अन्य तरीकों से समर्थन दे रहे हैं." हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि ईरान को कैसी मदद मिल रही है.

अमेरिकी सिक्योरिटी एनॉलिस्ट और अमेरिका के पूर्व प्रिंसिपल डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (NSA) जॉन फाइनर ने न्यूज एजेंसी ANI को बताया,

"यह मुमकिन है कि ईरान को उसके कुछ 'दोस्तों' से मदद मिली हो... ऐसा नहीं है कि चीन या ईरान के साथ अच्छे संबंध रखने वाले अन्य देशों ने इस (युद्ध) में उनका समर्थन करने के लिए बहुत कुछ किया हो, लेकिन यह मुमकिन है कि उन्होंने उन्हें 'जानकारी' दी हो."

अगर ये सच है तो यही 'जानकारी' इजरायल और अमेरिका के लिए आफत बन रही है. एक्सपर्ट्स ने आरोप लगाया है कि चीन ईरान को रियल-टाइम जानकारी देने में मदद कर रहा है, जो युद्ध के लिए बहुत जरूरी है. इस कथित मदद के जरिए ही ईरान अरब देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर सटीक हमले कर रहा है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान के सदाबहार साथी चीन और रूस, अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जंग में उसे इंटेलिजेंस, मिलिट्री और पैसे की मदद दे रहे हैं. लेकिन, ना तो चीन और ना ही रूस ने इसकी कभी पुष्टि की है. जाहिर है, खुलेआम पुष्टि करें भी क्यों?

ईरान के ड्रोन और मिसाइल में चीन का बड़ा रोल

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान की ड्रोन और मिसाइल क्षमता में भी चीन की तकनीक और उपकरणों का बड़ा योगदान रहा है. कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि चीन ने सालों से ईरान को ऐसे एक्विपमेंट्स और टेक्नोलॉजी दी है जिन्हें सैन्य इस्तेमाल यानी हथियार बनाने में भी बदला जा सकता है. वैसे तो ईरान खुद से ही ड्रोन-मिसाइल बनाता है, लेकिन रिपोर्ट्स में बताया गया कि इनके कई कंपोनेंट्स चीन से आते हैं.

तेल और गैस चीन की दुखती रग

चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब है. माल और वो भी सस्ता माल बनाने के लिए काफी एनर्जी चाहिए. इसलिए चीन के लिए ईरान सिर्फ राजनीतिक सहयोगी नहीं, बल्कि एनर्जी सिक्योरिटी का भी बड़ा स्रोत है. चीन अपने कुल कच्चे तेल का 55 फीसदी से ज्यादा हिस्सा वेस्ट एशिया से आयात करता है. इसमें लगभग 13 फीसदी तेल अकेले ईरान से आता है.

चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है. ईरान अपना 80 फीसदी तेल चीन को भारी छूट पर देता है, जिससे चीन को भी भारी बचत होती है. यह तेल मुख्य रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होकर जाता है, जो दुनिया के सबसे अहम समुद्री ट्रेड रूट में से एक है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का एकतरफा कंट्रोल है. ईरान ने इसे बंद कर दिया है. तेहरान के साथ बीजिंग के रिश्ते इतने अच्छे हैं कि इस बात पर बात हो रही है कि चाइनीज शिपमेंट को यहां से गुजरने की इजाजत दी जा सकती है, जबकि ईरान दूसरे देशों की सप्लाई रोक रहा है.

चीन अपनी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का 31 फीसदी भी वेस्ट एशिया से ही इंपोर्ट करता है. कतर 28 फीसदी LNG सप्लाई करता है और बाकी ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से भेजा जाता है.

प्रतिबंधों के बीच चीन ने संभाली ईरान की अर्थव्यवस्था

ईरान लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों के प्रतिबंधों (Sanctions) का सामना कर रहा है. ऐसे समय में चीन ने बड़े पैमाने पर ईरानी तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को सहारा दिया. 2021 से अब तक चीन ने 140 अरब डॉलर से ज्यादा का ईरानी तेल खरीदा है.

यह भी पढ़ें: राष्ट्रपति पेजेश्कियान की 'माफी' से ईरान में उबाल, IRGC भी नाराज, दुबई पर हमले में 1 की मौत

इसके अलावा 2021 में चीन ने ईरान में अगले 25 सालों में लगभग 400 अरब डॉलर निवेश करने का भी ऐलान किया. इसमें एनर्जी, बैंकिंग, टेलीकॉम और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर शामिल हैं. Huawei और ZTE जैसी चाइनीज कंपनियां ईरान के टेलीकॉम नेटवर्क के विकास में अहम भूमिका निभा चुकी हैं.

ईरान जंग में ताइवान पर स्ट्रेटेजी

एक्सपर्ट्स का मानना है कि चीन के लिए ईरान की अहमियत उसकी ताइवान को लेकर रणनीति से भी जुड़ी है. अमेरिका वेस्ट एशिया में अपने सहयोगी अरब देशों और इजरायल की सुरक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करता है. अमेरिका भी ताइवान को सैन्य साजो-सामान की भारी मदद देता है.

अगर अमेरिका का ध्यान, पैसा और रिसोर्स वेस्ट एशिया में ज्यादा खपा, तो ताइवान पर अमेरिकी खर्च कम हो जाएगा. इससे ताइवान के मुद्दे पर चीन के लिए रणनीतिक फायदा हो सकता है. चीन 'वन चाइना' पॉलिसी के तहत उसे अपने में मिलाना चाहता है, लेकिन ताइवान इस पर राजी नहीं है.

ईरान एनर्जी, जियो-पॉलिटिक्स और ताइवान जैसे कई कारणों से चीन के लिए बेहद अहम है. इसलिए भले ही चीन खुलकर चुप दिखाई दे, लेकिन जानकार तो यही मानते हैं कि वह इस संघर्ष में एक बड़ा 'साइलेंट प्लेयर' बना हुआ है.

वीडियो: अमेरिका और ईरान जंग के बीच ट्रंप ने ईरानियों से क्या अपील की?

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