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'उड़ता पंजाब' से पंजाब निकाला, तो सिनेमा जाएगा 25 साल गहरे गड्ढे में

'पान सिंह तोमर' से चम्बल निकाल दो, विद्या बालन की 'कहानी' से कोलकाता निकाल दो, 'हैदर' से कश्मीर. फिर सोचो, बचेगा क्या?

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मियां मिहिर
7 जून 2016 (अपडेटेड: 7 जून 2016, 04:24 PM IST)
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कल्पना कीजिए, कि 'पान सिंह तोमर' से चम्बल के बीहड़ों के तमाम रेफरेंस हटा दिया जाएं. या फिल्म 'सत्या' या 'ब्लैक फ्राइडे' जैसी मुम्बई अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मों से खुद मुम्बई का नाम गायब हो जाए. विद्या बालन की 'कहानी' में कोलकाता न होकर पीली टैक्सियों वाला कोई काल्पनिक शहर हो. 'हैदर' से कश्मीर निकाल दीजिए, 'चक दे इंडिया', 'खोसला का घोंसला' अौर 'अोये लक्की लक्की अोये' से दिल्ली, अौर फिर सोचिए कि इन फिल्मों में देखने को क्या बचेगा?

क्या कोर्ट में लड़ी जाएगी अब सेंसरशिप की लड़ाई?

आपने सुना होगा, अभिषेक चौबे की 'उड़ता पंजाब' सेंसर बोर्ड की गिरफ्त में है. नई खबर ये आई है कि बोर्ड की रिवाइज़िंग समिति ने शुक्रवार को हुई स्क्रीनिंग के बाद फिल्म में से 'पंजाब', 'राजनीति' अौर 'चुनाव' से जुड़े सारे रेफरेंस हटाने का सुझाव दिया है. इसके अलावा 89 कट भी फिल्म में सुझाए गए हैं. हालांकि 'स्क्रोल डॉट इन' की रिपोर्ट के मुताबिक, बोर्ड ने प्रोड्यूसर्स को इस बाबत अभी तक कुछ लिखित में नहीं दिया है. यह भी कि निर्माता इसके खिलाफ अपील ट्रिब्यूनल में, या कोर्ट में जाने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन जब तक उन्हें यह सुझाव लिखित में नहीं मिलता, उन्हें आगे अपील के लिए इंतज़ार करना होगा. 'उड़ता पंजाब' फिल्म के निर्देशक 'इश्किया' फेम अभिषेक चौबे हैं. अनुराग कश्यप तथा तीन अन्य निर्देशकों की फिल्म निर्माण कंपनी 'फैंटम' अौर एकता कपूर की 'बालाजी टेलिफिल्मस' इसकी निर्माता हैं.

फिल्म रिवाइजिंग कमेटी के पास इसलिए पहुंची थी क्योंकि सीबीएफसी ने पहली स्क्रीनिंग के बाद फिल्म को बिना कट 'एडल्ट' सेंसर सर्टिफिकेट देने से भी मना कर दिया था. कमेटी ने फिल्म में चालीस से ज़्यादा कट सुझाए थे. फिल्म प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप उस समय ही रिवाइज़िंग कमेटी को अोवरलैप कर सीधे अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने को तैयार थे. खबर है कि रिवाइज़िंग कमेटी की स्क्रीनिंग में बोर्ड के विवादास्पद अध्यक्ष पहलाज़ निहलाणी खुद शामिल होते है. अब रिवाइज़िंग कमेटी की सिफारिशें आने के बाद ट्रिब्यूनल या कोर्ट के पास जाने का विकल्प कश्यप के पास अभी भी खुला है. लेकिन जैसे-जैसे फिल्म की रिलीज़, 17 जून, पास आ रही है, यह पूरा मामला फिल्म के लिए अौर प्रोड्यूसर्स के लिए बड़ी मुश्किल बनता जा रहा है. जैसा फिल्म इंडस्ट्री का बिज़नेस मॉडल है इन दिनों, रिलीज का टलना फिल्म को गंभीर आर्थिक संकट में डाल सकता है.

'उड़ता पंजाब' में पंजाब नहीं होगा तो क्या होगा?

सीबीएफसी के नए सुझावों में सबसे मज़ेदार, जो सबसे खतरनाक सुझाव भी साबित हो सकता है, सुझाव है 'उड़ता पंजाब' से पंजाब के तमाम संदर्भ निकाल देने का सुझाव. क्योंकि गर ये हो गया तो भारतीय सिनेमा बीते पच्चीस सालों में जितने कदम चलकर आगे आया है. उतना ही वो वापस पीछे हो जाएगा. सिनेमा भले फिक्शन हो, घटता वो किसी खास स्पेस अौर टाइम में है. यही संदर्भ आम तौर पर कथाअों को ज़्यादा प्रामाणिक बनाते हैं. अौर कहानी जितनी अपनी ज़मीन से जुड़ी होती है, उतनी गहराई से वो देखनेवाले के दिल तक पहुंचती है.

आखिर 'उड़ता पंजाब' इस मुसीबत में फंसी कैसे? फिल्म के मेकर्स की गलती बस यहां इतनी ही है कि उन्होंने फूहड़ चुटकुलों अौर बिना नाम-पते वाले प्लास्टिक किरदारों वाली फिल्म बनाने के बजाए एक ऐसी फिल्म बनाने की सोची, जो समकालीन भारत की सच्चाई को परदे पर दिखाने की कोशिश करती है. तीन साल पहले, जब फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे अौर लेखक सुदीप शर्मा ने पंजाब अौर वहां ड्रग्स की समस्या को अपनी नई फिल्म की पृष्ठभूमि के लिए चुना होगा, उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होगा कि फिल्म पंजाब के चुनावों के पहले कैसी राजनैतिक उठापटक में फंस जाएगी.

चुनावों के मौसम में फिल्म की रिलीज़ बहुत 'रिस्की बिज़नेस' है

पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं, अौर सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल अौर बीजेपी की गठबंधन सरकार भारी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है. अौर पंजाब में फैले ड्रग्स के नशे का मुद्दा इस चुनाव के मौसम में सबसे जलता हुआ मुद्दा बनकर उभरा है. विपक्षी पार्टियां इसे जोर-शोर से उठा रही हैं. इस मुकाबले को अौर दिलचस्प बनाया है AAP ने. आम आदमी पार्टी इस चुनावों में पहली बार अपने पूरे दमखम से कूद रही है, अौर लगता है जैसे उनकी प्रायोरिटी में ड्रग्स की समस्या पहले नंबर पर है. कुमार विश्वास के नए म्यूजिक वीडियो को देख लीजिए, जिसमें बाकायदे अकाली नेताअों को नाम लेकर कोसा गया है.

बादल साहब, गाने पर नहीं ड्रग स्मगलिंग पर एक्शन लीजिए

ऐसे में अचानक 'उड़ता पंजाब' के विषय ने इसे बहुत ही संवेदनशील फिल्म बना दिया है इस मौके के लिए. लेकिन फिल्ममेकर का इस पर क्या ज़ोर. उनकी फिल्म पर प्रतिबंध लगाना तो कला अौर सच्चाई का गला घोंटने जैसा हुआ.

फिल्म की आलोचना होनी चाहिए, लेकिन फिल्म की आलोचना के टूल्स से

https://youtu.be/QjJsQx538Yo

इस विवाद के खड़े होने से ठीक पहले, 'दी लल्लनटॉप' के साथ विशेष इंटरव्यू में फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर सुदीप शर्मा ने बताया था कि वे बिल्कुल नहीं चाहेंगे कि उनकी फिल्म का कहीं भी, किसी भी तरह से राजनैतिक इस्तेमाल हो. फिल्ममेकर का मकसद तो एक सच्ची कहानी सुनाना भर होता है. लोकतंत्र में राजनैतिक फैसले राजनीति के मैदान पर ही होने चाहिए.

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लेकिन फिल्म राजनीतिक बहसबाज़ी में उलझ गई है. अनुराग कश्यप ने इस विवाद पर कल रात जो ट्वीट किए, उनमें से एक को आज सुबह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्विटर पर 'I completely agree' लिखकर रीट्वीट किया है.

https://twitter.com/anuragkashyap72/status/739852868736458753 https://twitter.com/anuragkashyap72/status/739936912719368192 https://twitter.com/ArvindKejriwal/status/740007171925135361

लेकिन इसके बाद अनुराग कश्यप ने ट्विटर पर ही यह अपील की है कि उनकी लड़ाई सेंसरशिप के खिलाफ है अौर राजनैतिक पार्टियां इससे दूर रहें. साफ़ है कि जहां एक अोर कश्यप सेंसर बोर्ड के मनमाने फैसले के खिलाफ़ लड़ाई लड़ने का मन बना चुके हैं, इस वक्त वे यह बिल्कुल नहीं चाहते कि उनकी लड़ाई को किसी भी किस्म का राजनैतिक रंग मिले.

https://twitter.com/anuragkashyap72/status/740068592431960064 इस समय सोशल मीडिया पर #UdtaPunjabCensored ट्रेंड कर रहा है अौर सिनेमा से जुड़े नाम फिल्म के समर्थन में आए हैं. 'मसान' के निर्देशक नीरज घेवान ने एम्स, दिल्ली की उस रिपोर्ट को कोट किया है जिसमें पंजाब में ड्रग्स के 7,500 करोड़ के कारोबार का उल्लेख है. उन्होंने सवाल पूछा है कि अगर फिल्म के माध्यम से इस मुद्दे पर बात शुरु होती है तो यह बुरा कैसे है? समस्या से आंख मूंद लेना तो समस्या का समाधान नहीं होता. https://twitter.com/ghaywan/status/740062412401827841

फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड 'सेंसरशिप' कब बन्द करेगा?

वैसे यह बड़ी डिबेट सीबीएफसी की कार्यप्रणाली को भी फिर एक बार सवालों के घेरे में ले आई है. जिसे हम 'सेंसर बोर्ड' कहते हैं, उसका नाम दरअसल 'सेंट्रल बोर्ड अॉफ फिल्म सर्टिफिकेशन' है अौर जैसा नाम से स्पष्ट होता है, उसका काम फिल्मों को सही कैटेगरी के अनुसार सर्टिफिकेट देना होना चाहिए. लेकिन वो आदतन ऐसा करता नहीं है. याद रहे कि सूचना अौर प्रसारण मंत्रालय पिछले साल इस समस्या को स्वीकार करते हुए, अौर इस व्यवस्था में सही परिवर्तन के लिए श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में समिति गठित कर चुका है. इस समिति की शुरुआती सिफारिशें आ चुकी हैं अौर सिनेमा को चाहनेवाले उनमें उम्मीद की किरण देख सकते हैं. समिति ने एक बार फिर दोहराया है कि सीबीएफसी का काम सिर्फ फिल्मों को सही कैटेगरी के हिसाब से सर्टिफिकेट देना है. उनका काम होना चाहिए फिल्म को देखना अौर उसके हिसाब से यह तय करना कि यह कौनसी उमर के दर्शकों के लिए मुफीद रहेगी. अपनी बनते उन्हें फिल्मों की काट-छांट करने से बचना चाहिए. रिपोर्ट का पूरा ब्यौरा यहां पढ़ें − सेंसर बोर्ड की कैंची पर चलेगी श्याम बेनेगल की दरांती? लेकिन जब तक ये सिफारिशें लागू नहीं होतीं, क्या अच्छे सिनेमा की ऐसे ही विवादों में घेरकर हत्या होती रहेगी?

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